HOME WORLD INDIA BHOPAL BUSINESS ENTERTAINMENT SCIENCE & TECHNOLOGY SPORTS HEALTH
WTN SPECIAL GOSSIP CORNER RECIPES DRINKS FUN FACTS WTN HINDI
EDUCATION LIFESTYLE TRAVEL ART & LITERATURE BIG MEMSAAB OPINION & INTERVIEW BrahMos
ABOUT US PRIVACY POLICY SITEMAP CONTACT US
BREAKING NEWS

लोकसभा चुनाव के बाद महंगी बिजली का लग सकता है ‘झटका’!

11 May 2019
घाटा पूरा करने बिजली कम्पनियों ने बनाया ‘दबाव’, महंगी हो सकती है बिजली

MAY 11 (WTN) – विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में लोकसभा चुनाव की प्रक्रिया जारी है। 23 मई को लोकसभा चुनाव के परिणाम आएंगे, जिसका सभी को इंतज़ार है। चुनाव के चलते इस समय देश में आचार संहिता लगी हुई है, जिसके कारण कई ‘महत्वपूर्ण फ़ैसले’ नहीं लिये जा सकते हैं। लोकसभा चुनाव के बाद आचार संहिता हटते ही कई महत्वपूर्ण फ़ैसले लिये जाने हैं। इन्हीं कई फैसलों में से एक फ़ैसला आपको ‘झटका’ दे सकता है।
 
दरअसल, मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक़, लोकसभा चुनाव के बाद बिजली कम्पनियां बिजली की दरें बढ़ाने की तैयारी में हैं। जीहां लोकसभा चुनाव की प्रक्रिया ख़त्म होते है बिजली के दाम बढ़ सकते हैं। जानकारी के अनुसार, लोकसभा चुनाव के बाद बिजली की दरों में 5 से 10 प्रतिशत तक की वृद्धि हो सकती है, जो कि उपभोक्ताओं के लिए बहुत बड़ा ‘झटका’ होगा।
 
बिजली की दरें बढ़ाने के पीछे बिजली कम्पनियां का ‘तर्क’ है कि लगातार हो रहे घाटे के कारण वे ऐसा करने के लिए ‘मज़बूर’ हैं। लोकसभा चुनाव के चलते आचार संहिता लगी होने के कारण कई राज्यों ने बिजली की दरें नहीं बढ़ाई हैं। लेकिन घाटा पूरा करने के लिए बिजली कम्पनियां का दबाव है कि बिजली की दरें बढ़ाई जाएं।
 
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ‘उदय स्कीम’ के तहत बिजली की दरें सालाना बढ़ाना ज़रूरी है। ऐसा इसलिए क्योंकि इससे बिजली बनाने वाली कम्पनियों को ‘फ़ायदा’ होगा और वे नुकसान में नहीं रहेंगी। कहा जा रहा है कि ऊर्जा मंत्रालय लोकसभा चुनाव ख़त्म होने का ‘इंतज़ार’ कर रहा है। चुनाव के बाद मंत्रालय वित्तीय हालत में सुधार के लिए ‘रणनीति’ पर काम करेगा। रणनीति के तहत बिजली की दरें बढ़ाना सबसे ‘बढ़िया’ विकल्प है।
 
यदि बिजली की दरें बढ़ती हैं तो इससे वितरण कम्पनियों की हालत में ‘सुधार’ होगा। वितरण कम्पनियों की हालत में सुधार होने से जेनरेशन कम्पनियों को फ़ायदा होगा। इस तरह बिजली कम्पनियां का ‘घाटा’ पूरा हो सकेगा। वहीं लगातार हो रहे घाटे से उबारने के लिए सरकार ‘सख़्त रवैया’ भी अपना सकती है।
 
अब जबकि बिजली की दरें बढ़ेंगी तो इसका भार पूरी तरह से उपभोक्ताओं पर आएगा। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि 20 राज्यों ने बिजली वितरण घाटे के लक्ष्य को अभी तक पूरा नहीं किया। जानकारी के मुताबिक़, मार्च 2019 तक 15 प्रतिशत बिजली वितरण घाटे के लक्ष्य को हासिल करना था, लेकिन यह लक्ष्य पूरा नहीं हो सका है।
 
दरअसल, ‘कल्याणकारी योजनाओं’ के तहत राज्य सरकारें ग़रीबों को कम दरों पर बिजली मुहैया कराती है। वहीं बिजली चोरी और अन्य तकनीकी कारणों से राज्य सरकारों और बिजली कम्पनियों को घाटा होता है। इतना ही नहीं, बिजली बोर्ड और बिजली कम्पनियों के अधिकारियों-कर्मचारियों के वेतन-भत्तों का भार भी बढ़ रहा है।
 
इस क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि बिजली कम्पनियों को बिजली चोरी के साथ-साथ तकनीकी कारणों से होने वाले बिजली लॉस को रोकना होगा। यदि इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले समय में इसका ‘ख़ामियाज़ा’ आख़िरकार उपभोक्ताओं को ही उठाना पड़ेगा। अब देखते हैं कि चुनाव के बाद बिजली की दरों में कितनी वृद्धि होती है? और इस वृद्धि के बाद भी  क्या बिजली कम्पनियों का घाटा पूरा हो पाता है कि नहीं?