आर्थिक सुस्ती से प्रभावित अर्थव्यवस्था को ठोस और परिणामदायक उपायों की दरकार
NOV 04 (WTN) – आंकड़े बयां कर रहे हैं कि वैश्विक आर्थिक सुस्ती ने भारत की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह से प्रभावित कर दिया है। औद्योगिक उत्पादन और बेरोज़गारी से लेकर टैक्स कलेक्शन तक के आंकड़े दर्शा रहे हैं कि मोदी सरकार ने यदि जल्द ही समय रहते कुछ ठोस उपाय नहीं किये, तो आने वाले समय में आर्थिक सुस्ती भारतीय अर्थव्यवस्था को बहुत बड़ा झटका दे सकती है। आर्थिक सुस्ती का असर ऐसा है कि इस वित्त वर्ष की शुरूआत से ही भारतीय अर्थव्यवस्था इससे लगातार प्रभावित होती आई है।
ऑटो सेक्टर में गाड़ियों की बिक्री में लगातार कई महीनों से जारी गिरावट आर्थिक सुस्ती के सबसे पहले लक्षण थे। ऑटो सेक्टर के बाद आर्थिक सुस्ती ने धीरे-धीरे लगभग हर सेक्टर को अपनी गिरफ़्त में ले लिया है। ऐसा नहीं है कि आर्थिक सुस्ती से सिर्फ़ भारत की अर्थव्यवस्था ही प्रभावित है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुताबिक़, भारत समेत दुनिया की 90 प्रतिशत अर्थव्यवस्थाएं आर्थिक सुस्ती से प्रभावित हैं। लेकिन भारत और ब्राजील जैसी तेज़ी से विकसित होती अर्थव्यवस्थाओं पर आर्थिक मंदी का ज़्यादा असर पड़ रहा है।
आर्थिक सुस्ती का भारतीय अर्थव्यवस्था पर ऐसा असर पड़ा है कि इससे औद्योगिक उत्पादन, मैन्यूफैक्चरिंग, ट्रेड और रोज़गार पर काफ़ी बुरा असर पड़ा है। आर्थिक मंदी से प्रभावित भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चिन्ता और भी बढ़ गई, जब सेन्टर फॉर मॉनिटरिंग इण्डियन इकनॉमी (CMIE) ने अक्टूबर महीने के अर्थव्यवस्था के आंकड़े जारी किये। आंकड़े साफ़ दर्शा रहे हैं कि वैश्विक आर्थिक सुस्ती का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर बुरी तरह से पड़ा है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अक्टूबर महीने में औद्योगिक उत्पादन का आंकड़ा पिछले दो साल में सबसे ज़्यादा नरम रहा है। हालांकि ऐसा नहीं है कि आर्थिक सुस्ती से निपटने के लिए मोदी सरकार ने कुछ उपाय नहीं किये हैं। आर्थिक सुस्ती से निपटने के लिए मोदी सरकार ने कई तरह के उपाय किये हैं, जिनमें कॉरपोरेट टैक्स में कमी करना प्रमुख हैं। लेकिन मोदी सरकार के किये गये यह सारे उपाय नाकाफ़ी साबित हो रहे हैं और यह उपाय बाज़ार को मज़बूती देने में अभी तक तो असफ़ल ही साबित रहे हैं।
औद्योगिक उत्पादन के सूचकांक यानि कि IIP (Index of industrial production) के अनुसार, देश के प्रमुख उद्योगों के उत्पादन में भारी गिरावट दर्ज़ की गई है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि Index of industrial production में इन उद्योगों का वेजेट क़रीब 40 प्रतिशत है। अक्टूबर महीने के जारी औद्योगिक उत्पादन के सूचकांक में 1.1 प्रतिशत की गिरावट दर्ज़ की गई है, जो कि 7 साल में सबसे ज़्यादा गिरावट है।
