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नोटा बन सकता है भाजपा के लिए ‘घातक’

01 Sep 2018
प्रधानमंत्री मोदी का मिशन 2022 कहीं ‘सपना’ ना रह जाए!

SEP 01 (WTN) – प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी कई ‘महत्वाकांक्षी योजनाओं’ के पूरा करने के लिए 2022 तक का समय जनता से मांगा है। 2014 के लोकसभा चुनाव जीतने के बाद मोदी सरकार के पांच साल 2019 में पूरे होने जा रहे हैँ। प्रधानमंत्री मोदी जिस ‘आत्मविश्वास’ से 2022 की बात करते हैं, उससे तो ऐसा लगता है कि उन्हें पूरा ‘विश्वास’ है कि वे 2019 के लोकसभा चुनाव में जीत हासिल करेंगे। लेकिन यदि वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों का ‘विश्लेषण’ किया जाए, तो प्रधानमंत्री मोदी के लिए एससी-एसटी एक्ट में किया गया संशोधन ‘भारी’ ना पड़ जाए।
 
जैसा कि आप जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक निर्णय में आदेश दिया था कि एससी-एसटी एक्ट में सक्षम अधिकारी की जांच के बाद ही गिरफ्तारी होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसला का दलित संगठनों ने ‘जमकर विरोध’ किया था और कई जगहों पर ‘हिंसक प्रदर्शन’ भी हुआ था। भाजपा समेत एनडीए के दलित सांसदों ने प्रधानमंत्री मोदी से सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदलने के लिए अध्यादेश लाने की मांग की थी। चारों तरफ ‘दबाव’ के बाद मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को बदलते हुए एससी-एसटी एक्ट में पुराने प्रावधान को ही लागू कर दिया।
 
मोदी सरकार के इस फैसले के बाद से देश के सवर्ण समाज और पिछड़ा समाज में ‘गुस्सा‘ देखा जा रहा है। इन लोगों का कहना है कि बिना जांच के गिरफ्तारी का प्रावधान नहीं होना चाहिए। कहा जा रहा है कि बड़ी तादात में सवर्ण समाज और पिछड़ा समाज के लोगों ने इस कानून के खिलाफ ‘एकजुट’ होकर लोकसभा चुनाव में ‘नोटा’ का प्रयोग करने का फैसला लिया है। कहीं नोटा का प्रयोग मोदी सरकार के लिए ‘घातक’ ना बन जाए।
 
सोशल मीडिया पर इन दिनों चल रहे संदेशों का अध्ययन करने के बाद कहा जा सकता है कि एससी-एसटी एक्ट में संशोधन के बाद समाज के एक बड़े तबके में ‘गुस्सा’ है। व्हाट्सएप और फेसबुक पर संदेश भेजे जा रहे हैं कि एससी-एसटी एक्ट में संशोधन के बाद किसी भी पार्टी को वोट नहीं देना है और ‘नोटा’ का विकल्प चुनना है। इस तरह के संदेशों के द्वारा किसी भी पार्टी का समर्थन लोकसभा चुनाव में नहीं करने की बात कही जा रही है। कहा जाता है कि सवर्ण और पिछड़ा समाज हमेशा से भाजपा का परम्परागत वोटबैंक रहा है, लेकिन एससी-एसटी एक्ट में संशोधन के बाद यह वर्ग भाजपा से नाराज चल रहा है।
 
एससी-एसटी एक्ट में संशोधन कहीं मोदी सरकार के लिए भारी ना पड़ जाए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दलित वोट बैंक हमेशा से ही बसपा के साथ रहा है, ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी ने एससी-एसटी एक्ट में संशोधन करके पूरी ‘कोशिश’ की है कि दलित समाज को ‘खुश’ करके उनके वोट हासिल किए जाएं। लेकिन सालों से बसपा का वोटबैंक रहा दलित समाज क्या भाजपा को वोट देगा? इस पर बड़ा सवाल है।
 
यदि सवर्ण और पिछड़े वर्ग ने भाजपा के वोट देने की जगह ‘नोटा’ को ‘प्राथमिकता’ दे दी, तो प्रधानमंत्री मोदी का मिशन 2022 कहीं ‘सपना’ ही ना रह जाए। लोकसभा चुनाव से पहले मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव से ‘साफ’ हो जाएगा कि सवर्ण समाज और पिछड़ा वर्ग किस पार्टी के साथ जाता है। यदि इन तीनों राज्यों में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा तो भाजपा को एससी-एसटी एक्ट में संशोधन बहुत भारी पड़ जाएगा।