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विश्लेषण: क्या राजनीतिक दलों के लिए ‘बस’ मतदाता ही हैं महिलाएं?

23 Nov 2018
विधानसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस ने महिलाओं को टिकट देने के मामले में की ‘खानापूर्ति’

NOV 23 (WTN) – मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव के लिए सभी राजनीतिक दल मतदाताओं को अपनी तरफ़ लुभाने की कोशिश कर रहे हैं, खासतौर से महिला मतदाताओं को अपनी तरफ़ आकर्षित करने के लिए दोनों ही प्रमुख पार्टियों, भाजपा और कांग्रेस ने महिलाओं की भलाई के लिए काफ़ी वादे और दावे किये हैं। लेकिन भाजपा और कांग्रेस समेत सभी राजनीतिक दलों के लिए महिलाएं मतदाता के रूप में तो महत्वपूर्ण है, लेकिन टिकट देने के मामले में सभी पार्टियां महिलाओं को टिकट देने के मामले में बस खानापूर्ति करती ही नज़र आती हैं।
 
इस बार के विधानसभा चुनाव में मध्य प्रदेश में कुल 459 महिला प्रत्याशी चुनाव मैदान में किस्मत आजमा रही हैं। राजनीति में महिलाओं को बराबरी का हक़ देने से लेकर महिला आरक्षण की बात करने वाली पार्टियां, महिलाओं को टिकट देने के मामले में पीछे ही नज़र आईं हैं। भाजपा ने जहां 25 महिला प्रत्याशियों को टिकट दिया है, तो वहीं कांग्रेस ने 28 महिला प्रत्याशियों को मैदान में उतारा है। इस लिहाज़ से दोनों ही पार्टियों ने कुल सीटों में से सिर्फ़ 10 प्रतिशत सीटों पर ही महिलाओं को टिकट दिया है।
 
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि मध्य प्रदेश में महिला मतदाताओं की संख्या क़रीब 02,41,30,390 है, लेकिन इसके बाद भी महिलाओं को टिकट देने के मामले में सभी राजनीतिक दल कंजूसी ही बरतते नज़र आए हैं। संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की बात तो दूर की है, पार्टियां चुनावों में ही महिलाओं को 33 प्रतिशत टिकट तक नहीं देती हैं।
 
यदि मध्य प्रदेश में हुए पिछले विधानसभा चुनावों पर नज़र डाले तो साफ़ होता है कि मध्य प्रदेश में महिला विधायकों की संख्या कम-ज़्यादा होती रही है। साल 1957 के विधानसभा चुनाव में 15 महिलाएं विधायक बनीं, तो 1962 के चुनाव में भी 15 ही महिलाएं विधायक बन सकीं। 1967 के विधानसभा चुनाव में 10 महिलाओं को ही जीत नसीब हो सकी, तो 1972 के विधानसभा चुनाव में एक भी महिला प्रत्याशी चुनाव जीतकर विधायक नहीं बन सकी।

आपातकाल के बाद साल 1977 में हुए विधानसभा चुनाव में 10 महिलाओं ने जीत हासिल की, तो 1980 के विधानसभा चुनाव में 18 महिलाओं विधायक बनीं। साल 1985 के विधानसभा चुनाव महिला विधायकों की दृष्टि से सबसे ऐतिहासिक थे, क्योंकि इस चुनाव में 31 महिलाएं चुनाव जीतीं जो कि अब तक का रिकॉर्ड है। वहीं 1990 के विधानसभा चुनाव में सिर्फ 11 महिलाएं ही विधायक बन सकीं।
 
1993 के विधानसभा चुनाव में 12 महिलाएं ही चुनाव जीत सकीं, तो 1998 के विधानसभा चुनाव में 26 महिलाओं ने जीत हासिल की। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद साल 2003 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में मध्य प्रदेश में 18 महिलाओं को विधायक बने का मौका मिला, तो साल 2008 के विधानसभा चुनाव में 25 महिलाओं को विधायक बनने का अवसर मिला। वहीं पिछले विधानसभा चुनाव जो कि साल 2013 में हुए थे, उसमें 30 महिलाओं ने जीत हासिल की थी।
 
राजनीतिक दल ज़रूर महिलाओं को टिकट देने के मामले में पीछे हों, लेकिन मतदान करने में महिलाएं किसी से भी पीछे नहीं हैं। साल 2013 के विधानसभा चुनाव में राज्य में 70 प्रतिशत महिलाओं ने वोटिंग में हिस्सा लिया था। लेकिन इतना होने के बाद भी राजनीतिक दलों के लिए महिलाएं सिर्फ़ मतदाता ही हैं, टिकट देने की बारी आती है तो भाजपा और कांग्रेस समेत सभी पार्टियों नाममात्र के टिकट ही महिलाओं को देती हैं।
 
अब देखना होगा कि इस बार कितनी महिलाएं चुनावी जीतने में सफल रहती हैं, क्योंकि इस बार रिकॉर्ड 459 महिला प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं। लेकिन बात करें भाजपा और कांग्रेस की तो दोनों ही पार्टियों ने क़रीब दस प्रतिशत ही टिकट महिलाओं को देकर यह साबित कर दिया है कि इन दोनों ही पार्टियों के लिए अभी भी महिला प्रत्याशियों पर दांव लगाना ख़तरे से खाली नहीं लगता है।
 
भाजपा और कांग्रेस दोनों ही पार्टियों ने उन्हीं सीटों पर महिलाओं को टिकट दिया है जिन सीटों पर उनकी प्रत्याशी या तो विधायक रह चुकी हैं या फ़िर वो सीट उस पार्टी के लिए कमज़ोर है। अब देखना दिलचस्प होगा कि इस बार चुनाव लड़ रहीं 459 महिलाएं कितनी सीटों पर जीत हासिल करती हैं और क्या ज़्यादा से ज़्यादा सीटें जीतकर 1985 के विधानसभा चुनाव का रिकॉर्ड तोड़ पाती हैं कि नहीं जिसमें सबसे ज़्यादा 31 महिलाएं चुनाव जीतकर विधायक बनीं थीं।