विश्लेषण: आख़िर अपने ही गढ़ से क्यों हारी भाजपा?
DEC 12 (WTN) – अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए काफ़ी अहम थे। इन तीनों ही राज्यों के विधानसभा चुनाव नतीजों के आधार पर ही भाजपा खुद का आंकलन कर सकती थी कि वो जनता के आशाओं पर खरा उतर पा रही है कि नहीं। इन तीनों ही राज्यों ने साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा और खासकर नरेन्द्र मोदी का जमकर साथ दिया था।
साल 2014 के लोकसभा चुनाव में मध्य प्रदेश की 29 में से 27 लोकसभा सीटों पर भाजपा ने जीत हासिल की थी, तो वहीं राजस्थान की सभी 25 लोकसभा सीटों पर कमल खिला था। वहीं छत्तीसगढ़ की 11 में से 10 सीटों पर भाजपा ने जीत का परचम लहराया था। यानि कि इन तीनों राज्यों की कुल 65 सीटों में से 62 सीटों पर भाजपा ने जीत हासिल की थी और जिसके कारण ही भाजपा को पूर्ण बहुमत हासिल हो सका और नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बन सके।
लेकिन आखिर पिछले 4 सालों में ऐसा क्या हो गया, जो इन तीनों ही राज्यों की जनता ने लोकसभा चुनाव से पहले हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा को सिरे से नकार दिया। हिंदी भाषी इन तीनों ही राज्यों में भाजपा की हार, 2019 चुनाव के लिए खतरे की घण्टी है। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को इन तीनों ही राज्यों से बम्पर सीटों पर जीत हासिल हुई थी, लेकिन क्या कारण रहा कि भाजपा को इन तीनों ही राज्यों में बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा। आइये जानते हैं वो कारण।
किसानों की नाराज़गी
कहा जा रहा कि भाजपा की हार में किसानों की नाराज़गी का बहुत बड़ा हाथ है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में ग्रामीण आबादी ज़्यादा है और क़रीब 70 से 80 प्रतिशत ग्रामीण आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खेती आ खेती से सम्बन्धित कामों पर निर्भर है। पिछले साल मध्य प्रदेश के मंदसौर में विरोध-प्रदर्शन के दौरान गोली लगने से किसानों की मौत ने किसानों को भाजपा को दूर कर दिया। मण्डी में फसलों के सही भाव नहीं मिलना और फसल बेंचने के बाद नकद रुपया नहीं मिलने से किसानों में केन्द्र और राज्य सरकार का ख़िलाफ़ खासी नाराज़गी थी।
नोटबंदी और जीएसटी का असर
भाजपा को हमेशा से व्यापारियों की पार्टी कहा जाता रहा है, और देखा गया है कि व्यापारी ने भी हमेशा भाजपा का समर्थन किया है। लेकिन नोटबंदी और जीएसटी के कारण व्यापारी वर्ग भाजपा से नाराज़ हो गया। नोटबंदी के कारण व्यापारी के साथ-साथ किसानों को भी परेशानियों का सामना करना पड़ा। कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में प्रचार के दौरान नोटबंदी और जीएसटी के मुद्दे को जमकर उछाला और जनता को याद दिलाया कि नोटबंदी के कारण उन्हें जो परेशानियां हुईं थीं उसकी ज़िम्मेदार भाजपा है। कहा जा सकता है कि नोटबंदी के कारण नाराज़ व्यापारियों ने किसानों के साथ मिलकर भाजपा को हरा दिया।
बेरोजगारी
2014 के लोकसभा चुनाव में प्रचार के दौरान नरेन्द्र मोदी ने हर साल 2 करोड़ रोजगार देने का वादा किया था, लेकिन रोजगार देने का यह वादा बस वादा ही रहा। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में युवाओं में रोजगार को लेकर राज्य सरकार से लेकर मोदी सरकार से उम्मीदें थीं। लेकिन जब रोजगार की उम्मीदें पूरी ना हो सकीं, तो युवाओं का गुस्सा भाजपा सरकार पर निकला और उसे हार का सामना करना पड़ा।
सत्ता विरोधी लहर
जैसा कि आप जानते हैं कि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में पिछले 15 साल से भाजपा सत्ता में थी। ऐसे में स्वाभाविक था कि जनता 15 सालों के बाद बदलाव चाहती थी। ऐसे में जो भी लोग सरकार के कामकाज से नाराज़ थे उन्होंने सरकार के ख़िलाफ़ वोट दिया। चुंकि विकल्प के रूप में कांग्रेस ही सामने थी इसलिए जनता ने कांग्रेस को चुना। वहीं राजस्थान में भी पिछले पांच सालों से भाजपा की सरकार थी, और वहां पर भी जनता वसंधुरा राजे सिंधिया के कामकाज से नाराज़ थी। नतीजा यह हुआ कि तीनों ही राज्यों में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा।
एससी-एसटी एक्ट में संशोधन
एससी-एसटी एक्ट में संशोधन का खामियाजा भी भाजपा को भुगतना पड़ा है। सवर्ण समाज और पिछड़ा वर्ग भाजपा का परम्परागत वोट बैंक रहा था, और इसी वर्ग ने हमेशा से भाजपा को वोट देकर राज्य और केन्द्र में जिताया था। लेकिन एससी-एसटी एक्ट में संशोधन कर भाजपा ने इस वर्ग को नाराज़ कर गिया और जिसके कारण इस वर्ग ने भाजपा के ख़िलाफ़ वोट किया और भाजपा को मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा।