राज्यसभा उप सभापति पद के लिए उलझे समीकरण, भाजपा खेल सकती है 'बड़ा दांव'
JULY 17 (WTN) - राज्यसभा के उप सभापति पद के लिए संशय बना हुआ है। जानकारी के मुताबिक टीएमसी यानि कि तृणमूल कांग्रेस राज्यसभा के उप सभापति पद के लिए होने वाले सम्भावित चुनाव के लिए अपना उम्मीदवार नहीं उतारेगी। संसद सत्र के दौरान रणनीति पर चर्चा करने के लिए विपक्षी दलों की बैठक में तृणमूल कांग्रेस ने साफ कर दिया है कि वो अपना उम्मीदवार नहीं उतारेगी।
माना जा रहा था कि राज्यसभा के उप सभापति पद के लिए होने वाले सम्भावित चुनाव में टीएमसी के राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय विपक्ष के उम्मीदवार के तौर पर उतारे जा सकते हैं, लेकिन ख़ुद सुखेंदु शेखर रॉय ने पार्टी की ओर से इन अटकलों पर विराम लगा दिया है।
संविधान की धारा 89 (2) में ज़िक्र है कि उप सभापति का पद खाली होने पर उसे जल्द से जल्द भरा जाना चाहिए। माना जा रहा है कि संसद के मॉनसून सत्र के दौरान ही इस पद पर किसी को बैठाया जा सकता है। लेकिन मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक, सभी विपक्षी पार्टियों के अध्यक्ष ही इस पर कोई फ़ैसला लेंगे कि विपक्ष का साझा उम्मीदवार कौन हो
इधर अभी तक सरकार की तरफ़ से इस मसले पर कोई बड़ी पहल नहीं की गई है, और माना जा रहा है कि इसके लिए विपक्ष सरकार की ओर से किसी प्रस्ताव का इंतज़ार कर रहा है। लेकिन इतना तो ज़रूर तय माना जा रहा है कि विपक्ष की ओर से कम से कम कांग्रेस का कोई नेता उम्मीदवार के तौर पर नहीं उतारा जाएगा।
टीएमसी के इनकार के बाद माना जा रहा है कि शरद पवार की पार्टी एनसीपी को उम्मीदवारी का प्रस्ताव दिया जा सकता है। यदि ऐसा होता है और एनसीपी किसी मराठी भाषी सांसद को उप सभापति पद के लिए सम्भावित चुनाव में खड़ा करती है तो शिवसेना का साथ उसे मिल सकता है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस समय राज्यसभा में भाजपा के सबसे ज्यादा 69 सांसद हैं तो दूसरे नम्बर पर कांग्रेस के 50 सांसद हैं। इसके बाद एआईएडीएमके, टीएमसी और समाजवादी पार्टी के 13-13 सांसद राज्यसभा में हैं। वहीं एनसीपी के सिर्फ 4 सांसद राज्यसभा में हैं।
सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक एनडीए बीजेडी के किसी सांसद को राज्यसभा में उप सभापति पद के लिए अपना साझा उम्मीदवार बना सकता है। बीजेडी के नौ सांसद इस समय राज्यसभा में हैं। सूत्रों के अनुसार भाजपा ओडिसा में वापस बीजेडी को साथी बनाने की कवायद में है। ऐसा इसलिए, क्योंकि 2019 के लोकसभा चुनाव में हिन्दी भाषी राज्यों से भाजपा को सीटें कम होने का अनुमान है। ऐसे में भाजपा बीजेडी के रूप में कोई ऐसा साथी देख रही है जो 2019 में भाजपा का साथ दे सके।