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दोहरी खुशी का दिन! पेट्रोल-डीज़ल के दाम हुए कम, रेपो रेट में नहीं हुई वृद्धि

05 Oct 2018
रिज़र्व बैंक: महंगाई दर 4 प्रतिशत और आर्थिक वृद्धि दर 7.4 प्रतिशत रहने का अनुमान

OCT 05 (WTN) – पेट्रोल-डीज़ल के सस्ते होने के बाद आज लोगों के लिए दूसरी अच्छी ख़बर है। अच्छी ख़बर यह है कि रिज़र्व बैंक ऑफ़ इण्डिया ने आज घोषित अपनी क्रेडिट पॉलिसी में रेपो रेट में वृद्धि नहीं की है। लिक्विडिटी एडजस्टमेंट फैसिलिटी के तहत रिज़र्व बैंक ने पॉलिसी रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया है, यानि कि रेपो रेट फिलहाल 6.50 प्रतिशत पर ही बना रहेगा। वहीं रिवर्स रेपो रेट में भी किसी तरह का बदलाव नहीं किया गया है और उसे भी 6.25 प्रतिशत पर बरकरार रखा गया है।
 
आरबीआई ने अपनी क्रेडिट पॉलिसी में कहा है कि इनफ्लेशन रेट यानि कि महंगाई दर चार प्रतिशत रह सकती है। वहीं रिजर्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष में आर्थिक वृद्धि दर का अनुमान 7.4 प्रतिशत पर बरकरार रखा है तो वित्त वर्ष 2019-20 में वृद्धि 7.6 प्रतिशत का अनुमान है। इधर आरबीआई के रेपो रेट में कोई बदलाव न होने की ख़बर बाज़ार में आते ही मार्केट अचानक नीचे गिर गया है। वहीं रुपया भी अब तक के निचले स्तर पर पहुंच गया है और डॉलर के मुकाबले रुपए ने 74.07 का सबसे ऊंचा स्तर छू लिया है।
 
रेपो रेट के बारे में आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल ने बताया कि मॉनिटरिंग पॉलिसी की बैठक में रेपो रेट बढ़ाने के लिए सिर्फ़ एक ही वोट पड़ा जबकि विरोध में पांच वोट पड़े। आप सोच रहे होंगे कि आख़िर हमने ऐसा क्यों लिखा कि रेपो रेट नहीं बढ़ना जनता के लिए खुशी की बात है। तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि रिज़र्व बैंक के कई मूल कामों में से एक काम महंगाई पर काबू रखना भी है। महंगाई को काबू में रखने के लिए आरबीआई रेपो रेट में वृद्धि करता है। यदि महंगाई 4 प्रतिशत से ज़्यादा होती है तो आरबीआई ब्याज दरों में बढ़ोतरी करता है। रिज़र्व बैंक इस साल दो बार रेपो रेट में वृद्धि कर चुका है।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि रिज़र्व बैंक ने साढ़े चार साल के अंतराल के बाद पहली बार इस साल जून में हुई दूसरी द्वैमासिक समीक्षा बैठक में रेपो रेट में वृद्धि की थी। इसके बाद रिज़र्व बैंक ने अगस्त की नीतिगत बैठक में भी रेपो रेट में वृद्धि की थी। लगातार दो बार 0.25 प्रतिशत की वृद्धि के बाद इस समय रेपो दर 6.50 प्रतिशत पर है। रेपो रेट बढ़ाने के पीछे तर्क था कि महंगाई पर काबू पाया जाए।
 
जानकारों के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमतों में लगातार होती वृद्धि,  रुपये में गिरावट और बढ़ता चालू खाता घाटा कुछ ऐसे फैक्टर हैं जिसे ब्याज दर के संदर्भ में निर्णय लेने के समय नीति निर्माताओं को इसे ध्यान में रखना होता है। इन्हीं सब फैक्टर को देखने के बाद रेपो रेट के बारे में फ़ैसला लिया जाता है।