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क्या खुद को बदलेंगे राहुल गांधी?

12 Jun 2019
राहुल गांधी को खुद में एक बदलाव की ज़रूरत!
 
JUNE 12 (WTN) - लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद राहुल गांधी ने हार की ज़िम्मेदारी लेते हुए कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया था, जिसे वे वापस नहीं लेने की जिद पकड़े हुए हैं। राहुल गांधी की इच्छा है कि अब कांग्रेस अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी उसे दी जाए जो कि गांधी परिवार से ना हो। लेकिन जैसा कि आप जानते हैं कि कांग्रेस पार्टी में सभी कुछ गांधी परिवार के इर्द गिर्द ही है, तो लगता नहीं है कि ऐसा हो पाए कि कांग्रेस पार्टी में गांधी परिवार से अलग कोई राष्ट्रीय अध्यक्ष बने।

लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की ऐतिहासिक हार के बाद राहुल गांधी ने अपने पद से इस्तीफ़ा देकर यह जताने की कोशिश की है कि वे नैतिक रूप से पार्टी की हार की ज़िम्मेदारी खुद लेते हैं। कहा जा रहा है कि राहुल गांधी पार्टी की हार के बाद कुछ समय के लिए ज़िम्मेदारियों से मुक्ति चाहते हैं ताकि एक बार फ़िर से नई ऊर्जा के साथ पार्टी को खड़ा किया जा सके।

राहुल गांधी लोकसभा चुनाव में कहां पर चूके इस पर लम्बी बहस हो सकती है, लेकिन इतना तो तय है कि राहुल गांधी इस समय प्रधानमंत्री मोदी की तरह करिश्माई नेता नहीं हैं। 2014 से लेकर 2019 तक राहुल गांधी ने कई ऐसी राजनीतिक ग़लतियां की हैं, जिनका ख़ामियाज़ा उन्हें लोकसभा चुनाव में हार के रूप में देखना पड़ रहा है। ये वो ग़लतियां हैं जिनसे राहुल गांधी बच सकते थे, लेकिन उनके सलाहकारों ने उन्हें शायद उचित सलाह नहीं दी जिसके कारण कांग्रेस पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा है।  

अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर कन्हैया कुमार का समर्थन हो या फ़िर देशद्रोह का क़ानून ख़त्म करने की वकालत। कश्मीर में पत्थरबाजों के लिए सहानुभूति हो या फ़िर AFSPA हटाने का वादा, ये वो ग़लतियां हैं जो कि राहुल गांधी को लोकसभा चुनाव में भारी पड़ गईं। लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी ने इन्हीं मुद्दों पर राहुल गांधी को जमकर घेरा और अपने राष्ट्रवादी एजेंडे के दम पर भाजपा को 303 सीटों पर जीत दिला दी।

चुनाव प्रचार के समय भी राहुल गांधी ने 'परिपक्वता' का परिचय नहीं दिया। राहुल गांधी ने राफेल के मुद्दे पर प्रधानमंत्री मोदी को अप्रत्यक्ष रूप से 'चोर' कहा, जिसका काफ़ी 'नकारात्मक' असर कांग्रेस पार्टी के चुनाव प्रचार पर पड़ा। वहीं बालाकोट आतंकी हमले के बाद भारतीय वायु सेना द्वारा की गई एयर स्ट्राइक के बाद जिस तरह के नकारात्मक बयान कांग्रेस पार्टी के नेताओं के तरफ़ से आए, उन पर अंकुश ना लगाकर राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी को जीत का तोहफा ही दे दिया।
 
मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में कई ऐसे मौक़े आए जब राहुल गांधी, मोदी सरकार का विरोध करते-करते ऐसे लोगों का समर्थन करने लगे जो देश की बहुसंख्यक जनता की नज़रों में 'देश विरोधी' हैं। वहीं कांग्रेस पार्टी के नेता नरेन्द्र मोदी के व्यक्तिगत जीवन पर आरोप लगाते रहे, लेकिन राहुल गांधी ऐसे नेताओं को रोकने में 'नाकामयाब' ही साबित रहे। ऐसे में नरेन्द्र मोदी की 'ईमानदार' और 'राष्ट्रवादी' छवि उन पर लगे आरोपों पर भारी पड़ी और मोदी ने लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी को बुरी तरह से शिकस्त दी।
 
लोकसभा चुनाव के दौरान राहुल गांधी 'अति आत्मविश्वास' में भी नज़र आए। राहुल गांधी सोचकर चल रहे थे कि जिस तरह से 2004 में वाजपेयी सरकार की हार हुई थी उसी तरह से मोदी सरकार की भी हार होगी। इसी अति आत्मविश्वास के कारण चौथे दौर के चुनाव के बाद राहुल गांधी कहते नज़र आए कि मोदी सरकार हार रही है। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने काफ़ी 'सूझबूझ' से अपनी रणनीति के तहत चुनाव प्रचार किया और राहुल गांधी के हर आरोपों का जमकर जवाब दिया।
 
हार के बाद सबक सीखने के ज़रूरत होती है। राहुल गांधी के लिए भी यह समय एक सबक सीखने का है कि आख़िर वे कहां पर ग़लत हैं। राहुल गांधी को आने वाले पांच सालों में खुद को काफ़ी 'परिपक्व' करना होगा ताकि 2024 के लोकसभा चुनाव में वे मोदी सरकार से टक्कर ले सकें।

ना केवल राहुल गांधी को खुद में परिवर्तन करना होगा, बल्कि अपनी पार्टी के नेताओं में भी 'बदवाव' लाना होगा। ऐसा इसलिए, क्योंकि यदि कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने खुद में बदलाव नहीं लाया और मोदी के विरोध में उन लोगों के साथ खड़े नज़र आए जो कि देश की जनता की नज़र में 'देश विरोधी' हैं, तो ऐसे में 2024 लोकसभा चुनाव में भी जात हासिल करना राहुल गांधी के लिए किसी सपने से कम नहीं है। देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी के एक बड़े नेता से यह 'आशा' की जा सकती है कि वे आने वाले पांच सालों में खुद को और अपनी पार्टी को बदलेंगे ताकि एक मज़बूत विपक्ष देश को मिल सके।