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जानिए क्यों व्हाट्सएप और फेसबुक पर लगाम कसने की तैयारी में है सरकार?

09 Oct 2019
क़ानून के दायरे में आएंगे व्हाट्सएप, फेसबुक और नेटफ्लिक्स जैसे प्लेटफॉर्म्स, तय होगी जवाबदारी!

OCT 09 (WTN) – जैसा कि आप जानते हैं कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। और दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के कारण भारत में लोगों को जितनी वैचारिक स्वतंत्रता मिली हुई है, उतनी वैचारिक स्वतंत्रता शायद किसी और देश में उसके नागरिकों को नहीं मिलती है। लेकिन पाकिस्तान जैसे आतंक परस्त पड़ोसी देश के होते हुए भारत सरकार को सुरक्षा के मद्देनज़र काफ़ी कुछ कड़े नियम बनाने पड़ते हैं ताकि आतंकियों और देश विरोधी समूहों की देशी विरोधी विचारधारा फ़ैलने पर लगाम लगाई जा सके।

जैसा कि आप जानते हैं कि इंटरनेट के इस युग में सोशल मीडिया और इंटरनेट आधारित अन्य प्लेटफॉर्म्स के ज़रिये विचारों की अभिव्यक्ति सामान्य सी बात है। इसलिए भारत सरकार को सोशल मीडिया और अन्य प्लेटफॉर्म्स के कारण सुरक्षा की चिन्ता सता रही है। इन्हीं सब कारणों से व्हाट्पएप, फेसबुक, गूगल और दूसरे ओवर द टॉप (OTT) प्लेटफॉर्म्स टेलिकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ़ इण्डिया (TRAI) के निगरानी में हैं।

सबसे पहले आपको बताते हैं कि आख़िर ओवर ट टॉप सर्विस प्रोवाइडर्स या ओटीटी कम्पनियां क्या होती हैं? दरअसल, 'ओवर द टॉप' सर्विस प्रोवाइडर्स या ओटीटी कम्पनियां वो होती हैं, जो कि दूरसंचार नेटवर्क कम्पनियों द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले इंटरनेट के सहारे अपनी सेवाएं देती हैं। इनमें स्काइप, वाइबर, व्हाट्सएप, हाइक, स्नैपचैट जैसी मैसेजिंग और इंटरनेट फोन सेवाएं देने वाली विभिन्न कम्पनियां शामिल हैं। वहीं इसके अलावा ऑनलाइन इंटरटेनमेंट प्रदान करने वाली कम्पनियां जैसे कि नेटफ्लिक्स, अमेज़न प्राइम, हॉटस्टार, जी5 और आल्ट बालाजी आदि भी ओटीटी का हिस्सा हैं।

भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में इन्हीं सब के ज़रिये यूज़र्स मैसेजिंग और कॉलिंग का इस्तेमाल करते हैं और इंटरटेनमेंट का आनन्द लेते हैं। लेकिन अब TRAI ने ओवर द टॉप (OTT) सर्विस प्रोवाइडर्स को रेगुलेट करने को लेकर डिपार्टमेंट ऑफ टेलिकम्यूनिकेशंस (DoT) को सुझाव दिए हैं। यदि दूरसंचार विभाग ने TRAI के सुझावों को मान लिया तो व्हाट्सएप, फेसबुक और गूगल जैसे इंटरनेट के सहारे तरह-तरह की सेवाएं देने वाली ओवर द टॉप कम्पनियां क़ानून के दायरे में आ जाएंगी।
 
दरअसल, कहा जा रहा है कि नियमों में ख़ासकर सुरक्षा और वैध रूप से दख़ल देने पर जोर दिया जा रहा है। हालांकि, OTT के लिए नियमों को अंतिम रूप देने में TRAI को एक महीने का अतिरिक्त समय लग सकता है। ऐसा इसलिए, क्योंकि ट्राई इस सम्बन्ध में OTT पर अंतर्राष्ट्रीय नियम-विनियम को देख रहा है। लेकिन उसका विशेष ध्यान सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर है। कहा जा रहा है कि OTT पर नियम बनाने को लेकर नियामक ‘व्यावहारिक धारणा’ अपनाने के पक्ष में है।
 
लेकिन तर्क दिया जा रहा है कि इस तरह की रेगुलरेटिंग से विचारों की आज़ादी पर पहरा लग सकता है। वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दें कि OTT के उपयोग से दूरसंचार सेवाप्रदाताओं को भी लाभ हुआ है, क्योंकि लोगों का इंटरनेट उपभोग बढ़ा है। ऐसे में दूरसंचार कम्पनियों का इनके मुफ़्त सेवाएं देने का तर्क बहुत ज़्यादा मान्य नहीं रह गया है। यानी कि साफ़ ज़ाहिर है कि OTT नियमों के बारे में आर्थिक पक्ष उतना महत्वपूर्ण नहीं रह गया है।
 
अब जबकि OTT नियमों में आर्थिक पक्ष की जगह पर सुरक्षा बड़ा मुद्दा बन गया है, तो ऐसे में सवाल उठता है कि सुरक्षा चिंताओं का समाधान कैसे किया जाना है और भारत के अलावा अन्य देश इससे जुड़ी सुरक्षा सम्बन्धित चिंताओं से कैसे निपट रहे हैं। यानी कि साफ़ है कि नियमों से जुड़ी समस्या अब सीमित हो चुकी है और अब यह उतनी जटिल और बड़ी नहीं है जितनी कि पहले थी।
 
TRAI की यह कवायद आज की नहीं है बल्कि पिछले साल TRAI ने ओटीटी कम्पनियों को नियामकीय ढांचे के दायरे में लाने के लिए एक परिचर्चा पत्र पेश किया था। जिसके बाद इनमें से कई प्लेटफॉर्म सरकार की निगरानी के दायरे में आ गए। इसी कारण से सरकार का सूचना प्रौद्योगिकी क़ानूनों में भी बदलाव का प्रस्ताव है ताकि इन कंपनियों के लिए बेहतर जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके।
 
यानी कि साफ़ ज़ाहिर है कि व्हाट्पएप, फेसबुक, गूगल और दूसरे ओवर द टॉप (OTT) प्लेटफॉर्म्स जैसे कि नेटफ्लिक्स, अमेजन और हॉटस्टार सुरक्षा के मुद्देनज़र निगरानी में रहेंगे। दरअसल, आतंक, नक्सलवाद और अलगाववाद से प्रभावित भारत जैसे देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर इन प्लेटफॉर्म्स से कई बार समाज और देश विरोधी कंटेंट का आदान-प्रदान होता रहा है। वहीं इन प्लेटफॉर्म्स पर चूंकि किसी भी तरह की कोई भी रेगुरेटरी नहीं है इसलिए इन प्लेटफॉर्म्स के ज़रिये अश्लीलता फ़ैलाने के आरोप भी लगे हैं। इन्हीं सब के कारण अब जल्द ही ओवर द टॉप कम्पनियां क़ानून दायरे में आ जाएंगी, जिससे यह अपने कंटेंट और प्रसारण के लिए ज़िम्मेदार होंगी और किसी भी तरह की ग़लती के लिए इनकी ज़िम्मेदारी तय की जाएगी।