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जानिए क्या है जिनेवा संधि जिसके तहत पाकिस्तान से ‘सुरक्षित’ वापस आ सकते हैं विंग कमाण्डर अभिनन्दन?

28 Feb 2019
युद्धबंदी विंग कमाण्डर अभिनन्दन की जल्द ‘रिहाई’ के लिए भारत सरकार ‘सक्रिय’

FEB 28 (WTN) – पुलवामा में हुए आतंकी हमले के बाद जवाबी कार्रवाई में भारत ने पीओके के बालाकोट में जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी कैम्पों को बुरी तरह से तबाह किया, जिसके बाद से भारत और पाकिस्तान के बीच लगातार तनाव बना हुआ है। 26 फरवरी को भारतीय पक्ष की कड़ी कार्रवाई के बाद पाकिस्तान ने 27 फरवरी को भारतीय वायु सीमा में घुसपैठ की असफल कोशिश की जिसके बाद भारत ने पाकिस्तान के एफ-16 लड़ाकू को मार गिराया। हालांकि इन सबके बीच, भारत का एक मिग विमान हादसे का शिकार हो गया और विंग कमाण्डर अभिनन्दन पाकिस्तान के कब्जे में चले गये। पहले पाकिस्तान ने दो पायलटों की गिरफ्तारी की बात कही थी, लेकिन बाद में पता चला कि एक पायलट तो खुद पाकिस्तान का था।
 
विंग कमाण्डर अभिनन्दन के पाकिस्तान के कब्जे में होने के बाद सभी की निगाहें इस तरफ लगी हुई हैं कि पाकिस्तान उनके साथ कैसा सलूक करता है और क्या विंग कमाण्डर अभिनन्दन पाकिस्तान से भारत वापस आ पाएंगे। लेकिन जिनेवा कंवेश्न के मुताबिक़, पाकिस्तान को भारतीय फायटर पायलट विंग कमाण्डर अभिनन्दन को सकुशल भारत वापस भेजना हो होगा।
 
इन दिनों भारतीय मीडिया में जिनेवा कंवेश्न की काफ़ी चर्चा हो रही है। आख़िर क्या है जेनेवा कंवेश्न और क्या है इसके नियम आइये आपको बताते हैं? दरअसल जिनेवा कंवेश्न युद्धबंदियों के लिए बनाए गये नियमों का चार्टर है। पहले और दूसरे विश्व युद्ध के दौरान सैनिकों के साथ किये गये अमानवीय अत्याचारों के बाद पूरी दुनिया के देशों में एकसुर में जिनेवा संधि पर सहमति बनी और साल 1949 में जिनेवा कंवेश्न पर कई देशों ने हस्ताक्षर किये। इस संधि का मुख्य उद्देश्य युद्ध के दौरान मानवीय मूल्यों को बरकरार रखना था।
 
जिनेवा संधि के मुताबिक़ अगर युद्ध या शान्तिकाल के दौरान कोई जवान या सैन्य अधिकारी शत्रु देश की सीमा में प्रवेश कर जाता है तो उसकी गिरफ्तारी होने पर उसे युद्धबंदी माना जाता है। जिनेवा संधि के तहत शत्रु पक्ष, युद्धबंदियों को ना तो प्रताड़ित कर सकता है और ना ही उन्हें डरा या धमका सकता है। इतना ही नहीं युद्धबंदियों को अपमानित भी नहीं किया जा सकता है। शत्रु पक्ष को जिनेवा संधि के तहत ऐसा कोई भी काम नहीं करना है जिससे आम जनता में युद्धबंदी के बारे में भ्रम या गलत जानकारी पहुंचे।
 
जिनेवा संधि के अनुसार युद्धबंदियों के ख़िलाफ़ बाकयदा मुकादमा चलाया जाएगा। वहीं एक अन्य विकल्प ये भी होता है कि युद्ध समाप्त होने के बाद उन्हें वापस लौटा दिया जाए। जिनेवा संधि के प्रावधानों के अनुसार कोई सैनिक वर्दी में पकड़ा जाता है तो उसके साथ घुसपैठिये के जैसा व्यवहार नहीं किया जा सकता है।
 
हालांकि दुश्मन देश उसे अपने कब्जे में ले सकता है, जिसके बाद युद्धबंदी को अपना नाम, रैंक, नम्बर बताना होता है। दुश्मन देश युद्धबंदी से सिर्फ़ उसके परिवार की जानकारी ही मांग सकता है, लेकिन इसके अलावा कुछ भी पूछताछ करने का दुश्मन देश को कोई अधिकार नहीं होता है। वैसे तो पूरी दुनिया के देश जिनेवा संधि का सम्मान करते हैं, लेकिन कुछ देशों ने समय-समय पर इसका उल्लंघन भी किया है।
 
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि करगिल युद्ध के दौरान भारतीय पायलट नचिकेता को पाकिस्तान ने बंदी बना लिया था। भारत ने नियमानुसार जिनेवा संधि के तहत नचिकेता के मामले को पाकिस्तान के समक्ष रखा। तत्कालीन वाजपेयी सरकार ने जिनेवा संधि के तहत पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाया था, जिसका परिणाम यह हुआ था कि पाकिस्तान सरकार को नचिकेता को वापस भारत भेजना पड़ा था।
 
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि 1965 और 1971 के युद्ध के दौरान पाकिस्तान ने भारत के कई सैनिकों को युद्ध बंदी बनाया था, तो वहीं 1971 में भारत ने पाकिस्तान के 90 हज़ार से ज्यादा सैनिकों को युद्ध बंदी बनाया था, लेकिन दोनों ही देशों ने एक दूसरे के युद्धबंदियों को छोड़ दिया था।
 
जिनेवा संधि के मुताबिक़ दुश्मन देश को युद्ध बंदियों को सुरक्षा देने के साथ-साथ उन्हें सभी तरह की सुविधाएं उपलब्ध करना पड़ती हैं। वहीं संधि के मुताबिक युद्धबंदी पर किसी भी तरह के चिकित्सकीय और वैज्ञानिक प्रयोग की मनाही है। इतना ही नहीं युद्धबंदी के वीडियो और फ़ोटो को सबके सामने लाना भी जिनेवा संधि का उल्लंघन है।