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चीन के ‘जाल’ में फंसता जा रहा नेपाल!

13 Nov 2019
नेपाल के ज़रिये भारत को ‘घेरने’ की कोशिश में चीन
 
NOV 13 (WTN) – विस्तारवादी मानसिकता वाले देश चीन के हमेशा से ही अपने पड़ोसी देशों के साथ सीमा सम्बन्धित विवाद रहे हैं। चीन की जिन भी देशों से सीमा लगी हुई है, उन सभी देशों के साथ चीन के सीमा विवाद हैं। भारत, रूस, तजाकिस्तान, भूटान, मंगोलिया, वियतनाम और किर्गिस्तान जैसे देशों के साथ चीन के सीमा विवाद जारी है। दरअसल, एकदलीय साम्यवादी शासन व्यवस्था वाला देश चीन हमेशा से ही अपने पड़ोसी देशों की सीमा पर नज़रें गढ़ाए रहता है और इसी कारण से उसके पड़ोसी देशों के साथ सीमा विवाद होते रहते हैं।
 
जैसा कि आप जानते हैं कि चीन 11 ट्रिलियन डॉलर के साथ इस समय दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। चीन अपने आर्थिक विस्तारवाद को बढ़ावा देने के लिए दुनिया के ग़रीब देशों को क़र्ज़ देकर उन्हें अपने जाल में फंसा रहा है और अपने माल की वहां पर खपत कर रहा है। पाकिस्तान, श्रीलंका, मालदीव और बांग्लादेश जैसे एशियाई देश चीन के आर्थिक विस्तारवाद के ताज़ा उदाहरण हैं। इन देशों में दखल बढ़ाकर चीन, भारत को आर्थिक और सामरिक रूप से घेरने की कूटनीति पर काम कर रहा है।
 
अपनी इसी कूटनीति के तहत चीन अब नेपाल में करोड़ों डॉलर का निवेश कर उसके संसाधनों पर नज़रें गढ़ाए है। जानकारी के मुताबिक़, नेपाल में रेल और सड़क समेत कई बड़ी परियोजनाओं में चीन पैसा लगा रहा है, जिससे चीन और नेपाल के बीच आवागमन सुलभ हो सके। लेकिन हक़ीकत यह है कि चीन धीरे-धीरे नेपाल को अपने क़र्ज़ के जाल में फंसा रहा है और उसके संसाधनों को दोहन करने की कूटनीति पर काम कर रहा है।
 
लेकिन चीन की चालाकी नेपाल की साम्यवादी सरकार को समझ में नहीं आ रही है और इसी कारण से नेपाल की सरकार धीरे-धीरे वहीं सब करते जा रही है जो कि चीन की सरकार उसे करने को कह रही है। इस सबके बीच, चीन के ख़िलाफ़ नेपाल में विरोध शुरू हो गया है। दरअसल, नेपालियों का आरोप है कि चीन ने नेपाल की ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया है। नेपाल में सोमवार को चीन के ख़िलाफ़ ज़ोरदार प्रदर्शन हुए और कई जगहों पर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का पुतला भी जलाया गया।
 
नेपाली प्रदर्शनकारियों ने सप्तारी, बर्दिया और कपिलवस्तु की सड़कों पर उतरकर चीन के ख़िलाफ़ जमकर नारे लगाए। प्रदर्शनकारियों के हाथों में 'गो बैक चाइना' और 'रिटर्न नेपाली लैण्ड' जैसे बैनर थे। नेपाली लोगों का यह गुस्सा चीन के ख़िलाफ़ इसलिए भड़क गया है, क्योंकि हाल ही में नेपाल के सर्वे डिपार्टमेण्ट द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन ने नेपाल की क़रीब 36 हेक्टेयर ज़मीन पर अतिक्रमण कर लिया है।
 
