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अब आप जो विचार करेंगे वो होगा अपने आप टाइप!

01 Aug 2019
मस्तिष्क के संकेतों को डिकोड करने की कोशिश कर रहे वैज्ञानिक
 
AUG 01 (WTN) – आज से क़रीब 200 साल पहले क्या कभी किसी ने कल्पना की थी कि इंसान हवा में उड़ सकता है, दूर बैठे लोगों से बातचीत हो सकती है या फ़िर दुनिया के किसी कोने में हो रही किसी घटना को वो किसी बक्से (टीवी) में देख सकता है। सालों पहले यह सभी काम काल्पनिक थे, लेकिन आज यह सभी काम सम्भव हैं और यह सब सम्भव हो सका है विज्ञान के कारण। वैज्ञानिकों का मानना है कि मानव ने अभी तक जितने भी अविष्कार किये हैं वे सब मानव मस्तिष्क के कारण ही सम्भव हो सके हैं। कई वैज्ञानिकों का मानना है अभी और भी ऐसे कई अविष्कार मनुष्य के मस्तिष्क से होंगे जिससे मानव सभ्यता बहुत बदल जाएगी।

जैसा कि आप जानते हैं कि मोबाइल या कम्प्यूटर पर हाथों से टाइप करना एक आम बात है। और तो और अब वॉइस राइटर सॉफ्टवेयर भी आ गया है, यानी कि आप बोलते जाइये और सॉफ्टवेयर आपकी कही बात को टाइप करता जाएगा। लेकिन यदि हम आपसे कहें कि अब एक ऐसी टेक्नोलॉजी आ रही है, जिसकी मदद से आप जो भी सोचेंगे वो अपने आप टाइप हो जाएगा। तो यह पढ़कर आप सच में आश्चर्यचकित हो गये होंगे कि सच में क्या आख़िर ऐसी कोई टेक्नोलॉजी हो सकती है? क्या है यह पूरा मामला? आइये आपको विस्तार से बताते हैं।

दरअसल, फेसबुक अब एक ऐसी टेक्नोलॉजी प्रस्तुत करने जा रहा है, जिसकी मदद से आप जो भी विचार करेंगे, वो अपने आप टाइप हो जाएगा। जानकारी के मुताबिक़, फेसबुक ब्रेन-रीडिंग कम्प्यूटर को जल्द ही पूरी दुनिया के सामने लाने वाला है। कम्पनी ने इस अभूतपूर्व आइडिया को साल 2017 में डेवलपर कॉन्फ्रेंस में सबके सामने प्रस्तुत किया था। इस बारे में फेसबुक कम्पनी का कहना है कि उसने इस आइडिया को असलियत में उतारने के लिए काफ़ी सफलता हासिल कर ली है। फेसबुक कम्पनी का कहना है कि वो एक वियरेबल डिवाइस डेव्लप करने जा रही है, जिसकी मदद से लोग जो भी सोचेंगे वो हाथों से टाइप किये बिना ही टाइप हो जाएगा।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि फेसबुक रिएलिटी लैब्स इस टैक्नोलॉजी पर यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के रिसर्चर्स के साथ मिलकर काम कर रहा है। इस पूरे प्रोजेक्ट पर रिसर्चर्स ब्रेन-कम्प्यूटर इंटरफेस का इस्तेमाल कर इंसान के दिमाग से सीधे स्पीच को स्क्रीन पर डिकोड कर रहे हैं। इस स्टडी के लिए रिसर्चर्स तीन मरीजों के साथ काम कर रहे हैं, जिनका मिरगी का इलाज चल रहा है।
 
जानकारी के अनुसार इस टेक्नोलॉजी की टेस्टिंग के लिए रिसर्चर्स को क़रीब एक साल का समय लगेगा। हालांकि, फेसबुक ने स्पष्ट कर दिया है कि उपभोक्ताओं को इस टेक्नोलॉजी के लिए अभी इंतज़ार करना पड़ सकता है। फेसबुक कम्पनी ने साथ ही यह भी कहा है कि अभी इस टेक्नोलॉजी पर काफ़ी काम करना बाक़ी है, और दावे के साथ नहीं कहा जा सकता है कि यह टेकनोलॉजी पूरी तरह से भरोसेमंद ही है।

मस्तिष्क के संकेतों को डिकोट करके उसे टाइप करने वाली टेक्नोलॉजी पर अकेली फेसबुक कम्पनी ही काम नहीं कर रही है। इससे पहले टेस्ला ने Neuralink इवेंट में कहा था कि कम्पनी साल 2020 के आख़िरी से पहले इस टेक्नोलॉजी पर ह्यूमन ट्रॉयल्स शुरू कर देगी। अब देखना होगा कि कौन सी कम्पनी मस्तिष्क के संकेतों को डिकोड करके उसे टाइप करने वाली टेक्नोलॉजी को सबसे पहले दुनिया के सामने लाती है।

ख़ैर यह टेक्नोलॉजी जब उपयोग में आएगी तब ही इसके गुणदोषों पर स्तरीय चर्चा हो सकेगी। लेकिन कहा जा रहा है कि इस तरह की टेक्नोलॉजी के उपयोग से मानव मस्तिष्क पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। ऐसा इसलिए, क्योंकि मस्तिष्क में एक समय में काफ़ी विचार आते रहते हैं और इन विचारों की कोई सीमा नहीं हैं। ऐसे में मस्तिष्क पर यदि ज़ोर दिया गया और उसमें कोई ऐसी डिवाइस लगाए गई जिससे हानिकारक किरणें निकलती हैं तो यह मानव मस्तिष्क के लिए काफ़ी ख़तरनाक साबित हो सकता है।