विश्लेषण: जानिए क्या हैं रिज़र्व बैंक के नये गवर्नर शक्तिकांत दास के सामने ‘प्रमुख चुनौतियां’?
DEC 19 (WTN) – विवादों के बीच रिज़र्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल के इस्तीफ़े के बाद दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की केन्द्रीय बैंक की कमान सम्भाली है पूर्व वित्त सचिव शक्तिकांत दास ने। आरबीआई की स्वायतत्ता और सरकार से जारी विवाद के कारण उर्जित पटेल ने इस्तीफ़ा दे दिया था, जिसके बाद सरकार को काफ़ी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था। केन्द्र सरकार ने भी रिज़र्व बैंक का नया गवर्नर चुनने में देरी नहीं कि और पूर्व वित्त सचिव और रिटायर्ड आईएएस अधिकारी दास को रिज़र्व बैंक की कमान सौंप दी।
मोदी सरकार के महत्वाकांक्षी नोटबंदी और जीएसटी जैसे अहम आर्थिक निर्णयों को लागू करने में शक्तिकांत दास की अहम भूमिका रही थी। रिटायर्ट होने के बाद दास केन्द्र सरकार के वित्त आयोग के सदस्य के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे थे, ऐसे में नोटबंदी और जीएसटी के समय सरकार का साथ देने और आर्थिक मामलों के जानकार होने के कारण मोदी सरकार ने रिज़र्व बैंक के गवर्नर की अहम ज़िम्मेदारी दास को सौंपी है। लेकिन लगता है कि रिज़र्व बैंक के नये गवर्नर के लिए काफ़ी चुनौतियों को सामना करना पड़ेगा। क्या हैं ये चुनौतियां आइये आपको बताते हैं।
रिज़र्व बैक की स्वायत्ता के सवाल पर ही उर्जित पटेल ने गवर्नर के पद से इस्तीफ़ा दिया था, ऐसे में रिज़र्व बैंक के नये गवर्नर शक्तिकांत दास के सामने सबसे बड़ी चुनौती रिज़र्व बैंक की साख बचाने की होगी। दास की कोशिश रहेगी कि जल्द से जल्द केन्द्र सरकार और रिज़र्व बैंक के बीच चल रही खींचतान को खत्म कर केन्द्रीय बैंक की स्वायत्तता को बरक़रार रखा जाए। दुनिया भर के देशों में उनके केन्द्रीय बैंक काफ़ी अहम भूमिका निभाते हैं और अपनी सरकारों से स्वायत्त रहना ही सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण और आदर्श स्थिति मानी जाती है। ऐसे में दास के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे रिज़र्व बैंक की साख को कायम रखें।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर को तीन साल के लिए नियुक्त किया जाता है और कभी-कभी गवर्नर के काम और साख को देखते हुए उसके कार्यकाल को बढ़ा दिया जाता है। इससे पहले केन्द्र सरकार ने रघुराम राजन का कार्यकाल नहीं बढ़ाया, तो वहीं उर्जित पटेल ने बीच कार्यकाल में निजी कारणों का हवाला देते हुए इस्तीफ़ा दे दिया।
शक्तिकांत दास के सामने अब चुनौती यह होगी कि वे अपने तीन साल के कार्यकाल के दौरान रिज़र्व बैंक की साख कायम रखने के साथ-साथ केन्द्र सरकार के साथ बेहतर सामंजस्य स्थापित करें। साथ ही शक्तिकांत दास के सामने एक बड़ी चुनौती लोकसभा चुनाव के बाद आएगी, क्योंकि यदि चुनाव के बाद मोदी सरकार बदली, तो नई सरकार के साथ सामंजस्य बैठाना उनके लिए मुश्किल होगा क्योंकि दास नोटबंदी के समर्थकों में रहे हैं।
काफ़ी समय से आरबीआई में सुधार पर बहस जारी है। पूर्व के गवर्नरों ने केन्द्र सरकार द्वारा रिज़र्व बैंक में बदलाव का विरोध किया है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पिछले कुछ समय से केन्द्रीय बैंक ने देश में बैंकिंग क्षेत्र की अपनी नीतियों को कड़ा किया है। इसके चलते देश के सरकारी बैंकों के सामने कर्ज लेने और देने का काम बेहद सख्त हुआ है। ऐसे में देखना होगा कि केन्द्र सरकार की मंशा के अनुसार रिज़र्व बैंक के नये गवर्नर शक्तिकांत दास क्या केन्द्र सरकार की केन्द्रीय बैंक में बदलाव की मंशा में साथ देते हैं कि नहीं।
शक्तिकांत दास के सामने एक बड़ी चुनौती बैंकों का गम्भीर नॉन परफार्मिंग एसेट (एनपीए) भी है। बैंकों के एनपीए में सुधार की नीतियों को लागू करना और एनपीए को कम करना भी रिज़र्व बैंक के नए गवर्नर के सामने एक बड़ी चुनौती है।
अगले कुछ ही महीनों के बाद लोकसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में केन्द्र सरकार के सामने महंगाई एक बड़ा मुद्दा है। केन्द्र सरकार की मंशा रहेगी कि रिज़र्व बैंक के नये गवर्नर महंगाई पर काबू पाएं। इसलिए महंगाई को अहम आधार बनाते हुए केन्द्रीय बैंक को अपनी नीतियों को निर्धारित करना होगा।
अब जबकि वैश्विक स्तर पर ओपेक और रूस द्वारा कच्चा तेल उत्पादन में कटौती करने के ऐलान के बाद से एक बार फिर कच्चे तेल की क़ीमतें बढ़ रही हैं, तो आरबीआई के सामने चुनौती होगी कि तेल की बढ़ती क़ीमतों के बीच महंगाई को किस तरह से काबू में किया जाए।
भारत की अर्थव्यस्था दुनिया की बड़ी अर्थव्यस्थाओं में से एक है, लेकिन समय-समय पर वैश्विक और घरेलू कारणों से भारतीय अर्थव्यस्था प्रभावित होती रही है। स्वायत्ता और मौद्रिक नीति के साथ-साथ रिज़र्व बैंक के नये गवर्नर शक्तिकांत दास को मौजूदा घरेलू आर्थिक स्थिति और वैश्विक चुनौतियों को देखते हुए, देश की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाना होगा। दास को कोशिश करना होगी कि देश में निवेश के लिए अनुकूल मौहाल बने और पूरी दुनिया की कम्पनियों के पास यह संदेश जाए कि भारत में कारोबार करना सरल है। वैश्विक कम्पनियों के साथ ही घरेलू कम्पनियों के लिए सुलभ और सरल नीतियां बनाने की चुनौती दास के सामने होगी।
चुनावों को देखते हुए राजनीतिक दलों द्वारा किसानों की कर्ज़ माफ़ी की घोषणा के बाद बैंकों की वित्तीय स्थिति को मज़बूत करना भी रिज़र्व बैंक के नये गवर्नर के सामने बड़ी चुनौती है। देश के कई अर्थशास्त्री किसानों की कर्ज़माफ़ी का विरोध कर चुके हैं, ऐसे में देखना होगा कि किसानों की कर्ज़ माफ़ी की चुनौतियों के बीच दास बैंकों को मज़बूती प्रदान कर पाते हैं कि नहीं।