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मध्य प्रदेश सरकार और निजी स्कूल संचालकों में ‘तकरार’

08 Aug 2018
बेतहाशा स्कूल फीस वृद्धि पर सरकार लगाएगी ‘लगाम’

AUG 08 (WTN) – मध्य प्रदेश में हर साल सिर्फ 10 प्रतिशत फीस बढ़ाने के सरकार के प्रस्ताव का निजी स्कूल संचालकों ने विरोध तेज कर दिया है। निजी स्कूल संचालकों ने साफ कर दिया है कि उन्हें “मध्य प्रदेश निजी विद्यालय फीस अधिनियम” की शर्तों पर आपत्ति है। निजी स्कूलों का कहना है कि इतनी कम फीस वृद्धि से उनके स्कूल का खर्च नहीं चलेगा, इसलिए इस प्रावधान को खत्म किया जाना चाहिए।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि स्कूल शिक्षा विभाग ने 26 जून को कानून का मसौदा सार्वजनिक किया था और 25 जुलाई तक इस पर दावे-आपत्तियां मंगाए थे। कानून की शर्तों से निजी स्कूलों को इतनी आपत्ति है कि एक महीने में करीब एक हज़ार से ज़्यादा आपत्तियां दर्ज कराई गईं हैं।

राज्य सरकार के इस नये कानून की शर्तों के विरोध में सभी निजी स्कूल संचालक एकजुटता दिखा रहे हैं। निजी स्कूल संचालकों का कहना है कि यदि सिर्फ 10 प्रतिशत फीस ही बढ़ाई तो स्कूल का खर्चा तक नहीं निकल सकेगा। 

इतना ही नहीं, निजी स्कूल संचालकों ने कैशलैस सुविधा का भी विरोध किया है। कैशलैस को लेकर स्कूल संचालकों ने आपत्ति जताई है कि अधिकतर लोगों को नेट बैंकिंग या मोबाइल से ट्रांजेक्शन करना नहीं आता है, ऐसे में फीस जमा करने में परेशानी का सामना अभिभावकों को करना पड़ेगा।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि कानून के नये मसौदे में साल में सिर्फ दस प्रतिशत फीस बढ़ाने का प्रावधान किया गया है। यदि निजी स्कूलों ने इससे ज़्यादा फीस मांगी तो फीस को अमान्य करने का प्रावधान किया गया है।

ऐसा नहीं है कि सिर्फ फीस के मुद्दे पर निजी स्कूल संचालकों को आपत्ति है। फीस के अलावा निजी स्कूल संचालकों ने कई अन्य प्रावधानों पर आपत्ति जताई है, जैसे फीस का भुगतान चैक से बैंक खातों में करना। अधिकारियों का कभी भी स्कूल जाकर दस्तावेजों की जांच करना। स्कूलों को 21 रजिस्टर रखना और 22 पृष्ठों की जानकारी देना। अभिभावकों को ज़िला और राज्य कमेटी में शामिल नहीं करना। तीन साल की ऑडिट रिपोर्ट और फीस बढ़ाने का आवेदन 150 दिन पहले देना।

निजी स्कूल संचालकों की कुछ आपत्तियां अपनी जगह ठीक है। लेकिन देखा गया है कि कई बार निजी स्कूलों में फीस इतनी बढ़ा दी जाती है जिससे अभिभावकों को परेशानी का सामना करना पड़ेगा। फीस के साथ-साथ कई तरह के अन्य शुल्क निजी स्कूलों के द्वारा विद्यार्थियों से लिये जाते हैं जिससे आर्थिक बोझ अभिभावकों पर बढ़ जाता है। कुछ आपत्तियां तर्कसंगत हो सकती हैं, लेकिन निजी स्कूल संचालकों को भी अभिभावकों की परेशानियों को देखना चाहिए।