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आपके किसके भक्त हैं शंकर के या शिव के ?

14 Aug 2018
अलग अलग हैं शंकर और शिव!

AUG 14 (WTN) – आप शंकर के भक्त हैं या फिर शिव के ? सुनकर आप आश्चर्य कर रहे होंगे कि आखिर यह कैसा प्रश्न है। क्या शंकर और शिव अलग-अलग हैं ? जी हां शंकर और शिव दोनों ही अलग हैं। हम आपको बताते हैं कि शंकर और शिव में क्या अंतर है। 

भगवान शंकर उस त्रिमूर्ति का हिस्सा हैं जिससे सम्पूर्ण सृष्टि का निर्माण हुआ है। यानि कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश। जैसा कि आप जानते ही होंगे कि ब्रह्मा का कार्य सृष्टि का निर्माण करना, विष्णु का कार्य इस सृष्टि को चलाए रखना और महेश का कार्य सृष्टि का विनाश करना है ताकि दोबारा सृजन किया जा सके।

हिन्दू धर्म में शिव को इन सब से ऊपर बताया गया है। यानि कि शिव का कोई आकार नहीं है। शिव ही अनंत सृष्टि का सत्य हैं। शिव की ही पूजा लिंगम के तौर पर की जाती है। यानि भगवान के भी वह रचयिता हैं। शिव ने ही इस त्रिमूर्ति को बनाया है। अनंत सृष्टि का निर्माण भी उन्होंने ही किया है।

आपने देखा होगा कि शिवलिंग के ऊपर तीन रेखाएं निर्मित की जाती हैं। इन तीनों रेखाओं का अर्थ होता है त्रिनेत्री, त्रिकालदर्शी और त्रिलोकनाथ। त्रिनेत्री का अर्थ है ज्ञान के तीन नेत्रों वाला। त्रिकालदर्शी का अर्थ है जो समय के तीनों भागों को देख सकें। त्रिलोकनाथ का अर्थ है तीनों लोक का भगवान।

वेदों और पुराणों में वर्णित है कि  भगवान शिव निरंकारी है और उनका कोई आकार नहीं है। उनका कोई रूप नहीं है। सब उनसे ही उत्पन्न हुए हैं और एक दिन सब उनमें ही मिल जाएंगे। उन्हें ही सदाशिव कहा जाता है। शंकर भगवान भी भगवान शिव का ही एक अंश है।

भगवान शिव तो हर जगह हैं। वही सब कुछ हैं और वही कुछ नहीं। शिव को ही हम हर नाम दे सकते हैं, क्योंकि वो बिना आकार के हैं। बिना रंग रूप हैं, वही नारायण हैं, वही राम हैं, वही कृष्ण हैं और वही शंकर है।

पुराणों के अनुसार शंकर भगवान भी योग मुद्रा में शिव का ही ध्यान करते हैं। लेकिन समय के साथ दोनों ही नामों को एक समझ लिया गया। लेकिन शंकर भगवान स्वयं शिव के अंश हैं। भगवान शिव हर कहीं हैं, हर देव में हैं, हर मनुष्य में हैं। आप भी शिव को महसूस कर सकते हैं, आप भी उन्हें देख सकते हैं,  लेकिन उन्हें देखने के लिए आपके मन में भी शिव होने चाहिए।