जानकारी के मुताबिक़, सर्वे में कहा गया है कि नेपाल-चीन की सीमा पर बसे चार ज़िलों संकूवासाभा, रसुवा, सिंधुपलचौक और हुमला की कई हेक्टेयर ज़मीन को नेपाल ने चीन की महत्वाकांक्षी सड़क परियोजनाओं में गंवा दिया है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक़, हुमला ज़िले में भागदारे नदी के पास क़रीब 6 हेक्टेयर ज़मीन और करनाली ज़िले में चार हेक्टेयर ज़मीन पर चीन ने अपना कब्ज़ा कर लिया है और अब यह तिब्बत के फुरांग इलाक़े में आती है।
 
इसी तरह, सान्जेन नदी और जाम्बू खोला के पास भी क़रीब 6 हेक्टेयर ज़मीन दक्षिणी तिब्बत के कुरेंग में आ गई है। सर्वे डिपार्टमेण्ट की रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने भोटेकोशी और खरनेखोला इलाक़े में भी 10 हेक्टेयर ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया है और यह इलाक़ा अब तिब्बत के न्यालम में आ गया है। यानी कि सर्वे रिपोर्ट से साफ़ ज़ाहिर हो रहा है कि चीन चालाकी से नेपाल की ज़मीन पर कब्ज़ा करता जा रहा है।

दरअसल, चीन अब नेपाल के साथ भी दोस्ती की आड़ में अपने विस्तारवादी एजेंडे को पूरा करने की कोशिश कर रहा है। चीन पहले नेपाल के साथ दोस्ती बढ़ा रहा है, जिसके बाद वहां पर बड़ी-बड़ी परियोजनाएं को शुरू करने के लिए कुछ निवेश करेगा और साथ ही नेपाल को अपने क़र्ज़ के जाल में फंसा लेगा। धीरे-धीरे चीन की चाल में नेपाल फंसता जाएगा और फ़िर चीन, नेपाल के संसाधनों का इस्तेमाल करने लगेगा जैसा कि वो इस समय पाकिस्तान में कर रहा है।
 
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारत और चीन जैसे दो बड़े शक्तिशाली देशों के बीच नेपाल की भौगालिक स्थिति काफ़ी महत्वपूर्ण है और इसलिए ही नेपाल को लेकर चीन किसी बहुत बड़ी प्लानिंग पर काम कर रहा है। दरअसल, चीन की कूटनीतिक चाल है कि नेपाल के भारत के साथ सम्बन्ध बिगड़ जाएं। अपनी इसी कूटनीति को सफ़ल करने के लिए चीन, नेपाली लोगों को इस बात का भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहा है कि भारत, नेपाल पर आधिपत्य जमाता है और उसकी ज़मीन और संसाधनों पर कब्ज़ा करना चाहता है। वही चीन नेपालियों को यह समझाने की कोशिश में लगा है कि चीन ही नेपाल के विकास के लिए भारत से बेहतर योगदान दे सकता है।
 
इस समय चीन के लिए नेपाल में परिस्थितियां भी काफ़ी अनुकूल हैं। नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली चीन समर्थक और भारत विरोधी माने जाते हैं। वहीं धीरे-धीरे चीन ने अपने उत्पादों से नेपाल के बाज़ारों में पैठ बना ली है। दरअसल, भारत के अन्य पड़ोसी देशों की तुलना में नेपाल को अपने पक्ष में करना चीन के लिए ज़रा आसान है। ऐसा इसलिए, क्यों नेपाल आर्थिक, सामरिक और राजनीतिक रूप से चीन से काफ़ी कमज़ोर है, वहीं नेपाल को इस समय विकास की दरकार है और वहां की सरकार चीनी निवेश के मोह में चीन सरकार की विस्तारवादी नीतियां को समझ नहीं पा रही है। अब देखना होगा कि चीन की चालाकी को कब तक नेपाल समझ पाता है और उससे छुटकारा पाने में कब तक सफ़ल हो पाता है?