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प्रकृति की अपार शक्तियों के पूजक हैं गोंड आदिवासी

27 Apr 2019

भोपाल 27 अप्रैल: इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय के शैक्षणिक कार्यक्रम ‘‘करो और सीखों‘‘ के अंर्तगत दिनांक 24 अप्रैल से 01 मई 2019 तक आयोजित म. प्र. की पारम्परिक गौंड़ चित्रकला पर पंजीकृत प्रतिभागीयों को प्रदर्शन सह प्रशिक्षण संग्रहालय के जनजातीय आवास की परिचयात्मक दीर्घा में किया जा रहा हैं।
 
संग्रहालय में पंजीकृत प्रतिभागीयों को प्रशिक्षण दे रहें पारम्पारिक कलाकार, राम सिंह उर्वेती ने बताया कि गोंड़, प्रकृतिक की अपार शक्तियों का पूजक आदिवासी है, वे चाँद और सूरज, बादल, बिजली, वर्षा, अग्नि के प्रति पूजा का भाव रखते आऐं है। आदिवासियों का कोई धार्मिक ग्रंथ नहीं होता है जो उनके देवी-देवाता आज्ञा देते है, वह वे करते है।  गोंडों के कई देवी-देवाता हैं, जिन पर उन्हें अटूट विश्वास रहता है। जिनमें से ‘‘बड़ा देव‘‘ सबसे प्रमुख एवं व्यापक देवता है। गोंड समाज में बड़ा देव का स्वरूप सफेद वस्त्रधारी, सफेद दाढ़ी वाला सौम्य पुरूष मान्य है, जिसकी सवारी सफेद घोडा है और हाथ में भाला है। बड़े देव की स्थापना हर ग्राम में पूर्व की ओर होती है। साल में एक बार बड़े देव की सामूहिक पूजा की जाती है। एक चबूतरे पर स्तंभ गाड़ दिया जाता है जहाँ कीलें जड़ी पादुकाएँ रखी जाती है। बड़े देव की अनघड़ मूर्ति उसी चौरा पर स्थापित रहती है। कहीं-कहीं बड़े देव की मडै़या भी ड़ाल दी जाती है। वहीं नारायण देव का स्थान घर की दहलीज में है और वह घर में आने वाली सभी प्रकार की दैवीय बाधाओं जैसे- भूत-प्रेत, बिमारी आदि को दहलीज में ही रोक लेता है। दूल्हा देव रसोई का देवता है और क्रोधी स्वभाव सुरज देव, करूहावीर आदि कई देवताओं की कल्पना गोंड़ मन में रहती है। बुंदेला देव युद्ध के देवता है।
 


इस कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागी गोंड़ अस्थाओं, अनुष्ठानों और विश्वासों को कैनवास में उकेरते हुए उन्हें गहरे रंगों की आड़ी-खड़ी रेखओं से घेरकर चित्रांकन करना सीख रहें हैं। - Window To News