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जानिए पाकिस्तान में क्यों हो रही है जनरल बाजवा के साथ ज़्यादती?

27 Nov 2019
अपने ही सेना प्रमुख पर पाकिस्तानियों को नहीं है ‘विश्वास’!

NOV 27 (WTN) – जैसा कि आप जानते हैं कि पाकिस्तान में लोकतंत्र बस एक मज़ाक़ मात्र है। पूरी दुनिया को दिखाने के लिए पाकिस्तान में चुनाव होते हैं और वहां पर एक चुनी हुई सरकार होती है, लेकिन वास्तव में पाकिस्तान की चुनी हुई सरकारें सेना के दबाव में काम करती आ रही हैं। इतिहास गवाह रहा है कि चुनी हुई सरकारों का पाकिस्तान में किस तरह से तख्ता पलट होता आया है। पाकिस्तान की सेना हमेशा से ही पाकिस्तान की विदेश और गृह नीति में दखलंदाज़ी करती आई है। पाकिस्तान के वर्तमान सेना अध्यक्ष जनरल क़मर जावेद बाजवा भी इसी नीति को फॉलो करते आए हैं, लेकिन पाकिस्तानी सेना के सर्वोच्च अधिकारी बाजवा इन दिनों परेशानी का सामना कर रहे हैं और उन्हें चुनौती मिलना शुरू हो गई है।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल क़मर जावेद बाजवा के सेवा विस्तार के आदेश को सुप्रीम कोर्ट ने अस्थायी तौर पर निलम्बित कर दिया है। पाकिस्तान की राजनीति के जानकारों के मुताबिक़, पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले के बाद प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने आपात कैबिनेट बैठक बुलाई, जिसमें जनरल क़मर जावेद बाजवा के सेवा विस्तार को मंज़ूरी दी गई। जानकारी के अनुसार, जनरल बावजा के कार्यकाल को बढ़ाने को वैध करने के लिए पाकिस्तान आर्मी एक्ट में संशोधन कर इसमें 'विस्तार' शब्द भी जोड़ा गया है।

अब आप सोच रहे होंगे कि जबकि पाकिस्तान में सेना का दबदबा है और जनरल क़मर बाजवा को सेवा में विस्तार मिल रहा है तो आख़िर उन्हें कहां से और क्यों चुनौती मिल रही है। इसके बारे में बताने से पहले आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पाकिस्तान एक मुस्लिम देश है और पाकिस्तान में ऐसे कई बड़े संवैधानिक पद हैं जिन पर सिर्फ़ और सिर्फ़ एक मुस्लिम ही बैठ सकता है। वहीं पाकिस्तान में हर मुस्लिम को इन पदों पर बैठने का हक़ नहीं है, क्योंकि पाकिस्तान में इन पदों पर सिर्फ़ मुख्य धारा के मुस्लिम ही बैठ सकते हैं।

अब क़मर बाजवा इसलिए मुसीबत में आ गये हैं, क्योंकि उनकी धार्मिक पहचान को लेकर उन पर आरोप लग रहे हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि हाल ही में पाकिस्तान की पेशावर हाईकोर्ट में पूर्व मेजर खालिद शाह ने अपनी एक याचिका में बाजवा की नियुक्ति को इस आधार पर चुनौती दी थी कि वह कांदियानी समुदाय से आते हैं। दरअसल, पाकिस्तान में कांदियानी समुदाय अहमदिया मुस्लिम के तौर पर जाने जाते हैं और मुख्य धारा इन्हें ग़ैर-मुस्लिम मानती है। खालिद शाह की इस याचिका में आईएसआई के पूर्व डीजी रिज़वान अख़्तर का भी नाम लिया गया है कि उन्होंने मुस्लिम होने की अपनी ड्यूटी पूरी नहीं की, क्योंकि उन्होंने (रिज़वान अख़्तर) सरकार को यह सूचित नहीं किया कि बाजवा मुस्लिम समुदाय से नहीं आते हैं।

दरअसल, पाकिस्तान के संविधान के अनुसार, एक ग़ैर-मुस्लिम व्यक्ति आर्मी चीफ नियुक्त नहीं हो सकता है। पाकिस्तान की मुख्य धारा के मुस्लिम, कांदियानी समुदाय को मुस्लिम नहीं मानते हैं इसलिए इस याचिका में आर्मी चीफ के सेवा विस्तार को अवैध और ग़ैर-क़ानूनी क़रार दिया गया है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अगस्त महीने में पाकिस्तान की इमरान ख़ान सरकार ने जनरल बाजवा का कार्यकाल तीन सालों के लिए बढ़ा दिया था। वैसे यह पहली बार नहीं है जब जनरल बाजवा की धार्मिक पहचान को लेकर विवाद खड़ा हुआ है। नवम्बर 2016 में जब पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ ने बाजवा को सेना प्रमुख नियुक्त किया था, तो उस समय भी बाजवा की धार्मिक पहचान को लेकर काफ़ी विवाद हुआ था।

बाजवा की जनरल के पद पर नियुक्ति का पाकिस्तान के कई सांसदों और कट्टरपंथी नेताओं ने विरोध किया था। विरोध करने वालों का तर्क था कि बाजवा के रिश्तेदार अहमदी हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अहमदिया सम्प्रदाय के लोगों को अपनी मान्यताओं और परम्पराओं के कारण पाकिस्तान में लम्बे समय से उत्पीड़न और प्रताड़ना का शिकार होना पड़ा है। पाकिस्तान में अहमदिया सम्प्रदाय के लोगों को काफ़िर कहकर तक बुलाया जाता है। वहीं अहमदिया समुदाय के लोग क़ानूनी तौर पर भी ख़ुद को मुस्लिम नहीं कह सकते हैं और उनकी देशभक्ति पर भी शक़ किया जाता है। इतना ही नहीं, अहमदिया सम्प्रदाय के चौथे ख़लीफ़ा को पाकिस्तान की सरकार के प्रतिबंधों की वजह से देश छोड़कर लंदन तक जाना पड़ा था।

साल 1974 में पाकिस्तान ने संवैधानिक संशोधन करते हुए अहमदियों को ग़ैर-मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय घोषित कर दिया था। वहीं साल 1984 में एक क़ानून पास किया गया, जिसमें अहमदियों के लिए अपनी पहचान मुस्लिम के तौर पर करने को अपराध तक घोषित कर दिया गया। हालांकि, पाकिस्तान के कई बड़े शीर्ष सैन्य पदों पर अहमदी समुदाय के लोग रह चुके हैं, लेकिन फ़िर भी काफ़ी समय से पाकिस्तान में एक बड़ा वर्ग जनरल क़मर जावेद बाजवा की धार्मिक पहचान को लेकर नाख़ुश है। बाजवा की जनरल पद पर नियुक्ति के समय भी कुछ कट्टरपंथियों ने उनका नाम सेना प्रमुख के दावेदार की लिस्ट से हटाने के लिए दबाव बनाया जा।
 
वैसे जनरल बाजवा के कार्यकाल विस्तार के पीछे इमरान ख़ान सरकार ने कश्मीर और अफगानिस्तान की असामान्य परिस्थितियों का हवाला दिया था। लेकिन अब देखना होगा कि जनरल बाजवा के अहमदिया सम्प्रदाय से होने का क्या नुकसान उन्हें उठाना पड़ता है। वैसे कहा जा रहा है कि इमरान ख़ान के लिए यह समय काफ़ी परेशानी का है। एक तो पाकिस्तान की आर्थिक हालत काफ़ी बदतर हो चुकी है, वहीं कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान हर मोर्चे पर भारत से मात खा रहा है। वहीं इमरान ख़ान को डर है कि इन्हीं हालातों का फ़ायदा उठाकर जनरल बाजवा तख्तापलट ना कर दें। इन्हीं सब परिस्थितियों के बीच जनरल बाजवा का सेवा विस्तार और जनरल बाजवा और इमरान ख़ान के बीच के सम्बन्ध निर्धारित होंगे।