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साल 2018 में दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था रहा भारत

02 Jan 2019
साल 2018 में सुर्खियों में रहे आरबीआई, जीएसटी और जीडीपी

JAN 02 (WTN) – नया साल 2019 भारत के लिए आर्थिक दृष्टिकोण से काफ़ी महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे पहले साल 2018 में भारत में आर्थिक घटनाक्रम काफ़ी तेज़ी से बदलते रहे। कुछ कामों के लिए सरकार की तारीफ़ हुई तो कहीं पर सरकार को आरोपों का सामना करना पड़ा लेकिन देश और दुनिया की तमाम परिस्थितियों के उतार चढ़ाव के बाद भी भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बना रहा और इस दौरान भारत ने चीन को पीछे छोड़ा।
 
तेज़ी से बढ़ती भारतीय अर्थव्यवस्था का अनुमान सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर के आंकड़ों से लगाया जा सकता है कि वित्तीय वर्ष 2018-19 की 30 जून को समाप्त पहली तिमाही में जीडीपी की वृद्धि दर 8.2 प्रतिशत रही, जबकि साल 2018 के पहले तीन महीनों के दौरान यह 7.7 प्रतिशत रही थी।
 
देश-दुनिया के तमाम उतार चढाव के बीच हालांकि जीडीपी की वृद्धि दर 30 सितम्बर को समाप्त दूसरी तिमाही में 7.7 प्रतिशत से घटकर 7.1 प्रतिशत रह गई। इधर फिच रेटिंग ने भारतीय अर्थव्यवस्था की चालू वित्तीय वर्ष की वृद्धि दर के अनुमान को 7.8 प्रतिशत से घटाकर 7.2 प्रतिशत कर दिया है। इधर इस बारे में नीति आयोग का कहना है कि सरकार 2019 में आर्थिक वृद्धि को गति देने के लिए सुधारों की रफ़्तार तेज़ करेगी। नीति आयोग का मानना है कि धीरे-धीरे देश में निवेश बढ़ रहा है और 2019 के कैलेंडर वर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत रहेगी।
 
इधर कहा जा रहा है कि इस साल सरकार लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए कल्याणकारी योजनाओं में अपना खर्च बढ़ाएगी जिससे राजकोषीय दबाव बढ़ेगा और इस कारण आर्थिक विकास दर पिछड़ने की बात कही जा रही है।
 
अब यह तो थे घरेलू कारण, वहीं यदि वैश्विक कारणों की बात की जाए तो ऐसे कई कारण हैं जिन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया और साल 2019 में भी ये प्रभावित करेंगे। ये कारण हैं कच्चे तेल के दाम, अमेरिकी डॉलर की मज़बूती, अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध के कारण वैश्विक वृद्धि में मंदी और अमेरिकी फेडरल रिज़र्व द्वारा एक साल में चौथी बार ब्याज दरों में वृद्धि। इन सभी कारणों से देश की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा है।
 
इधर बैंकिंग क्षेत्र में जारी उतार चढ़ाव का भी काफ़ी असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। साल के शुरुआत में 14 फरवरी को पंजाब नेशनल बैंक में 11,400 करोड़ रुपए का घोटाला सामने आया। यह घोटाला राजनीतिक तौर पर भी काफ़ी सुर्खियों में रहा जिसके कारण संसद से लेकर सड़क तक काफ़ी हंगामा हुआ।
 
वहीं साल के आखिरी महीनों में देश के केन्द्रीय बैंक भारतीय रिज़र्व बैंक और केंद्र सरकार के बीच विवाद चर्चाओं में रहा। रिज़र्व बैंक की स्वायत्ता और अन्य कारणों के चलते गवर्नर उर्जित पटेल ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया। आरबीआई और सरकार के बीच विवाद यहां तक पहुंच गया था कि सरकार ने रिज़र्व बैंक कानून की धारा 7 के तहत अपने विशेष अधिकारों के इस्तेमाल की चेतावनी भी दे दी थी।
 
इसी साल देश की प्रमुख बुनियादी ढांचा वित्तपोषण कम्पनी आईएलएंडएफएस द्वारा बैंकों को भुगतान में चूक भी चर्चा के केंद्र में रहा। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि आईएलएंडएफएस की भुगतान चूक को लेहमन ब्रदर्स द्वारा की गई चूक जैसे मामले के रूप में भी देखा गया। जैसा कि आप जानते हैं कि लेहमन ब्रदर्स के मामले से ही 2008 में वैश्विक वित्तीय संकट की शुरुआत हुई थी। भारत के लिए इस साल बढ़िया ख़बर यह रही कि विश्व बैंक की कारोबार सुगमता रैंकिंग में भारत 23 स्थान की छलांग लगाकार 77वें स्थान पर आ गया।
 
इस साल देश में जीएसटी को लेकर काफ़ी परिवर्तन देखने को मिले। अक्टूबर महीने में इसका संग्रहण एक लाख करोड़ रुपए के आंकड़े को पार कर गया, लेकिन नवम्बर में यह फिर से घटकर 97,637 करोड़ रुपए रह गया। बात करें मुद्रास्फीति की तो यह रिज़र्व बैंक के अनुमान से ज़्यादा रही। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि रिज़र्व बैंक ने मध्यम अवधि में मुद्रास्फीति का लक्ष्य चार प्रतिशत रखा है।
 
साल 208 में अप्रैल-अक्टूबर के दौरान औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर 5.6 प्रतिशत रही, जो इससे पिछले साल की समान अवधि में 2.5 प्रतिशत थी। जीडीपी आंकड़ों में संशोधन भी साल 2018 में सुर्खियों में रहा। कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के कार्यकाल में वृद्धि दर के आंकड़े कम हो गए क्योंकि केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) ने 2004-05 के बजाय 2011-12 के आधार वर्ष का इस्तेमाल करते हुए पूर्ववर्ती संप्रग सरकार के जीडीपी के आंकड़ों को कम कर दिया जिसका काफ़ी विरोध कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने किया।