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वैश्विक आर्थिक मंदी का भारत में दिख रहा असर; भारत में कताई उद्योग की टूटी कमर!

20 Aug 2019
यदि नहीं मिली सरकार से ‘राहत’ तो दम तोड़ देगा कताई उद्योग!

AUG 20 (WTN) – वैश्विक आर्थिक मंदी का असर धीरे-धीरे भारत में दिखने लगा है। जैसा कि आप जानते हैं कि इस समय देश में ऑटो इंडस्ट्री भारी मंदी का सामना कर रही है। इसी कड़ी में करोड़ों लोगों को रोज़गार देने वाला टैक्सटाइल उद्योग और कताई उद्योग भी मंदी की चपेट में आ गया है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस समय कताई उद्योग अभी तक के सबसे बड़े आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है।

इस सेक्टर की हालत यह हो गई है कि क़रीब एक-तिहाई कताई उत्पादन क्षमता देश की बंद हो चुकी है, और कताई की जो मिलें चल रही हैं उन्हें घाटे का सामना करना पड़ रहा है। आख़िर क्या कारण है कि कताई उद्योग इतने बड़े संकट का सामना कर रहा है? आइये आपको विस्तार से बताते हैं।

जिस मंदी के दौर से कताई उद्योग गुजर रहा है उससे धीरे-धीरे हज़ारों लोगों की नौकरियां जा रही हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि कॉटन और ब्लेंड्स स्पाइनिंग इंडस्ट्री कुछ उसी तरह के संकट से गुजर रही हैं, जिस संकट का सामना उसने साल 2010-11 में किया था। मंदी की इस मार के कारण इस समय कताई मिलें इस हालात में नहीं हैं कि वे भारतीय कपास ख़रीद सकें। कहा जा रहा है कि यदि मंदी की यही हालत रही है तो अगले सीजन में बाज़ार में आने वाली क़रीब 4 करोड़ गांठ कपास का कोई ख़रीदार नहीं मिलेगा, जिनकी कि क़ीमत क़रीब 80,000 करोड़ रुपये है।

जानकारी के मुताबिक़, केन्द्र और राज्य के जीएसटी और अन्य टैक्स के कारण भारतीय यार्न वैश्विक बाज़ार में प्रतिस्पर्धा के लिए संघर्ष कर रहा है। आंकड़ों की मानें तो अप्रैल से जून की तिमाही में कॉटन यार्न के निर्यात में साल-दर-साल 34.6 प्रतिशत की गिरावट आई है, जो कि चिंता का कारण है। इधर रूई के स्टॉकिस्टों ने कई अरब रुपए की रुई गांठें स्टॉक कर रखी हैं। लेकिन देश में इस बार आयात दोगुने से भी ज़्यादा होने से ऐसा लगता है कि स्टॉकिस्टों को बुरी तरह से झटका लगने वाला है।

कताई मिलों की हालात ख़राब होने के बाद जाहिर है कि वे शायद ही रूई की ख़रीदी करें। यदि ऐसा होता है तो इससे कपास उत्पादन करने वाले किसानों और रूई के स्टॉकिस्टों को भारी नुकसान हो सकता है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि कपास सत्र 2019-20 के लिए उत्तर क्षेत्रीय राज्यों में कपास की 10 से 12 प्रतिशत ज़्यादा बुआई हुई है। ऐसे में यदि कताई मिलों ने रूई नहीं ख़रीदी, तो इससे जुड़े व्यापारियों और किसानों का नुकसान होना स्वाभाविक है।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारतीय टेक्सटाइल इंडस्ट्री में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से करीब 10 करोड़ लोगों को रोज़गार मिला हुआ है। खेती-किसानी के बाद यह सेक्टर सबसे ज़्यादा रोज़गार देने वाला सेक्टर है। यदि इस सेक्टर में मंदी इसी तरह से जारी रही तो बड़े पैमाने पर लोगों के बेरोज़गार होने की आशंका है। इसी के चलते नॉर्दर्न इण्डिया टेक्सटाइल मिल्स एसोसिएशन ने सरकार से मांग की है कि तुरन्त ही सरकार को कोई ठोस क़दम उठाना चाहिए, जिससे लाखों लोगों की नौकरी जाने से बच जाए।
 
दरअसल, इस सेक्टर में मंदी के कई कारण हैं। कर्ज़ पर ऊंची ब्याज दर, कच्चे माल की ऊंची लागत, कपड़ों और यार्न के सस्ते आयात जैसी कई समस्याओं के कारण यह उद्योग अब धीरे-धीरे मंदी के कारण तबाह होता जा रहा है। जानकारी के मुताबिक़, भारतीय मिलों को कच्चे माल की ऊंची दर के कारण प्रति किलो 20 से 25 रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है। वहीं श्रीलंका, बांग्लादेश और इण्डोनेशिया जैसे देशों से सस्ते कपड़े के आयात के कारण भी भारत के इस उद्योग को कड़ी प्रतिस्पर्धा करना पड़ रही है।

कहा जा रहा है कि यदि कपड़ा और कताई उद्योग के लिए केन्द्र सरकार ने कोई विशेष पैकेज जारी नहीं किया तो इन पर गहरा रहा संकट और भी गहरा हो जाएगा। इस उद्योग से जुड़े लोगों की मांग है कि इस सेक्टर की स्थिति सुधारने के लिए एक विशेष 6 सदस्यीय टेक्सटाइल्स कमेटी का गठन करना चाहिए। साथ ही सरकार को आयात सीमित करने के साथ उस पर हैवी ड्यूटी लगाना चाहिए, जिससे स्थानीय कताई मिलों को राहत मिल सके और वे प्रतिस्पर्धा कर सकें। सरकार को चाहिए कि इस सेक्टर के लिए सस्ती ब्याज दर पर कर्ज़ मुहैया कराया जाना चाहिए। यदि समय रहते सरकार ने इस बातों की तरफ़ ध्यान नहीं दिया, तो आने वाले समय में इस सेक्टर से जुड़े लाखों लोगों को बेरोज़गार होने से कोई नहीं रोक सकता।