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अब कब आत्मचिन्तन करेगी कांग्रेस?

26 Oct 2019
यदि ‘ऐसा’ ही रहा तो आने वाले चुनावों में भी हार सकती है कांग्रेस!

OCT 26 (WTN) – चुनावों में बस हार पर हार! लगता है देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस की यही 'नियति' बन गई है। लेकिन चुनावों में हार के लिए कोई और नहीं बल्कि ख़ुद कांग्रेस आलाकमान और अन्य नेता ही 'ज़िम्मेदार' हैं। पिछले साल छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में हुई 'बड़ी' जीत को छोड़ दिया जाए, तो कांग्रेस के लिए चुनाव में बड़ी जीत हासिल करना एक सपना सा हो गया है। यह सच है कि पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने राजस्थान और मध्य प्रदेश में भी सरकार का गठन किया है, लेकिन इन दोनों ही राज्यों में कांग्रेस को बड़ी मुश्किल से समर्थन से बहुमत हासिल हो सका है।
 
अभी हाल में सम्पन्न हुए महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद भी यदि कांग्रेस पार्टी अपनी 'विचारधारा' और रणनीति में परिवर्तन नहीं करती है, तो झारखण्ड, दिल्ली, बिहार और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भी पार्टी की हार तय ही है। वैसे इन चारों ही राज्यों में कांग्रेस सत्ता में नहीं है, लेकिन कांग्रेस पार्टी इतनी कमज़ोर हो चुकी है कि इन राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में दिल्ली को छोड़कर कांग्रेस 'विकल्प' के रूप में भी रेस में शामिल नहीं दिख रही है।

महाराष्ट्र में सालों तक कांग्रेस की सरकार रही है, लेकिन आज कांग्रेस की महाराष्ट्र में यह राजनीतिक स्थिति है कि अभी हाल ही में सम्पन्न हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 44 सीटों के साथ चौथे नम्बर पर रही है। वहीं हरियाणा में कांग्रेस की हालत 'सुधरी' ज़रूर है, लेकिन जेजेपी के उभरने से कांग्रेस पार्टी को ही नुकसान हुआ है। महाराष्ट्र और हरियाणा में पांच सालों की सत्ता विरोधी लहर का फ़ायदा उठाने से कांग्रेस पूरी तरह से 'चूक' गई है। महंगाई, आर्थिक मंदी और रोज़गार जैसे मुद्दों पर कांग्रेस रणनीति बनाकर भाजपा को घेर सकती थी, लेकिन कांग्रेस यह सब करने के बजाय अपनी 'आंतरिक लड़ाई' में ही उलझी रही।

कांग्रेस यदि चाहती तो इन दोनों ही राज्यों में बेहतर प्रदर्शन कर सकती थी, लेकिन कांग्रेस ऐसा नहीं कर सकी। दरअसल, कांग्रेस की हार के पीछे की सबसे बड़ी वजह है उसकी 'रणनीतिक भूल'। 2014 के लोकसभा चुनाव से लेकर अभी तक के सभी चुनावों में भाजपा ने राष्ट्रवाद को अपने प्रचार का सबसे प्रमुख मुद्दा बनाया है। चाहे वो सर्जिकल स्ट्राइक हो या फ़िर एअर स्ट्राइक या फ़िर अनुच्छेद 370, भाजपा ने अपने एजेण्डे में हमेशा ही राष्ट्रवादी मुद्दों को तरजीह दी है, लेकिन कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी समेत कांग्रेस के कई बड़े नेता इन मुद्दों की या तो 'ख़िलाफ़त' करते नज़र आए या फ़िर 'हंसी' उड़ाते।
 
कांग्रेसी नेताओं की यही ग़लतियों उनकी लगातार हार का कारण बनती जा रही हैं। यह सच है कि महंगाई, मंदी और रोज़गार जैसे मुद्दे जनता से सीधे जुड़े मुद्दे हैं, लेकिन पाकिस्तान और आतंकियों के ख़िलाफ़ ठोस कार्रवाई होते जब देश की जनता देखती है तो वो इन मुद्दों को भूल जाती है। ऐसा इसलिए, क्योंकि जनता की सोच है कि महंगाई, मंदी और रोज़गार जैसे मुद्दे तो आते-जाते रहते हैं, लेकिन पाकिस्तान और आतंकियों को सबक सिखाना ज़्यादा ज़रूरी है। लेकिन कांग्रेस यहीं पर मात खा जाती है और राष्ट्रवादी मुद्दों पर उसके नेताओं की ग़ैरज़रूरी टीका टिप्पणी भाजपा को और भी ज़्यादा मज़बूत करती है।

मुद्दों के अलावा चुनाव के लिए रणनीति बनाने में भी कांग्रेस, भाजपा से काफ़ी पीछे है। महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी आख़िरी समय तक अपने बड़े नेताओं के बीच उठापटक और नाराज़गी को दूर नहीं कर सकी। चलिये माना कि कांग्रेस महाराष्ट्र में इतनी 'कमज़ोर' हो चुकी है कि वो चौथे नम्बर पर है, लेकिन हरियाणा में चुनाव के लिए फिल्डिंग सेट करने में भी कांग्रेस पार्टी देरी कर गई। यदि भूपेन्द्र सिंह हुड्डा को काफ़ी पहले हरियाणा में कांग्रेस की कमान दे दी जाती, तो हो सकता था कि कांग्रेस पार्टी और भी अच्छा प्रदर्शन करती।

चुनाव के पहले रणनीति बनाने में तो कांग्रेस पीछे है ही, वहीं चुनाव के बाद सरकार बनाने की रणनीति में भी कांग्रेस, भाजपा से काफ़ी पीछे है। गोवा से लेकर हरियाणा तक ऐसे उदाहरण हैं जब चुनाव परिणाम के बाद कांग्रेस आलाकमान और बड़े नेताओं की 'निष्क्रियता' के कारण कांग्रेस की सरकार बनते-बनते रह गई। साफ़ ज़ाहिर होता है कि 2014 और 2019 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की बुरी तरह से हार के बाद कांग्रेस आलाकमान निराश है और फ़ैसले लेने में देरी कर रहा है।
 
चुनाव में हार और जीत लगी रहती है। लेकिन हार के बाद निराश होकर बैठने से राजनीति नहीं होती है और ना ही उसके बाद के चुनावों में जीत हासिल होती है। कांग्रेस आलाकमान के पास अभी भी समय है कि वो हार की निराशा से उबर कर आत्मचिन्तन करे और आने वाले चुनावों के लिए अभी से रणनीति बनाए। वहीं कांग्रेस को यह याद रखना होगा कि चुनावों में भाजपा राष्ट्रवाद को भुनाने से कभी भी पीछे नहीं रहती है, ऐसे में यदि कांग्रेस आलाकमान और दूसरे नेताओं ने इसकी ख़िलाफ़त की या फ़िर हंसी उड़ाई तो कांग्रेस को फ़िर से चुनावों में हार की तैयारी कर लेना चाहिए।