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अब क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों पर मोदी सरकार की ‘नज़र’

24 Sep 2018
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के बाद अब क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के विलय की सरकार की योजना

SEP 24 (WTN) – हाल में कुछ दिनों पहले ही मोदी सरकार ने घोषणा की थी कि सार्वजनिक क्षेत्र के तीन बैंकों, बैंक ऑफ़ बड़ौदा, विजया बैंक और देना बैंक का विलय जल्द ही होगा। सरकार की मंशा है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का विलय कर देश में चार से लेकर पांच तक सार्वजनिक क्षेत्र के बड़े बैंक हो जिससे बैंकों के संचालन ख़र्च में कमी आए और दिनों दिनों बढ़ते एनपीए पर लगाम लग सके।
 
मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक, अब सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के साथ-साथ अब क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (आरआरबी) के एकीकरण की प्रक्रिया भी शुरू करने जा रही है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अभी क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की संख्या देश में कुल 56 है, सरकार की मंशा है कि इनकी संख्या 56 से घटाकर 36 कर दी जाए। मीडिया से मिली जानकारी के अनुसार, वित्त मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक केन्द्र सरकार ने इस विषय में राज्यों से चर्चा करना शुरू कर दिया है क्योंकि देश में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के वह भी प्रायोजक हैं। कहा जा रहा है कि प्रायोजक बैंक किसी एक राज्य के अंदर स्थित आरआरबी के आपस में विलय की रूपरेखा तैयार कर रहे हैं।
 
कहा जा रहा है कि क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के विलय से आरआरबी की दक्षता और उत्पादकता बढ़ेगी और साथ ही इन बैंकों की वित्तीय स्थिति में भी सुधार आएगा। यदि बैंकों का विलय होता है तो वित्तीय समावेशन बेहतरीन तरीके से होगा जिससे ग्रामीण इलाकों में कर्ज़ का प्रवाह बढ़ सकेगा
 
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों का गठन आरआरबी अधिनियम 1976 के तहत किया गया है। इन बैंकों के गठन के पीछे का मकसद छोटे किसानों, कृषि श्रमिकों और ग्रामीण क्षेत्र में कारीगरों को कर्ज़ और दूसरी सुविधाएं उपलब्ध कराना था। धीरे-धीरे भारत में यह बैंक ग्रामीण क्षेत्रों में काफ़ी लाभकारी रहीं और काफ़ी किसानों, श्रमिकों और कारीगरों ने इससे लाभ उठाया।
 
साल 2015 में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के कानून में संशोधन किया गया, इसके तहत इन बैंकों को केन्द्र, राज्य सरकारों और प्रायोजक बैंक के अलावा दूसरे स्रोतों से पूंजी जुटाने की अनुमति दी गई। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि फिलहाल क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों में केन्द्र सरकार की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत है, जबकि 35 प्रतिशत हिस्सेदारी सम्बन्धित प्रायोजक बैंक की और 15 प्रतिशत हिस्सेदारी राज्य सरकारी की है।
 
जिस तरह से मोदी सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का विलय करने की योजना बनाई है उसी तरह की योजना क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के विलय की है। लेकिन यह इतना आसान नहीं हैं, क्योंकि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में राज्य सरकारों की कोई भी हिस्सेदारी नहीं होती है इसलिए इनका विलय आसान है। लेकिन चूंकि क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों में सम्बन्धित राज्य सरकार की भी हिस्सेदारी होती है इसलिए जिन राज्यों में भाजपा की सरकार नहीं है वहां पर विरोध होना स्वाभाविक है।