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क्या इमरान खान एक असफ़ल प्रधानमंत्री साबित हो चुके हैं?

08 May 2019
हर क्षेत्र में बदहाल हुआ पाकिस्तान, सवालों के घेरे में इमरान खान
 

MAY 08 (WTN) – भारत में आतंक को बढ़ावा देने के लिए पूरी दुनिया में कुख्यात पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था अब कंगाली की क़गार पर है। बदहाल पाकिस्तान की अब यह हालत हो गई है कि उसका सार्वजनिक कर्ज़ बढ़कर 27.8 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। यानी कि इस तरह से पाकिस्तान अब कर्ज़ के लिए निर्धारित उच्चतम सीमा को भी पार कर चुका है। यह सब होने के बाद पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और उसके लोगों का भविष्य ख़तरे में पड़ गया है।
 
पिछले ही महीने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने यह अनुमान जारी किया था कि वित्त वर्ष 2018-19 में पाकिस्तान का वित्तीय घाटा जीडीपी के 7.9 प्रतिशत तक होगा, और 2019-20 में यह बढ़कर 8.7 प्रतिशत हो जाएगा। वहीं इधर मौजूदा वित्त वर्ष में पाकिस्तान का कर्ज़-जीडीपी अनुपात बढ़कर 72.2 प्रतिशत तक पहुंच गया है, और 2019-20 में यह बढ़कर 75.3 प्रतिशत तक पहुंच जाएगा।
 
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पाकिस्तान के राजकोषीय जवाबदेही और कर्ज सीमा एक्ट 2005 के अनुसार, पाकिस्तान की सरकार इस बात के लिए बाध्य है कि सार्वजनिक कर्ज़ की मात्रा घटाई जाए और उसे एक निर्धारित सीमा के अन्दर रखा जाए। इसके तहत पूर्व निर्धारित योजना थी कि 2017-18 से इसके लिए प्रयास शुरू किये जाएं कि वित्तीय घाटे को तीन साल के अन्दर जीडीपी के 4 प्रतिशत और उसके बाद 3.5 प्रतिशत तक लाया जाए।
 
इसमें यह भी लक्षित था कि कुल सार्वजनिक कर्ज़ को भी घटाकर अगले दो वित्तीय वर्ष के अन्दर जीडीपी के 60 प्रतिशत तक लाया जाएगा। लेकिन जानकारों के मुताबिक़ यह क़ानून कमज़ोर है, क्योंकि इसके उल्लंघन पर सरकार पर कोई जुर्माना नहीं लगता है।
 
इमरान खान की सरकार से पहले नवाज़ शरीफ सरकार ने भी कर्ज़ के इस क़ानून का काफ़ी उल्लंघन किया था। नवाज़ शरीफ के समय में साल 2017-18 में वित्तीय घाटा जीडीपी के 6.5 प्रतिशत तक पहुंच गया था, जबकि मान्य सीमा 4 प्रतिशत ही थी। लेकिन पाकिस्तान में मौजूदा प्रधानमंत्री इमरान खान के कार्यकाल में भी पिछले कुछ महीनों में पाकिस्तान की आर्थिक हालत और भी बदतर हुई है।
 
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पाकिस्तान में मौजूदा वित्त वर्ष में महंगाई दर क़रीब 7.5 प्रतिशत रही है और ब्याज़ दर क़रीब 10.75 प्रतिशत। पाकिस्तान के इस क़ानून के मुताबिक वहां के वित्त मंत्री इस बात के लिए बाध्य हैं कि वे संसद को कर्ज़ सीमा पार करने की जानकारी दें और उसके कारण बताएं। पाकिस्तान का केन्द्रीय बैंक इसके बारे में समय-समय पर सरकार को चेतावनी भी देता रहता है, लेकिन पाकिस्तान की सरकारें इस तरफ़ कोई भी ध्यान नहीं देती हैं।

फ़िलहाल इमरान खान सरकार की नीतियों के कारण पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था क़ंगाली की क़गार पर पहुंच चुकी है। पतन की ओर बढ़ती अर्थव्यवस्था और IMF पैकेज मिलने में हो रही देरी के कारण पिछले महीने पाकिस्तान की S&P वैश्विक रेटिंग में क्रेडिट स्कोर भी कम हो गया था। हाल में पाकिस्तान की केन्द्रीय बैंक ने आर्थिक वृद्धि दर में गिरावट की भविष्यवाणी की थी, जिसके बाद पांच सालों में सबसे ज़्यादा महंगाई के इस दौर में ब्याज़ दरें बढ़ाने का फैसला किया था। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पाकिस्तान की करेंसी रुपये की क़ीमत में भी दिसम्बर 2017 के बाद से 35 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।
 
पाकिस्तान की आर्थिक हालत यह है कि वहां पर हर 10 में से 4 पाकिस्तानी को भूखे पेट सोना पड़ रहा है। लेकिन इसके बाद भी पाकिस्तान खुद के देश के लोगों की आर्थिक दशा सुधारने की बजाय भारत में आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा दे रहा है। अब देखते हैं कि चीन के कर्ज़ में फंसे पाकिस्तान को और कितनी मदद चीन देता है, और चीन यदि मदद देता है तो इसके बदले में क्या मांग वो करता है। क्योंकि विस्तारवादी चीन पहले ही सीपीईसी के बहाने पाकिस्तान के आर्थिक संसाधनों का दोहन कर रहा है, ऐसे में देखना होगा कि पाकिस्तान अब किस क़ीमत पर चीन से कर्ज़ मांगता है।

इस सबके बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि क्या पाकिस्तान के इमरान खान एक असफल प्रधानमंत्री साबित हो चुके हैं। जब से इमरान खान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने हैं तभी से पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति दिनों दिन ख़राब होती जा रही है। कहा जाता है कि इमरान खान सेना की कठपुतली मात्र हैं और पाकिस्तान में अप्रत्यक्ष रूप से सेना ही पूरी सरकार चला रही है। इमरान खान के समय में ही पाकिस्तान, चीन के पूरी तरह से दबाव में आ गया है। वहीं भारत के साथ भी पाकिस्तान के सम्बन्ध ख़राब चल रहे हैं। इन सभी वजहों से कहा जा रहा है कि इमखान खान अभी तक के अपने कार्यकाल में एक असफ़ल प्रधानमंत्री साबित हुए हैं।