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विश्लेषण: क्या आर्थिक मोर्चे पर फेल हो गई है मोदी सरकार?

02 Oct 2018
चार साल, 21 बैंक और 3.16 लाख करोड़ रुपए का कर्ज़ बट्टे खाते में!

OCT 01 (WTN) – पहले नोटबंदी फ़िर जीएसटी और उसके बाद बैंकों का बढ़ता एनपीए और अब लगातार डॉलर के मुक़ाबले कमज़ोर होते रुपये के बीच आज सबसे बड़ा सवाल है कि क्या मोदी शासन में देश की अर्थव्यवस्था सबसे बुरे दौर से गुज़र रही है। क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और वित्त मंत्री अरुण जेटली देश की अर्थव्यस्था को नई दिशा और दशा देने में असफल रहे हैं। इतना ही नहीं, मोदी शासन में बैंकों की हालत अब तक के सबसे ख़राब दौर में हैं। हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं कि क्योंकि देश के सबसे बड़े बैंक एसबीआई का नुकसान में जाना और दिनों दिनों बैंकों का एनपीए का बढ़ना इसी बात की तरफ़ संकेत है।
 
मोदी सरकार के दौरान देश की अर्थव्यस्था पर लगातार निशाना साधने वाले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने रिज़र्व बैंक की रिपोर्ट के बाद मोदी सरकार पर जमकर निशाना साधा है। बैंक डिफ़ाल्टरों के विदेश भागने से लेकर राफेल डील तक, मोदी सरकार की हर गतिविधि पर राहुल गांधी उन्हें कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। राहुल गांधी ने मोदी सरकार पर तंज कसते हुए ट्वीट किया है, “मोदी के भारत में आम आदमी को बैंकों में अपना पैसा रखने के लिए कतारों में खड़ा होना पड़ता है। हमारा पूरा ब्योरा आधार के रूप में जमा है। आप अपने ही पैसे का इस्तेमाल नहीं कर सकते।“
 
इतना ही नहीं राहुल गांधी ने मोदी सरकार पर बड़ा आरोप लगता हुए लिखा है कि मोदी सरकार की पूंजीपतियों के साथ साठगांठ है। राहुल गांधी ने आगे अपने ट्वीट में लिखा, “साठगांठ करके काम करने वाले पूंजीपतियों ने नोटबंदी में अपना पूरा कालाधन सफेद कर लिया। आम आदमी के पैसे का इस्तेमाल करके 3.16 लाख करोड़ रुपए के कर्ज़ को बट्टे खाते डाल दिया गया।“
 
इधर, वित्त मंत्री अरुण जेटली ने आरबीआई की रिपोर्ट आने के बाद सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा ऋण को बट्टे खाते में डालने की कार्रवाई का जमकर बचाव किया है। अपनी सरकार पर लग रहे आरोपों के जवाब में जेटली ने कहा, “कर्ज़ को बट्टे खाते में डालने का मतलब यह नहीं है कि कर्ज़ की वसूली छोड़ दी गई है।”
 
आगे जेटली ने कहा, “कर्ज़ को बट्टे में डालना बैंकिंग कारोबार में एक सामान्य प्रक्रिया है और इससे बैंकों का बही खाता साफ़ सुथरा होता है और साथ ही उन्हें अपना कर दायित्व भी उचित रखने में मदद मिलती है।”
 
बैंकों के बढ़ते एनपीए पर आंकड़ों के ज़रिये सफ़ाई देते हुए जेटली ने कहा, “सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-जून की तिमाही में 36,551 करोड़ रुपए के डूबे कर्ज़ की वसूली की है। वहीं वर्ष 2017-18 की पूरी अवधि में कुल वसूली 74,562 करोड़ रुपए थी।”
 
वित्त मंत्री जेटली ने फेसबुक पर अपने एक लेख में उन ख़बरों पर प्रतिक्रिया दी है जिनमें कहा गया है कि देश के सार्वजनिक क्षेत्र के 21 बैंकों ने भाजपा सरकार के चार साल के कार्यकाल में 3.16 लाख करोड़ रुपए के ऋण बट्टे खाते में डाले हैं, जबकि बट्टे खाते में डाले गए कर्ज़ की वसूली सिर्फ़ 44,900 करोड़ रुपए के बराबर रही है। इस पर सफ़ाई देते हुए जेटली ने लिखा है, “बैंकों द्वारा तकनीकी रूप से कर्ज़ को बट्टे खाते में डालने की कार्रवाई भारतीय रिज़र्व बैंक के दिशानिर्देशों के अनुसार की जाती है।”
 
अरुण जेटली ने राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा, “बट्टे खाते में डालने का मतलब कर्ज़ माफ़ करना नहीं होता है। बैंक पूरी तत्परता से कर्ज़ वसूली का काम करते रहते हैं। ज़्यादातर मामलों में चूक करने वाली कम्पनियों के प्रबंधन को दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) के तहत हटा दिया गया है।”
 
वित्त मंत्री अरुण जेटली की यह बात सही है कि कर्ज़ को बट्टे में डालना बैंकिंग कारोबार में एक सामान्य प्रक्रिया है और इससे बैंकों का बही खाता साफ़ सुथरा होता है। लेकिन बड़ा सवाल है कि आख़िर क्या कारण है कि बड़े-बड़े उद्योगपतियों से बैंक कर्ज़ की वसूली नहीं कर पा रहे हैं। आम जनता के सामने तो यही संदेश जा रहा है कि मोदी शासन में उद्योगपति बैंकों का कर्ज़ नहीं चुका पा रहे हैं जिसके कारण बैंकों पर एनपीए बढ़ता जा रहा है। खैर वित्त मंत्री अरुण जेटली कितनी भी सफ़ाई दें, लेकिन आने वाले लोकसभा चुनाव में इसका जवाब तो मोदी सरकार को देना ही होगा।