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मध्य प्रदेश में अपनी ही सरकार से ‘नाराज़’ हुए कांग्रेसी विधायक!

22 Feb 2019
मंत्रियों की कार्यप्रणाली से नाराज़ विधायकों की ‘प्रेशर पॉलिटिक्स’!

FEB 22 (WTN) – मध्य प्रदेश की राजनीति में सब कुछ ठीक ठाक नहीं चल रहा है। जैसा कि आप जानते हैं कि मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला है। कांग्रेस 114 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई, लेकिन बहुमत से दो सीटें कम रहने के कारण उसे बसपा, सपा और निर्दलीय विधायकों का समर्थन लेना पड़ा। लेकिन कहा जाता है कि कांग्रेस की इस गठबंधन सरकार में सब कुछ सही नहीं चल रहा है।
 
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि प्रदेश में सत्ताधारी कांग्रेस के विधायक अपनी ही सरकार से नाराज़ बताए जा रहे हैं और यह नाराज़गी ऐसी है कि कांग्रेस के क़रीब 25 विधायकों ने बाक़ायदा एक क्लब बना लिया है। कहा जाता है कि कमलनाथ सरकार के मंत्रियों के रवैये से नाराज़ होकर इन विधायकों ने लामबंदी शुरू कर दी है और दबाव बनाने के लिए यह क्लब बनाया है।

जानकारी के मुताबिक इन विधायकों में से कई ने तो मुख्यमंत्री कमलनाथ के सामने अपनी नाराज़गी भी जाहिर कर दी है। कहा जाता है कि ये विधायक मंत्रियों के रवैये से नाराज़ हैं। इस क्लब में ज्यादातर वे विधायक हैं जो कि पहली बार विधायक बने हैं। ऐसा नहीं है कि इस क्लब में सिर्फ़ कांग्रेस पार्टी के विधायक ही शामिल हैं, बल्कि इसमें कांग्रेस सरकार को समर्थन देने वाले अन्य दलों के विधायकों के अलावा निर्दलीय विधायक भी शामिल हैं।
 
नाराज़ विधायकों के क्लब में 28 से 30 विधायक बताए जा रहे हैं जिसमें क़रीब 25 विधायक कांग्रेस के हैं। जानकारी के मुताबिक़ विधायकों में इस बात को लेकर नाराज़गी है कि उनके क्षेत्रों में अधिकारियों के ट्रांसफर उनकी सलाह के बिना और बिना उन्हें भरोसे में लेकर किये जा रहे हैं। साथ ही नाराज विधायकों का आरोप है कि मंत्री लगातार उनकी उपेक्षा कर रहे हैं। एक तरह से इसे नाराज़ विधायकों की प्रेशर पॉलिटिक्स कहा जा सकता है, क्योंकि ऐसा करके वे अपने काम करवाना चाहेंगे।
 
जैसा कि आप जानते हैं कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस की पूर्ण बहुमत की सरकार नहीं है, ऐसे में एक-एक विधायक कांग्रेस के लिए मायने रखता है। बसपा, सपा और निर्दलीय विधायकों की नाराज़गी अपनी जगह ठीक है क्योंकि समर्थन देने वाली पार्टियां हमेशा से ही दबाव की राजनीति करती हैं, लेकिन खुद कांग्रेस के विधायकों की नाराज़गी पार्टी और सरकार दोनों के लिए चिन्ता का विषय है। वहीं कांग्रेस के कई सीनियर विधायक मंत्री ना बनाए जाने से नाराज़ बताए जाते हैं। ऐसे में अपने ही विधायकों की नाराज़गी को कांग्रेस को हल्के में नहीं लेना चाहिए।
 
कहा जा रहा है कि लोकसभा चुनाव के बाद कर्नाटक और मध्य प्रदेश दोनों ही राज्यों में दलबदल या फ़िर राजनीतिक उठापटक हो सकती है। ऐसे में अब देखना होगा कि राजनीति के माहिर खिलाड़ी कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और ज्योतिरातित्य सिंधिया अपने-अपने समर्थक विधायकों की नाराज़गी को दूर करने में सफल हो पाते हैं कि नहीं क्योंकि यदि सत्ताधारी पार्टी के विधायक ही नाराज़ रहेंगे तो इसका दूरगामी नकारात्मक परिणाम कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में भुगतना पड़ सकता है।