शाम को पूजा करने के हैं कुछ नियम
SEP 04 (WTN) – हिन्दू धर्म में सूर्य की पहली किरण के साथ ही घर में पूजा पाठ का रिवाज है। धूप-दीप की सुगंध से वातावरण महक उठता है, शंख और घण्टी की मधुर ध्वनि घर में सकारात्मकता का संचार करती है। कहा जाता है कि यदि दिन का प्रारम्भ यदि देवी-देवताओं की आराधना के साथ किया जाए तो सारा दिन सुख-शांति से व्यतीत होता है।
शास्त्रों में कहा गया है कि सुबह के समय दैवीय शक्तियां बलवान होती हैं और संध्या के समय आसुरी। मान्यता है कि भगवान को प्रसन्न करने के लिए सुबह पाठ-पूजा अवश्य करना चाहिए। वहीं आसुरी शक्तियों के प्रभाव को खत्म करने के लिए संध्याकाल को देव उपासना करना चाहिए।
लेकिन शाम को पूजा करते समय कुछ सावधानियां रखनी चाहिए। क्या हैं ये सावधानियां हम आपको बताते हैं।
तुलसी के पत्ते और गंगाजल कभी बासी नहीं होते हैं। इसके अतिरिक्त किसी भी बासी सामग्री का उपयोग पूजा के समय नहीं करें। इसलिए शाम को तुलसी के पत्ते और गंगाजल का प्रयोग पूजा में किया जा सकता है।
सूर्यास्त के बाद देवी-देवता विश्राम के लिए चले जाते हैं, इसलिए शंख और घण्टियां नहीं बजाना चाहिए।
सूर्यास्त के बाद वनस्पति से छेड़-छाड़ नहीं करनी चाहिए। इसलिए पूजा के लिए जो भी फल-फूल और पत्ते चाहिए हों, वह दिन के समय ही तोड़ कर रख लें।
भगवान विष्णु और उनके किसी भी अवतार को तुलसी पत्र अर्पित किए बिना भोग नहीं लगता है। तुलसी को भोग लगाए बिना भगवान उसे ग्रहण नहीं करते हैं।
शाम को पूजा और आरती करने के बाद रात को सोने से पहले मंदिर के आगे पर्दा करें, ताकि भगवान के विश्राम में बाधा उत्पन्न न हो। मंदिर के कपाट एक बार बंद कर दें तो सूर्यादय पर ही खोलें।