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आर्थिक मोर्चे पर मोदी सरकार को लगे ‘बड़े झटके’!

15 Nov 2019
40 साल में पहली बार उपभोक्ता ख़र्च में आई गिरावट से जीडीपी वृद्धि हुई ‘प्रभावित’
 
NOV 15 (WTN) – वैश्विक आर्थिक मंदी ने तेज़ी से विकास कर रही भारतीय अर्थव्यवस्था को काफ़ी हद तक प्रभावित कर दिया है। आर्थिक मंदी का संकट देश पर गहराता जा रहा है और इसकी पुष्टि आकंड़ों से हो रही है। हालांकि, ऐसा नहीं है कि आर्थिक मंदी के कारण सिर्फ़ भारत की अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुताबिक़, विश्व की 90 प्रतिशत अर्थव्यवस्थाएं किसी ना किसी कारण से वैश्विक आर्थिक मंदी से प्रभावित हुई हैं। लेकिन भारत को आर्थिक मंदी की काफ़ी बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ रही है।
 
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि हाल ही में जारी औद्योगिक उत्पादन में गिरावट के आंकड़े और महंगाई में बढ़ोतरी के आंकड़े आर्थिक मंदी के असर की पुष्टि करते हैं। लेकिन अब एनएसओ (नेशनल स्टेस्टिक्स ऑफिस) द्वारा जारी किये नये आंकड़ों ने मोदी सरकार की परेशानी को और भी बढ़ा दिया है। जानकारी के मुताबिक़, पिछले 40 सालों में पहली बार भारत का उपभोक्ता खर्च साल 2017-18 में घट गया है।
 
एनएसओ के ताज़ा सर्वे के मुताबिक़, वित्त वर्ष 2017-18 में भारत में उपभोक्ता खर्च में 3.7 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है और यह घटकर 1,446 रुपये रह गया है। जबकि साल 2011-2012 में एक भारतीय औसतन 1,501 रुपये खर्च करता था। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि यह सभी आंकड़े रियलटाइम डेटा के आधार पर बनाये गये हैं, जिसका मतलब है कि महंगाई के आंकड़ों के हिसाब से इनको एडजस्ट किया गया है।
 
एनएसओ द्वारा जारी किये आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि लोग अब पहले की तुलना में कम ख़र्च करने लगे हैं। सर्वे के मताबिक़, शहरों की तुलना में ग्रामीण इलाक़ों में लोगों ने ख़र्च करना कम कर दिया है। वित्त वर्ष 2017-18 में गांवों में उपभोक्ता ख़र्च में 8.8 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। सर्वे के अनुसार लोग अब खाने-पीने की वस्तुओं पर कम पैसा ख़र्च कर रहे हैं। इसमें भी ख़ासतौर से गांवों में लोगों ने दूध और दूध से बने उत्पादों की खपत कम कर दी है। इसके अलावा कपड़ों, कन्ज्यूमर ड्यूरेबल्स, शिक्षा और घरों के किराये के ऊपर भी लोगों के ख़र्च करने की प्रवृत्ति में कमी दर्ज़ की गई है।
 
इस सबके बीच, दुनिया की बड़ी रेटिंग एजेंसी मूडीज इन्वेस्टर सर्विस ने भारत की GDP ग्रोथ रेट का अनुमान एक बार फ़िर से घटा दिया है। मूडीज ने मौजूदा वित्त वर्ष 2019-20 के लिए अपने अनुमान को 5.8 प्रतिशत से घटाकर 5.6 प्रतिशत कर दिया है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इसके पहले अक्टूबर महीने में ही मूडीज ने चालू वित्त वर्ष 2019-20 के लिए जीडीपी ग्रोथ रेट के अनुमान को घटाकर 5.8 प्रतिशत कर दिया था। यानी कि साफ़ ज़ाहिर है कि आर्थिक मंदी के कारण देश की विकास दर इस वित्त वर्ष में अनुमान से कम हो सकती है।
 
लेकिन वहीं मोदी सरकार के लिए राहत की ख़बर है। रेटिंग एजेंसी मूडीज का कहना है कि साल 2020 में भारत में आर्थिक गतिविधियां बढ़ेंगी और इसी कारण से साल 2020 और साल 2021 में GDP ग्रोथ रेट क्रमशः 6.6 प्रतिशत और 6.7 प्रतिशत रहने का अनुमान है। लेकिन आर्थिक मंदी के कारण मौजूदा वित्त वर्ष में आर्थिक वृद्धि दर कम रहेगी। वहीं आपकी जानकारी के लिए बता दें कि हाल ही में मूडीज (Moody's) ने भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में अपने आउटलुक यानी नजरिए को 'स्टेबल' (स्थि‍र) से घटाकर 'नेगेटिव' कर दिया है।
 
मूडीज के अनुसार साल 2018 के बीच से ही भारत की आर्थिक विकास दर कम हुई है, और इसी कारण से 2019 की दूसरी तिमाही में जीडीपी ग्रोथ रेट 8 प्रतिशत से घटकर 5 प्रतिशत रह गई है। मूडीज ने अपनी रिपोर्ट में विश्लेषण के साथ बताया है कि भारत में पहले भी निवेश गतिविधियों में गिरावट आई है, लेकिन उस समय मजबूत खपत मांग के कारण अर्थव्यवस्था में उछाल आया था पर मौजूदा सुस्ती के साथ समस्या यह है कि इस बार खपत में भी गिरावट है।
 
तो साफ़ ज़ाहिर है कि एनएसओ के आंकड़े और मूडीज का अनुमान दर्शा रहे हैं कि भारत आर्थिक मंदी की चपेट में है। ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार आर्थिक मंदी से निपटने के लिए कुछ उपाय नहीं कर रही है। आर्थिक मंदी से निपटने के लिए मोदी सरकार ने काफ़ी प्रयास किये हैं, लेकिन यह प्रयास आर्थिक मंदी के सामने नाकाफ़ी साबित हो रहे हैं। वैसे आशा की जा रही है कि साल के आख़िरी तक अमेरिकी-चीन के बीच जारी ट्रेड वॉर ख़त्म हो सकता है, जिसके बाद अगले साल मार्च के महीने से आर्थिक मंदी का असर कम होना शुरू हो जाएगा। तो आशा की जाना चाहिए कि जल्द से जल्द देश में वैश्विक आर्थिक मंदी का असर कम हो और देश एक बार फ़िर से आर्थिक विकास की राह पर तेज़ी से आगे बढ़े।