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आर्थिक सुस्ती का असर हुआ ‘लगभग’ ख़त्म, जल्द गति पकड़ेगी भारत की विकास दर

28 Feb 2020
मोदी सरकार के प्रयासों से आगामी वित्त वर्ष से सुधरेगी देश की अर्थव्यवस्था

FEB 28 (WTN) – वैश्विक आर्थिक सुस्ती ने भारत समेत दुनिया के अधिकांश देशों की अर्थव्यवस्थाओं को काफ़ी बड़ा झटका दिया है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की जानकारी के मुताबिक़, दुनिया की 90 प्रतिशत अर्थव्यवस्थाओं को आर्थिक सुस्ती ने किसी ना किसी तरह से प्रभावित किया है। लेकिन भारत और ब्राजील जैसी तेज़ी से विकास करती अर्थव्यवस्थाओं पर वैश्विक आर्थिक सुस्ती का काफ़ी गहरा असर पड़ा है। भारत और ब्राजील ही नहीं, बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका और दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश चीन की अर्थव्यवस्था को भी आर्थिक सुस्ती ने हिलाकर रख दिया है। इतना ही नहीं, आर्थिक सुस्ती का असर संयुक्त राष्ट्र संघ पर भी देखा गया है। जानकारी के लिए बता दें कि आर्थिक सुस्ती के कारण संयुक्त राष्ट्र संघ के न्यूयॉर्क स्थित कार्यालय के बजट में बड़ी मात्रा में कटौती करना पड़ी थी।

जहां तक भारत की बात है, तो वैश्विक आर्थिक सुस्ती ने दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश भारत की अर्थव्यवस्था के हर सेक्टर को प्रभावित किया है। लेकिन ऑटो सेक्टर पर आर्थिक सुस्ती का सबसे गहरा और लम्बा असर पड़ा। ऑटो सेक्टर को क़रीब 20 महीनों तक आर्थिक सुस्ती का सामना करना पड़ा। और इसी कारण से वाहनों की बिक्री में ऐतिहासिक गिरावट दर्ज़ की गई। वैसे तो आर्थिक सुस्ती के लिए कई कारण ज़िम्मेदार थे। लेकिन अमेरिका और चीन के बीच जारी ट्रेड वॉर को आर्थिक सुस्ती का सबसे बड़ा कारण माना जाता है। लेकिन हाल ही में अमेरिका और चीन के बीच हुई ट्रेड डील के बाद आर्थिक सुस्ती का असर धीरे-धीरे कम होता दिखाई दे रहा है।
 
अब जबकि आर्थिक सुस्ती का असर कम होता जा रहा है। तो ऐसे में मोदी सरकार को आशा है कि जल्द ही देश की अर्थव्यवस्था फ़िर से गति पकड़ेगी। दरअसल, आर्थिक सुस्ती के असर को कम करने के लिए मोदी सरकार ने काफ़ी ज़रूरी क़दम उठाए हैं, जिसके बाद आशा की जा रही है कि इसका असर जल्द ही देखने को मिलेगा। अर्थशास्त्रियों के मुताबिक़, भारत में अब आर्थिक सुस्ती समाप्ति की ओर है, और जल्द ही भारतीय अर्थव्यवस्था में तेज़ी देखी जाएगी। लेकिन अर्थशास्त्रियों का मत है कि 10 प्रतिशत की विकास दर हासिल करने के लिए मोदी सरकार को आर्थिक नीतियों में और भी ज़्यादा बदलाव करना होगा और उनमें खुलापन लाना होगा।

