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कोरोना वायरस संक्रमण डॉक्टर्स और वैज्ञानिकों के लिए इस समय की सबसे बड़ी चुनौती

06 Apr 2020

कोरोना वायरस मरीजों के लिए इस वक़्त का सबसे बड़ा सहारा है मलेरिया की दवा हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन


APRIL 06 (WTN) - कोरोना वायरस संक्रमण इस समय पूरी दुनिया के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। 200 से ज़्यादा देशों के नागरिक कोरोना वायरस संक्रमण से संक्रमित हो चुके हैं। कोरोना वायरस संक्रमण से बचने के लिए पूरी दुनिया के डॉक्टर्स और वैज्ञानिक दिन-रात वैक्सीन बनाने में जुटे हुए हैं। वैसे तो कोरोना वायरस संक्रमण के इलाज के लिए कोई भी प्रामाणिक दवा अभी नहीं है। लेकिन कोरोना वायरस संक्रमण से इलाज के लिए इस समय पूरी दुनिया भर में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन (Hydroxychloroquine) टैबलेट्स की चर्चा है।

 

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के अनुसार, हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन दवाई से कोरोना वायरस के इलाज में मदद मिलती है। ऐसे में अब अमेरिका ने इस दवाई के लिए भारत से सप्लाई की मांग की है। लेकिन आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारत सरकार ने 26 मार्च को ही इस दवाई के निर्यात पर रोक लगा दी है। बता दें कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ही नहीं, बल्कि ब्राजील के राष्ट्रपति जायर बोलोनसरो का भी यही मानना है कि मलेरिया की दवा हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन कोरोना वायरस को ख़त्म करने का सबसे बड़ा हथियार है।

 

अब जबकि पूरी दुनिया में कोरोना वायरस संक्रमण के इलाज के लिए हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन को दवा के विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है, तो ऐसे में इस दवा की डिमांड काफ़ी बढ़ गई है। ऐसे में अमेरिका के साथ-साथ ब्राजील ने भी भारत सरकार से मांग की है कि जल्द से भारत सरकार को हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन के निर्यात से बैन हटाना चाहिए। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारत सरकार ने पहले ही आईसीए लाइब्रोटरीज और ज़ायस कैडिला को हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन की 10 करोड़ टैबलेट बनाने का ऑर्डर दे दिया है।

 

शायद आप जानते हो, तो भी आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारत में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन टैबलेट्स का इस्तेमाल मलेरिया को ठीक करने के लिए किया जाता है। ज्ञात हो कि क्लोरोक्वाइन क्वविनाइन का सिंथेटिक रूप है जो सिकोना पौधे की छाल से मिलता है। इसे दक्षिण अमेरिका महाद्वीप के कई देशों में बुखार की दवाई के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। क्लोरोक्वाइन पहली बार साल 1930 में सिंथेटिक रूप में बनी थी।

 

दरअसल, मलेरिया की दवा हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन के बारे में अमेरिकी शहर कनसास सिटी में डॉक्टर जेफ कॉलेयर ने कुछ शोध किए हैं। डॉक्टर जेफ के मुताबिक़, हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन और एज़िथ्रोमाइसिन के मिश्रण का असर कोरोना वायरस से संक्रमित मरीज़ों पर दिख रहा है। डॉक्टर जेफ ने इसका ज़िक्र वॉशिंगटन पोस्ट में छपे अपने एक आर्टिकल में किया है। डॉक्टर जेफ के अनुसार, इन ड्रग्स का प्रयोग मरीज़ और लैब दोनों जगहों पर किया गया है और दोनों ही जगहों पर अच्छे परिणाम सामने आए हैं।

 

अब देखना होगा कि कोरोना वायरस संक्रमण के इलाज के लिए वैक्सीन और दवा की खोज में वैजानिकों को कब तक सफलता हासिल हो पाती है। लेकिन जब तक कोरोना वायरस संक्रमण का कोई ठोस और प्रामाणिक इलाज नहीं मिल जाता है, तब तक मलेरिया बीमारी के इलाज में काम में आने वाली दवा हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन से ही कोरोना वायरस संक्रमण से संक्रमित मरीज़ों का इलाज किया जा रहा है। लेकिन हमारी आपको सलाह है कि कोरोना वायरस संक्रमण से बचाव के लिए लॉकडाउन का पूरी तरह से पालन करें, और लोगों से दूरी बनाए रखें। कोरोना वायरस संक्रमण के लक्षण दिखने पर तुरन्त ही प्रशासन को इसकी सूचना दें, और ख़ुद ही किसी भी तरह का इलाज करने की ग़लती न करें।