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जानिए जम्मू कश्मीर में सियासी उठापटक का पूरा ‘खेल’

22 Nov 2018
राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने भंग की विधानसभा, गिनाए चार प्रमुख कारण
 
NOV 22 (WTN) –
राजनीति में कब क्या हो जाए कोई नहीं जानता है। कुछ ऐसा ही हुआ है जम्मू कश्मीर में जिसके बाद राज्य की राजनीति पर सभी की निगाहें टिकी हुईं हैं। आखिर क्या है पूरा मामला आपको विस्तार दे बताते हैं। दरअसल जम्मू कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक के फैसले के बाद अब ये बिल्कुल साफ़ हो गया है कि राज्य का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा इसके लिए विधानसभा चुनाव तक इंतज़ार करना होगा।
 
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि एक समय जम्मू कश्मीर में राजनीतिक हालात काफ़ी तेज़ी से बदल रहे थे, जब पीडीपी-एनसीपी और कांग्रेस के बीच महागठबंधन के ज़रिए सरकार बनती हुई नज़र आ रही थी। यहां तक तो सब ठीक था, लेकिन पीडीपी के एक धड़े, जिसका नेतृत्व इमरान अंसारी करते हैं, ने जब कहा कि उनके पास 18 विधायकों का समर्थन है तो घाटी की राजनीति का पासा ही पलट गया।
 
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती का दावा है कि उन्होंने जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक को 55 विधायकों के समर्थन की सूची फैक्स के जरिये भेजी थी। लेकिन  कहा जा रहा है कि फैक्स मशीन ने धोखा दे दिया। फैक्स मशीन के धोखा देने से मतलब है कि राजभवन का कहना है कि उन्हें फैक्स मशीन से विधायकों के समर्थन की सूची मिली ही नहीं, जिसके बाद राज्य में हो रही राजनीतिक उठापटक को देखते हुए राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने घोषणा कर दी कि विधानसभा भंग करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है।
 
वैसे तकनीक के इस युग में यदि जम्मू कश्मीर जैसे राज्य के राजभवन में फैक्स मशीन किसी संदेश को रिसीव ना करे यह तो बड़े आश्चर्य की बात है। खैर लेकिन यह राजभवन का दावा है तो इस पर टिप्पणी करना उचित नहीं। इस सबके बीच राज्यपाल सत्यपाल मलिक का कहना है कि पिछले पांच महीने से तमाम तरह की राजनीतिक उठापटक के बीच उनका मानना था कि विधानसभा को भंग कर देना चाहिए। ऐसा करने से खरीदफरोख्त की आशंका को रोका जा सकता था।
 
इधर, हाशिये पर चल रही पीडीपी और नेशनल क्रांफेंस ने कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाने की जो कवायद की उस पर पूरा पानी फिर गया। राज्य में सरकार बनाने की तीनों पार्टियों की अपील को कहा जा सकता है कि अनसुना कर दिया गया। लेकिन किसी ने सोचा नहीं होगा कि महागठबंधन बनाने की कवायद को इस तरह महाझटका लगेगा।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि जम्‍मू एवं कश्‍मीर में पीडीपी-भाजपा गठबंधन टूट जाने के बाद से पिछले 5 महीने से राज्‍यपाल शासन लागू है। लेकिन पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने राज्‍यपाल के सामने सरकार बनाने का दावा पेश किया और इसके लिए उन्‍होंने नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस के विधायकों का समर्थन होने का दावा किया था। मुफ्ती ने राज्‍यपाल मलिक को बताया कि 87 सदस्यीय विधानसभा में उनके पास पीडीपी के 28 विधायकों के अलावा नेशनल कान्फ्रेंस के 15 और कांग्रेस के 12 विधायकों का भी समर्थन हासिल है। उन्‍होंने एक अन्‍य विधायक के भी समर्थन का दावा करते हुए कुल संख्‍या 56 बताई थी, जबकि यहां सरकार बनाने के लिए 44 विधायकों की जरूरत है।
 
इस बीच, जम्‍मू एवं कश्‍मीर पीपुल्‍स कॉन्‍फ्रेंस के नेता सज्जाद लोन ने भी भाजपा के 25 और 18 अन्‍य विधायकों के समर्थन से राज्‍य में सरकार बनाने का दावा पेश किया। हालांकि लोन की पार्टी को साल 2014 के विधानसभा चुनाव में सिर्फ़ 2 सीटें मिली थीं, लेकिन उन्‍होंने राज्यपाल को व्हाट्सएप के ज़रिए भेजे संदेश में कहा कि उनके पास सरकार बनाने के लिए जरूरी आंकड़ों से अधिक विधायकों का समर्थन है।
 
लेकिन इन सबके बीच, राज्‍यपाल ने विधानसभा भंग करने की घोषणा कर दी। उन्‍होंने इसके लिए 4 प्रमुख कारणों का हवाला दिया।
 
1.सरकार गठन के लिए ऐसी पार्टियों ने गठबंधन का दावा किया है, जिनके राजनीतिक विचार एक-दूसरे से मेल नहीं खाते। ऐसे में यहां इस गठबंधन के तहत बनने वाली सरकार के स्थिर रहने की सम्भावना नहीं के बराबर है।
 
2.अलग-अलग विचारधाराओं वाली पार्टियों के साथ मिलकर सरकार बनाने के दावे से विधायकों के खरीद-फरोख्‍त की आशंका बढ़ गई है जो कि यह लोकतंत्र के लिहाज से ठीक नहीं है और पूरी राजनीतिक प्रक्रिया को दूषित करता है।

3.ऐसे में जबकि सरकार गठन और बहुमत होने के सम्बन्ध में कई दावे हो रहे हैं, किसी भी व्‍यवस्‍था के लम्बे समय तक चलने को लेकर संदेह है।

4.जम्‍मू एवं कश्‍मीर में सुरक्षा के हालात को देखते हुए यहां स्थिर सरकार की जरूरत हैं। सुरक्षा बल अपनी जान जोखिम में डालकर यहां आतंकियों के खिलाफ अभियान में मुस्‍तैदी से जुटे हैं। ऐसे में ज़रूरी है कि यहां ऐसी सरकार का गठन हो, जो उन्‍हें समर्थन व सहयोग दे।
 
राज्यपाल सत्यपाल मलिक के फ़ैसले के बाद कुछ लोगों ने महबूबा मुफ़्ती को कोर्ट जाने की सलाह दी है तो किसी का कहना है कि राज्य की सभी पार्टियों को नया जनादेश हासिल करना चाहिए। खैर लेकिन कहा जा सकता है कि जिस तरह का फ़ैसला राज्यपाल मलिक ने लिया है वो जम्मू कश्मीर के संवेदनशील हालातों को देखते हुए बहुत सही फ़ैसला है, क्योंकि सुरक्षा बल राज्य में आतंकियों का सामना कर रहे हैं ऐसे में राज्य में ऐसी सरकार की ज़रूरत है जो सुरक्षा बलों को समर्थन और सहयोग दे।