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जानिए आईपीसी और सीआरपीसी में अंतर

25 Dec 2018
अपराध की परिभाषा तय करती है आईपीसी, जबकि सीआरपीसी में है अपराधिक मामलों जांच की प्रक्रिया की जानकारी

DEC 25 (WTN) – आपने कई बार आईपीसी और सीआरपीसी के बारे में तो ज़रूर ही सुना होगा, लेकिन क्या आईपीसी और सीआरपीसी के बीच के अंतर को जानते हैं, यदि नहीं जानते हैं तो हम आपको बताते हैं कि इन दोनों के बीच क्या अंतर होता है?
 
भारत के हर नागरिक को देश के क़ानून के बारे में आधारभूत जानकारी ज़रूर होना चाहिए। हर नागरिक को कम से कम इतना ज्ञान तो होना ही चाहिए कि किस सज़ा पर कौन सा क़ानून लागू होता है और कौन सी धारा लगाई जाती है जिसके तहत सज़ा मिलती है। भारत में किसी भी तरह के अपराध होने और उस अपराध की सज़ा मिलने तक की प्रक्रिया में भारतीय दण्ड संहिता यानि कि IPC (Indian Penal Code) और दंड प्रक्रिया संहिता यानि कि CRPC (Code of Criminal Procedure) की मदद ली जाती है।
 
भारतीय दंड संहिता को इंग्लिश में Indian Penal Code और उर्दू में ताज इरात-ए-हिन्द भी कहा जाता है। आपने फिल्मों में देखा होगा कि कोर्ट में जज जब सजा सुनाते हैं तो कहते हैं कि ताज इरात-ए-हिन्द दफ़ा 302 के तहत मौत की सज़ा दी जाती है। ताज इरात-ए-हिन्द का मतलब ही भारतीय दंड संहिता या आईपीसी है।
 
आईपीसी में कुल मिलाकर 23 अध्याय( Chapters) और 511 धाराएं (Sections) हैं। देश में बने पहले विधि आयोग जिसके चेयरपर्सन लॉर्ड मैकॉले थे, इन्हीं की अध्यक्षता में IPC का ड्राफ्ट तैयार किया गया था। साल 1862 से आईपीसी को लागू किया गया। आईपीसी का क़ानून कश्मीर को छोड़कर पूरे भारत में लागू है। जम्मू एवं कश्मीर में 'रणबीर दण्ड संहिता' (RPC) लागू होती है।
 
IPC को लागू करने का मुख्य उद्देश्य था कि सम्पूर्ण भारत में एक ही तरह के क़ानून को लागू किया जा सके, ताकि अलग-अलग क्षेत्रीय कानूनों की जगह एक ही अपराध कोड हो। वहीं सीआरपीसी को हिन्दी में दण्ड प्रक्रिया संहिता कहते है और यह क़ानून सन 1973 में पारित हुआ और 1 अप्रैल 1974 से लागू हुआ था।

आईपीसी और सीआरपीसी में अंतर

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि आईपीसी क़ानून अपराधों के बारे में बताता है उनका वर्गीकरण करता है और उनमें से प्रत्येक के लिए क्या सजा होगी और क्या जुर्माना होगा इसकी जानकारी देता है। वहीं किसी भी प्रकार के अपराध होने के बाद दो तरह की प्रक्रियाएं होती हैं जिसे पुलिस किसी अपराध की जांच करने के लिए अपनाती है। एक प्रक्रिया पीड़ित के सम्बन्ध में और दूसरी आरोपी के सम्बन्ध में होती है। इन्हीं प्रक्रियाओं के बारे में सीआरपीसी के बारे में बताया गया है।

यानि कि आईपीसी अपराध की परिभाषा तय करती है और दण्ड का प्रावधान बताती है साथ ही यह विभिन्न अपराधों और उनकी सजा को सूचीबद्ध करती है। वहीं सीआरपीसी आपराधिक मामले के लिए की गई प्रक्रियाओं के बारे में बताती है कि अपराधी को कैसे गिरफ़्तार किया जा सकता है और कैसे उसकी जमानत होगी आदि।

उदाहरण के तौर पर अगर कोई चोरी करता है, तो आईपीसी की धारा 379 के तहत उसे 3 साल की जेल और जुर्माना भी हो सकता है, वहीं यदि किसी घर में या बिल्डिंग में या किसी परिसर में चोरी होती है तो आईपीसी की धारा 380 के तहत 7 साल की जेल हो सकती है। यानि कि सजा तय करना और सजा कितनी होगी इसका पूरा वर्णन आईपीसी में है।

अब चोर ने चोरी तो कर ली, लेकिन चोर को पकड़ने के लिए क्या प्रक्रिया होगी यानि कि अपराधी कैसे गिरफ़्तार किया जाएगा, किस तरह से अपराध के सबूत इकट्ठा किये जाएंगे, जमानत कैसे दी जाएगी, जमानत के लिए आवेदन कहा देना है, आरोपी के अपराध या निर्दोषता को निर्धारित करना ये सब पुलिस के काम हैं जो कि सीआरपीसी के तहत आते हैं। संक्षेप में अपराध के बाद जांच, परीक्षण, गिरफ़्तारी, जमानत, पूछताछ आदि प्रक्रियाओं की पूरी जानकारी सीआरपीसी में है। वहीं अपराध का निर्णारण और सजा-जुर्माने का प्रावधान आईपीसी में है।