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मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण कांग्रेस के सामने ‘बड़ी चुनौती’

17 Oct 2018
बड़ा सवाल: कांग्रेस में ‘चहेतों’ को टिकट मिलेगा या फ़िर ‘जिताऊ’ उम्मीदवार को?
 
OCT 17 (WTN) – मध्य प्रदेश में लगातार 15 सालों से सत्ता से दूर कांग्रेस इस बार टिकट वितरण में मुश्किलों का सामना कर रही है। कांग्रेस को विश्वास है कि लगातार तीन चुनाव जीतने के बाद भाजपा के ख़िलाफ़ सत्ता विरोधी लहर है जिसका पूरा फ़ायदा उसे मिल सकता है। वहीं कांग्रेस को उम्मीद है कि एससी-एसटी एक्ट में संशोधन के बाद सवर्ण समाज और पिछड़ा वर्ग की भाजपा से नाराज़गी का पूरा लाभ उसे मिलेगा। लेकिन जीत हार तो बाद की बात है, इस समय कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती है टिकट वितरण।
 
मध्य प्रदेश कांग्रेस में बड़े नेताओं के बीच गुटबाज़ी कोई नई बात नहीं है। जितने बड़े नेता उतने गुट, यही हक़ीकत है कांग्रेस की इस समय। हर बड़े नेता की इस विधानसभा चुनाव में इच्छा है कि उसके ज़्यादा से ज़्यादा समर्थकों को टिकट मिले, और इसे की चलते कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि आख़िर कैसे किसी एक नाम पर राय बनाई जाए।
 
मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक़, दिल्ली सोनिया गांधी के घर पर होने वाली सेंट्रल इलेक्शन कमेटी की बैठक में कांग्रेस के प्रत्याशियों के नाम पर आज फैसला हो सकता है। इस बैठक में शामिल होने के लिए कमलनाथ, दिग्विजय सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया और अजय सिंह दिल्ली पहुंच गए हैं। जानकारी के अनुसार स्क्रीनिंग कमेटी ने 110 सीटों पर प्रत्याशियों के नाम तय कर लिए हैं और बैठक में पहली सूची पर घोषणा हो सकती है।
 
कहा जा रहा है कि पिछले विधानसभा चुनाव और समय-समय पर हुए उप चुनावों में कांग्रेस के जिन प्रत्याशियों की जीत हुई थी उसमें से क़रीब 95 प्रतिशत विधायकों को फ़िर से टिकट मिल सकता है। लेकिन कांग्रेस में टिकट वितरण की मुश्किल उन सीटों पर है जहां पर कांग्रेस जीत हासिल नहीं कर सकी थी। सूत्रों के मुताबिक़ इन सीटों पर कांग्रेस के बड़े नेता अपने-अपने समर्थकों के लिए टिकट की मांग कर सकते हैं। यदि ऐसा होता है तो इन सीटों पर किसी एक नाम पर सहमति बनाने में कांग्रेस आलाकमान को परेशानी का सामना करना पड़ेगा।
 
मध्य प्रदेश में सभी बड़े नेताओं के अपने-अपने क्षेत्र हैं जहां पर उनके समर्थकों की संख्या काफ़ी तादात में है। ऐसे में ये नेता अपने-अपने समर्थकों को टिकट दिलाने के लिए पूरा जोर लगाएंगे। आरएसएस के एक सर्वे के मुताबिक़ वर्तमान भाजपा विधायकों की स्थिति उनके विधानसभा क्षेत्र में ठीक नहीं है और ज़्यादातर भाजपा विधायकों से जनता नाराज़ है और उन्हें हार का सामना करना पड़ सकता है। इसी आधार पर जीत की आस लगाए बैठे कांग्रेस के प्रदेशस्तर के नेताओं की पूरी कोशिश है कि उनके समर्थकों को ज़्यादा से ज़्यादा टिकट मिल सके ताकि यदि कांग्रेस जीती तो मुख्यमंत्री का फ़ैसला करते समय उनके समर्थक विधायकों की संख्या ज़्यादा रहेगी जिसका लाभ उन्हें मिलेगा।

मध्य प्रदेश में यदि कांग्रेस को इस बार भाजपा को हराना है तो उसके राज्यस्तर के बड़े नेताओं को गुटबाजी से दूर रहकर सिर्फ़ पार्टी के लिए काम करना होगा। यदि इन नेताओं ने ऐसा नहीं किया और दूसरे नेता के समर्थक प्रत्याशी का अंदरूनी विरोध चुनाव में किया, तो एक बार फ़िर से भाजपा की जीत तय है। खैर देखते हैं कि लगातार तीन विधानसभा चुनाव हारने के बाद क्या कांग्रेस के नेताओं ने आख़िर क्या सबक सीखा है।