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जानिए रिज़र्व बैंक की मैद्रिक समीक्षा के दौरान उपयोग में आने वाले शब्दों के अर्थ

19 Sep 2018
रिज़र्व बैंक, बैंकों से ब्याज लेता भी है और देता भी है

SEP 19 (WTN) – समय-समय पर भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा आर्थिक नीतियों की समीक्षा की जाती है। इस दौरान रेपो रेट, रिवर्स रेपो रेट और सीआरआर यानि कि नगर आरक्षित अनुपात के विषय में चर्चा होती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आख़िर रेपो रेट, रिवर्स रेपो रेट और सीआरआर क्या होता है। यदि नहीं जानते हैं तो हम आपको बताते हैं।
 
रेपो रेट (Repo Rate) - दैनिक कामकाज के लिए बैंकों को भी बड़ी-बड़ी रकम की ज़रूरत पड़ जाती है, और ऐसी स्थिति में बैंक देश के केंद्रीय बैंक, यानि भारतीय रिज़र्व बैंक ऋण लेते हैं। इस तरह के ओवरनाइट ऋण पर रिज़र्व बैंक जिस दर से बैंकों से ब्याज वसूलता है, उसे ही रेपो रेट कहते हैं।
 
यानि कि जब बैंकों को रिज़र्व बैंक से कम दर पर ऋण उपलब्ध होगा तो वे भी ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए अपनी ब्याज दरों को कम कर सकते हैं। इसी तरह यदि रिज़र्व बैंक रेपो रेट में वृद्धि करता है तो बैंकों के लिए ऋण लेना महंगा हो जाएगा तो वे भी अपने ग्राहकों से वसूल की जाने वाली ब्याज दरों को बढ़ा देंगे। इसलिए रिज़र्व बैंक की मौद्रिक नीति की घोषणा होने समय रेपो रेट पर सभी की निगाहें टिकी रहती हैं।
 
रिवर्स रेपो रेट (Reverse Repo Rate) - रिवर्स रेपो रेट, रेपो रेट से उलटा होता है। जब कभी बैंकों के पास दिन-भर के कामकाज के बाद बड़ी रकम बची रह जाती हैं तो वे उस रकम को रिज़र्व बैंक में रख देते हैं। इस रकम पर आरबीआई उन्हें ब्याज देता है। रिज़र्व बैंक इस ओवरनाइट रकम पर जिस दर से ब्याज अदा करता है, उसे ही रिवर्स रेपो रेट कहते हैं।
 
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि रिवर्स रेपो रेट बाज़ारों में नकदी की तरलता को नियंत्रित करने में काम आती है। जब भी बाज़ारों में बहुत ज़्यादा नकदी दिखाई देती है तो आरबीआई रिवर्स रेपो रेट बढ़ा देता है, ताकि बैंक ज़्यादा ब्याज कमाने के लिए अपनी रकमें उसके पास जमा करा दें और इस तरह बैंकों के पास बाज़ार में कर्ज़ा देने के लिए कम रकम रह जाएगी।
 
नकद आरक्षित अनुपात (Cash Reserve Ratio) - बैंकिंग नियमों के तहत हर बैंक को अपनी कुल कैश रिज़र्व का एक निश्चित हिस्सा रिज़र्व बैंक के पास रखना ही होता है। इसे ही कैश रिज़र्व रेशो अथवा नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) कहा जाता है।