...तो इससे टैक्सपेयर्स भी ख़ुश और कॉरपोरेट सेक्टर भी ख़ुश!
OCT 22 (WTN) – अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुताबिक़, भारत समेत दुनिया की 90 प्रतिशत अर्थव्यवस्थाएं इस समय आर्थिक मंदी का सामना कर रही हैं। जहां तक भारत की अर्थव्यवस्था की बात है, तो लगातार विकास करती भारत की अर्थव्यवस्था पर वैश्विक आर्थिक मंदी का ज़्यादा असर पड़ा है। आर्थिक मंदी का असर कॉरपोरेट सेक्टर के साथ-साथ देश की विकास दर पर भी पड़ा है। लेकिन मंदी से जूझ रही मोदी सरकार पूरी कोशिश कर रही है कि देश के लोगों को आर्थिक मंदी से ज़्यादा परेशानी का सामना ना करना पड़े।
आर्थिक मंदी से निपटने के उपायों के बीच मोदी सरकार ने कुछ दिनों पहले कॉरपोरेट टैक्स में कटौती की थी और उसे 25 प्रतिशत के स्तर पर ले आई थी। मोदी सरकार ने ऐसा इसलिए किया था ताकि कॉरपोरेट सेक्टर मंदी का सामना कर सके। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अर्थशास्त्र का एक सिद्धांत है कि जब लोगों के पास पैसा होता है तो वे इसे ख़र्च करते हैं और इन पैसों का निवेश करते हैं।
यानी कि जब लोग ख़र्च करेंगे तो बाज़ार में पैसा आएगा और इसी से अर्थव्यवस्था को गति मिलती है अब चूंकि इस समय आर्थिक मंदी चल रही है, तो ऐसे में लोग बचत कर रहे हैं जिससे अतिरिक्त पैसा बाज़ार में नहीं आ रहा है। लोगों द्वारा पैसा कम ख़र्च करने के कारण बाज़ार में डिमाण्ड कम हो गई है, जिसके कारण कॉरपोरेट सेक्टर को मंदी का सामना करना पड़ रहा है।
लोगों के पास अतिरिक्त पैसा आ सके और वे इसे ख़र्च कर सकें, इसलिए मोदी सरकार अब आम नागरिकों को इनकम टैक्स में राहत देने जा रही है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि नीति आयोग के पूर्व चेयरमैन अरविंद पनगढ़िया ने कुछ दिनों पहले कहा था कि मज़बूत सम्भावना है कि व्यक्तिगत आयकर में काफ़ी सुधार हो सकता है, और इसका पूरा फ़ायदा टैक्सपेयर्स को मिल सकता है।
दरअसल, इनकम टैक्स एक्ट में बदलाव के लिए अखिलेश रंजन की अगुआई वाली टास्कफोर्स ने भी सिफारिश की है। यह कमेटी अगस्त महीने में ही डायरेक्ट टैक्स कोड पर अपनी रिपोर्ट सौंप चुकी है। हालांकि, अभी तक इस रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया गया है।
आख़िर क्या कुछ फ़ायदा एक आम टैक्सपेयर को मोदी सरकार दे सकती है, आइये इसके बारे में आपको विस्तार से बताते हैं। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक़, इनकम टैक्स स्लैब में प्रस्तावित बदलाव में स्लैब के दायरे को बढ़ाया जा सकता है। कहा जा रहा है कि 10 प्रतिशत टैक्स स्लैब को 10 लाख रुपये तक बढ़ाया जा सकता है। यदि मोदी सरकार ऐसा करती है तो इससे इनकम टैक्स भरने वाले क़रीब 27 प्रतिशत लोगों को फ़ायदा होगा।
केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक़, वित्त वर्ष 2017-18 के दौरान कुल 5,52 करोड़ टैक्सपेयर्स में से करीब 27 प्रतिशत टैक्सपेयर्स की आय 5 से 10 लाख रुपये की बीच रही थी। यदि मोदी सरकार टास्कफोर्स की रिपोर्ट के आधार पर इनकम टैक्स स्लैब में बदलाव करती है, तो इससे 1.47 करोड़ टैक्सपेयर्स 20 प्रतिशत के टैक्स स्लैब से 10 प्रतिशत के टैक्स स्लैब में आ जाएंगे।
वित्तीय मामलों के जानकारों के मुताबिक़, यदि सरकार ऐसा करती है तो इससे छोटे टैक्सपेयर्स पर कुछ ख़ास असर नहीं होगा। कहा जा रहा है कि सम्भावित इनकम टैक्स स्लैब में बदलाव से 5 से 6 लाख की आय वाले लोगों की टैक्स देनदारी में कोई ख़ास फ़र्क नहीं आएगा। सम्भावना है कि इस तरह के बदलाव से वे कुछ डिडक्शन्स के ज़रिए टैक्स के दायरे से बाहर आ जाएं।
अनुमान लगाया जा रहा है कि यदि इनकम टैक्स स्लैब में बदलाव होता है, तो इससे 7 लाख रुपये और उससे ज़्यादा कमाने वालों को टैक्स में 9.5 प्रतिशत से लेकर और भी ज़्यादा बचत हो सकती है। सम्भावना व्यक्त की जा रही है कि यदि कोई 10 लाख रुपये सालाना कमाता है तो उसे बदलाव के बाद टैक्स में क़रीब 34 प्रतिशत का फ़ायदा मिल सकता है। यानी कि साफ़ ज़ाहिर है कि टैक्स स्लैब में सम्भावित बदलाव से 5 लाख रुपये सालाना से ज़्यादा कमाने वालों को फ़ायदा मिलेगा और उनकी बचत होगी।
वहीं केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड के डेटा के अनुसार, अगर टैक्स स्लैब में और बदलाव होते हैं तो इससे 40 लाख लोग 30 प्रतिशत टैक्स स्लैब से 20 प्रतिशत वाले टैक्स स्लैब में आ जाएंगे। यानि कि जिनकी सालाना कमाई 20 लाख रुपये से ज़्यादा है, उन्हें टैक्स में 35 प्रतिशत तक की बचत होगी, यानी कि क़रीब एक लाख रुपये तक की सालाना बचत।
वहीं टास्कफोर्स ने 35 प्रतिशत का एक नया टैक्स स्लैब भी लाने की सिफारिश की है। इस स्लैब में 2 करोड़ रुपये से ज़्यादा की वार्षिक कमाई करने वाले लोगों को रखा जा सकता है। ऐसे में 24 प्रतिशत सरचार्ज और 3 प्रतिशत सेस के बाद 2 करोड़ से 5 करोड़ रुपये की वार्षिक कमाई करने वाले लोगों का कुल देय टैक्स 39 प्रतिशत बनता है। ऐसे में सालाना 2 करोड़ रुपये से ज़्यादा की कमाई करने वाले टैक्सपेयर्स पर कुछ ख़ास असर नहीं पड़ेगा।
साफ़ ज़ाहिर है कि इनकम टैक्स स्लैब में बदलाव के बाद लोगों के पास पैसा बचेगा और वे इस पैसे को ख़र्च करेंगे और निवेश करेंगे। यदि टैक्सपेयर्स पैसा ख़र्च करते हैं तो इससे बाज़ार में डिमाण्ड बढ़ेगी और पैसा बाज़ार में आएगा। बाज़ार में डिमाण्ड बढ़ने से उत्पादन बढ़ेगा, जिससे मंदी में चल रही कम्पनियां उबर पाएंगी।
वहीं यदि टैक्सपेयर्स पैसा निवेश करते हैं तो इससे शेयर बाज़ार के ज़रिये कम्पनियों के पास पैसा आएगा, जिसे वे उत्पादन में लगा सकेंगी। यानी कि टैक्सस्लैब में बदलाव करके मोदी सरकार दो काम एक साथ करने जा रही है। एक तो इससे जनता के पैसों की बचत होगी और वे इसे ख़र्च या निवेश कर पाएंगे। वहीं दूसरी और इससे बाज़ार में पैसा आएगा, जिससे कॉरपोरेट सेक्टर को आर्थिक मंदी से उबरने का मौक़ा मिलेगा।