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सिर्फ़ एक फ़ैसले से क़रीब 25 रुपये प्रति लीटर सस्ता हो सकता है पेट्रोल!

26 Jul 2019
पेट्रोल पर जीएसटी लगाने का फ़ैसला आम जनता को दे सकता है ‘राहत’

JULY 26 (WTN) – जैसा कि आप जानते हैं कि भारत अपने तेल की ज़रूरतों का क़रीब 90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। तेल आयात करने में भारत को काफ़ी विदेशी मुद्रा खर्च करना पड़ती है। कच्चे तेल की क़ीमतें बहुत कुछ OPEC देशों की नीति और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति पर निर्भर रहती है। इन्हीं कारणों से भारत में तेल के दाम कम-ज़्यादा होते रहते हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस समय पेट्रोल और डीज़ल जीएसटी के दायरे से बाहर हैं। पेट्रोल-डीज़ल पर केन्द्र सरकार अपना टैक्स वसूलती है तो राज्य सरकारें अपने हिसाब से टैक्स लगाती हैं, जिसके कारण केन्द्र और राज्य सरकारों को काफ़ी आय होती है।
 
लेकिन काफ़ी समय से मांग चल रही है कि पेट्रोल को भी जीएसटी के दायरे में लाया जाना चाहिए, जिससे इनके दाम कम हो सकें और आम जनता पर बोझ कम हो। भारतीय उद्योग मण्डल ASSOCHAM (The Associated Chambers of Commerce and Industry of India) ने एक बार फ़िर से पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी में शामिल करने की मांग की है। ASSOCHAM का तर्क है कि यदि पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी में शामिल किया जाता है तो इससे पेट्रोल के दाम काफ़ी कम हो सकते हैं।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि दिल्ली में एक लीटर पेट्रोल पर 35.56 रुपये वैट और एक्साइज़ ड्यूटी के तौर पर चुकाए जाते हैं। वहीं डीलर को 3.57 रुपये प्रति लीटर कमीशन मिलता है और वहीं डीलर कमीशन पर वैट भी वसूल किया जाता है। इन सभी टैक्सों को मिलाकर ही एक लीटर पेट्रोल की क़ीमत काफ़ी ज़्यादा हो जाती है। अनुमान है कि यदि पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाया जाता है तो पेट्रोल क़रीब 25 रुपये प्रति लीटर तक सस्ता हो सकता है।

जानकारी के मुताबिक़ एक लीटर पेट्रोल की जितनी असल क़ीमत होती है उतना ही उस पर टैक्स भी लगता है। रिफायनरी से पेट्रोल-डीज़ल निकलने से लेकर ग्राहक को मिलने तक पेट्रोल-डीज़ल के दाम हर स्तर पर बढ़ते जाते हैं। पेट्रोल-डीज़ल पर सबसे पहले केन्द्र सरकार एक्साइज़ ड्यूटी लगाती है। जिसके बाद राज्य सरकारें इस पर वैट टैक्स लगाती हैं। इसके बाद इसमें डीलर का कमीशन भी जोड़ा जाता है। इस तरह से हर स्तर पर पेट्रोल-डीज़ल पर टैक्स लगता जाता है और आख़िर में ग्राहक तक पहुंचते-पहुंचते पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमत उसकी असल क़ीमत से काफ़ी ज़्यादा हो जाती है।

हालांकि, यदि पेट्रोल-डीज़ल को जीएसटी के दायरे में लाया जाता है तो इससे आम लोगों को सस्ती दर पर तेल मिलेगा, लेकन इससे केन्द्र और राज्य सरकारों को राजस्व की काफ़ी हानि होगी। पेट्रोलियम क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाने के बाद यदि उस पर जीएसटी की सबसे ऊंची दर (28%) से भी टैक्स लगाया जाता है तो भी पेट्रोल के दाम काफ़ी कम हो जाएंगे। यदि ऐसा होता है तो पेट्रोल के दाम 75 रुपये प्रति लीटर से घटकर क़रीब 50 रुपये प्रति लीटर तक आ सकते हैं।
 
दरअसल, यह बात सही है कि काफ़ी लम्बे वक़्त से यह मांग की जा रही है कि पेट्रोल को जीएसटी के दायरे में लाया जाना चाहिए। लेकिन आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पेट्रोल को जीएसटी के दायरे में लाना आसान नहीं है। ऐसा इसलिए, क्योंकि पेट्रोल को जीएसटी में लाने का फ़ैसला सिर्फ़ केन्द्र सरकार नहीं कर सकती है। जीएसटी में किस उत्पाद को शामिल किया जाए और उस पर कितना टैक्स लगाया जाए इसका फ़ैसला जीएसटी काउंसिल की बैठक में लिया जाता है।

जैसा कि हमने आपको पहले बताया कि पेट्रोल-डीज़ल पर टैक्स से केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों को काफ़ी राजस्व हासिल होता है। ऐसे में शायद ही केन्द्र सरकार या किसी राज्य की सरकार इस बात पर राजी हो कि पेट्रोल को जीएसटी के दायरे में लाया जाए, क्योंकि पेट्रोल को जीएसटी में लाने से सरकारों की आय का एक बड़ा जरिया बंद हो जाएगा।
 
वैसे पेट्रोल को जीएसटी में शामिल करने से केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों को घाटा नहीं है। उन्हें पेट्रोल पर काफ़ी टैक्स तो मिलेगा, लेकिन उतना टैक्स नहीं मिलेगा जितना टैक्स बिना जीएसटी के अभी मिल रहा है। समय-समय पर चर्चाएं होती रहती हैं कि आम जनता को सहूलियत देने के लिए कम से कम पेट्रोल को तो जीएसटी के दायरे में सरकारों ला सकती हैं, लेकिन इस बारे में किसी भी तरह की सहमति केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों के बीच अभी तक नहीं बन पाई है। अब जबकि ASSOCHAM ने मांग की है कि पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाया जाना चाहिए, तो ऐसे में देखना होगा कि इस बारे में अब सरकारों का क्या रुख रहता है।