वहीं मोदी सरकार के लिए चिन्ता का एक बड़ा कारण है कि अक्तूबर महीने में देश का औद्योगिक उत्पादन ढाई साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। ऐसा इसलिए, क्योंकि कम्पनियों को नए ऑर्डर नहीं मिले हैं, जिसके कारण फैक्ट्रियों में सुस्ती छाई रही। रिपोर्ट के मुताबिक़, अक्टूबर के महीने में पीएमआई 50.6 रहा, जबकि सितम्बर के महीने में यह 51.4 था। हालांकि आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पीएमआई के 50 से ऊपर रहने को अच्छा संकेत माना जाता है और यह दर्शाता है कि विकास हो रहा है। वहीं पीएमआई का 50 से कम सूचकांक औद्योगिक उत्पादन में गिरावट का संकेत है।
वहीं आर्थिक सुस्ती के कारण रोज़गार पर भी काफ़ी असर पड़ा है। आकड़ों के मुताबिक़, अक्टूबर के महीने में बेरोज़गारी की दर बढ़कर 8.5 प्रतिशत हो गई, जो कि अगस्त के महीने में 7.2 प्रतिशत थी। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अक्टूबर महीने की बेरोज़गारी की दर अगस्त 2016 के बाद सबसे ज़्यादा है। हालांकि अर्थशास्त्रियों का तर्क है कि आर्थिक सुस्ती के कारण ही ऑटो सेक्टर समेत अन्य प्रमुख सेक्टर्स में लोगों को नौकरी गंवानी पड़ी हैं। जानकारी के मुताबिक़, भारत में असंगठित क्षेत्र में बेरोज़गारी की दर सबसे ज़्यादा है।
आर्थिक सुस्ती के बीच मोदी सरकार के लिए एक बड़ा झटका तब लगा जब अक्टूबर महीने का जीएसटी कलेक्शन एक लाख करोड़ रुपये से नीचे ही रह गया। जारी आंकड़ों के मुताबिक, अक्टूबर महीने में जीएसटी कलेक्शन गिरकर 95,380 करोड़ पर पहुंच गया है, जबकि पिछले साल 2018 में अक्टूबर के महीने में जीएसटी कलेक्शन 1,00,710 करोड़ रुपये रहा था। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि यह लगातार तीसरा महीना है कि जीएसटी कलेक्शन एक लाख करोड़ रुपये से कम रहा है। आंकड़ों के अनुसार, इस वित्त वर्ष के पहले छह महीने में टैक्स कलेक्शन वृद्धि केवल 1.5 प्रतिशत की दर से ही रही है, जो कि साल 2009-10 के बाद से सबसे कम है।
साफ़ ज़ाहिर है कि अर्थव्यवस्था के जारी आंकड़े मोदी सरकार को आईना दिखा रहे हैं कि आर्थिक सुस्ती के कारण देश की अर्थव्यवस्था को तगड़ा झटका लगा है। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि आर्थिक सुस्ती की जानकारी सरकार को पहले से ही थी और ऑटो सेक्टर में पिछले 15 महीनों से जारी गिरावट के आंकड़े इस बात का संकेत दे रहे थे, लेकिन आर्थिक सुस्ती भारतीय अर्थव्यवस्था को इतना प्रभावित करेगी इसकी कल्पना शायद मोदी सरकार नहीं कर सकी।
हालांकि आर्थिक सुस्ती से कॉरपोरेट सेक्टर को उबारने के लिए मोदी सरकार ने कई उपाय भी किये, लेकिन अक्टूबर महीने के अर्थव्यवस्था के आंकड़े दर्शा रहे हैं कि मोदी सरकार ने आर्थिक सुस्ती से निपटने के उपाय या तो देरी से किये या फ़िर यह उपाय नाकाफ़ी साबित हुए हैं। अब देखना होगा कि आने वाले समय में क्या कुछ ठोस और परिणामदायक उपाय मोदी सरकार आर्थिक सुस्ती से निपटने के लिए करती है, जिससे आर्थिक सुस्ती से प्रभावित भारतीय अर्थव्यवस्था स्थिर हो सके और उसके बाद एक बार फ़िर से गति पकड़ सके।