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मध्य प्रदेश में कैसे पूरा होगा किसानों की कर्ज़ माफ़ी का वायदा?

12 Feb 2019
राजस्व घाटे में चल रही मध्य प्रदेश की सरकार कर्ज़ के ‘भरोसे’
 
FEB 12 (WTN) – कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव से पहले मध्य प्रदेश में किसानों की कर्ज़ माफ़ी का वायदा कर तो दिया था, लेकिन सरकार बनने के बाद किसानों की कर्ज़ माफ़ी का वायदा कांग्रेस के लिए किसी बड़ी मुसीबत से कम साबित नहीं हो रहा है। मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद सरकार को अपने डेढ़ महीने के कार्यकाल में बाज़ार से तीसरी बार कर्ज़ लेना पड़ा है। राज्य सरकार की वित्तीय हालत यह है कि कर्मचारियों के वेतन देने के लिए भी किसी तरह से राजस्व जुटाना पड़ रहा है।
 
वित्तीय हालत यह हो गई है कि राज्य सरकार को अपना चालू खर्च चलाने के लिए एक बार फ़िर से एक हज़ार करोड़ रुपये का नया कर्ज़ बाज़ार से लेना पड़ रहा है। कर्ज़ लेने के लिए बाकायदा रिजर्व़ बैंक ऑफ़ इंडिया में राज्य सरकार की गवर्नमेंट स्टॉक की नीलामी होगी। लेकिन आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस बार का कर्ज़ सस्ता नहीं मिलने वाला है, क्योंकि इस बार के कर्ज़ के लिए राज्य सरकार को ज्यादा ब्याज चुकाना होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि वित्तीय वर्ष के अन्तिम दिनों में कर्ज़ लेने पर ज्यादा ब्याज सरकारों को चुकाना पड़ता है।
 
एक हज़ार करोड़ रुपये का यह नया कर्ज़ मध्य प्रदेश की सरकार दस सालों के लिए ले रही है। जानकारी के मुताबिक़ इस कर्ज़ का उपयोग राज्य सरकार के खर्चे चलाने के साथ-साथ विकास कार्यों के लिए किया जाएगा। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि मध्य प्रदेश सरकार ने 14 हज़ार करोड़ रुपये का कर्ज़ अभी तक इस वित्तीय वर्ष में बाज़ार से लिया है। एक हज़ार करोड़ रुपये के इस नये कर्ज़ के साथ राज्य सरकार पर कुल कर्ज़ इस वित्तीय वर्ष में बढ़कर 15 हज़ार करोड़ रुपये हो जाएगा।
 
इधर राज्य सरकार के वित्त विभाग से जुड़े अधिकारियों का तर्क है कि राज्य सरकारें बाज़ार से कर्ज़ लेते रहती हैं और यह एक निरंतर प्रक्रिया है जो कि चलती रहती है। खैर अपना खर्च चलाने और विकास कार्यों के लिए समय-समय पर राज्य सरकारों बाज़ार से कर्ज़ लेती रही हैं, लेकिन देश के राजनीतिक दलों को यह ध्यान रखना चाहिए कि सरकारों पर कर्ज़ होने के बाद भी आखिर क्यों वे चुनाव से पहले ऐसी घोषणाएं और वादे करती हैं जिससे राज्य सरकार के राजस्व पर विपरीत असर पड़ता है। सभी राजनीतिक दलों को पता होता है कि सरकारों की वित्तीय हालत मजबूत नहीं है, लेकिन फ़िर भी चुनाव जीतने और अपने वोटबैंक को खुश करने के लिए कर्ज़ माफ़ी जैसी योजनाओं को राजनीतिक दल लागू करते रहते हैं।