आशा की जा रही है कि आर्थिक सुस्ती समाप्त होने के बाद वित्त वर्ष 2020-21 में भारत की विकास दर 6 प्रतिशत से ज़्यादा रह सकती है। वहीं इसके बाद वाले वित्त वर्षों में विकास दर 7 से 8 प्रतिशत होने की सम्भावना है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि आर्थिक सुस्ती का सबसे भयानक दौर गुजर चुका है। और इसके कारण विकास दर को जितना प्रभावित होना था वो हो चुकी है। लेकिन अब जबकि आर्थिक सुस्ती का दौर ख़त्म होने को है, तो ऐसे में विकास दर में तेज़ी ही देखी जाएगी। ऐसे में चालू वित्त वर्ष के आख़िरी तिमाही में उम्मीद से बेहतर विकास दर देखी जा सकती है।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि साल 2003 के बाद से भारत ने औसतन क़रीब 7 प्रतिशत की विकास दर हासिल की है। वहीं मोदी सरकार के पहले कार्यकाल (2014-19) में यह औसतन 7.5 प्रतिशत के आसपास रही थी। लेकिन आर्थिक सुस्ती ने भारतीय अर्थव्यवस्था को अच्छा खासा प्रभावित किया, और चालू वित्त वर्ष (2019-20) में विकास दर 5 प्रतिशत या उससे कम रहने का आंकलन किया जा रहा है। चालू वित्त वर्ष के लिए विकास दर का अनुमान विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और भारतीय रिज़र्व बैंक समेत अन्य वित्तीय संस्थानों और रेटिंग ऐजेंसियों ने अलग-अलग लगाया है। लेकिन मोदी सरकार द्वारा आर्थिक सुस्ती से निपटने के लिए किये गये उपायों के बाद आशा की जा रही है कि चालू वित्त वर्ष की विकास दर कम के कम 5 प्रतिशत तो रहेगी ही।

वैसे अर्थशास्त्रियों का मानना है कि आर्थिक सुस्ती से निपटने के लिए मोदी सरकार ने प्रयास तो अच्छे किये हैं, लेकिन चालू वित्त वर्ष के विकास दर के अन्तिम आंकड़ों से ही पता चलेगा कि मोदी सरकार द्वारा किये गये उपाय कितने कारगर साबित हुए हैं। दरअसल, वैश्विक आर्थिक सुस्ती का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर ज़्यादा नहीं पड़ता, लेकिन सुस्ती का प्रमुख कारण भारत के वित्तीय बाज़ार रहे हैं। वित्तीय बाज़ारों में समस्या के कारण बैंकों का ख़ुद का खाता तो बिगड़ा ही है, साथ ही बड़ी कम्पनियों की बैलेंस शीट का सन्तुलन भी बिगड़ा है। वहीं बैंकों के एनपीए ने भी एक बड़ी समस्या खड़ी की है। हालांकि, साल 2013 में ही बैंकों के भारी भरकम एनपीए का पता चल गया था। लेकिन एनपीए की इस समस्या को सुलझाने में मनमोहन सिंह की सरकार और मोदी सरकार दोनों के ही प्रयास नाकामयाब साबित हुए हैं।

हालांकि, अब जबकि कहा जा रहा है कि आर्थिक सुस्ती ख़त्म होने की तरफ़ है। ऐसे में आशा की जाना चाहिए कि भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर एक बार फ़िर तेज़ी से आगे बढ़े। लेकिन चीन में कोरोना वायरस संक्रमण के कारण चीन की अर्थव्यवस्था पर एक गहरा संकट आ गया है। ऐसे में जबकि चीन दुनिया के कई देशों को बड़ी तादात में माल निर्यात करता है, तो कहा जा सकता है कि आर्थिक सुस्ती का असर ख़त्म होने में कुछ समय और लग सकता है। लेकिन फ़िर भी भारतीय अर्थव्यवस्था ने मोदी सरकार के प्रयासों के कारण ही आर्थिक सुस्ती के भयानक दौर से ख़ुद को सुरक्षित बाहर निकाल लिया है। अब जबकि आर्थिक सुस्ती ख़त्म होने की कगार पर है। तो ऐसे में आशा की जा सकती है कि आने वाले वित्त वर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था एक बार फ़िर से दुनिया की सबसे तेज़ गति से आगे बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था होगी।