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उड़ीसा की ‘सवंरा’ जनजातीय चित्रकला पर प्रशिक्षण मानव संग्रहालय में

04 May 2019

भोपाल 4 मई, 2019: इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय द्वारा पारंपरिक और राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कलाकारों के सान्निध्य में देश के विविध शिल्प रूपों से परिचित कराने और प्रशिक्षणार्थियों की सृजनात्मकता को विकसित करने के उद्देश्य से संचालित करो और सीखों शैक्षिणक कार्यक्रम श्रृंखला में दिनांक 10 से 17 मई,2019 के मध्य आयोजित इस कार्यशाला में पंजीकृत प्रतिभागियों को पारम्परिक कलाकारों द्वारा उड़ीसा की सवंरा जनजातीय  चित्रकला पर प्रशिक्षण दिया जायेगा।

क्या है  'सवंरा' चित्रकला: 

सवंरा चित्रकारी ओडिशा राज्य के सवंरा आदिवासियों के द्वारा घरों की दीवारों पर बनाई जाने वाली चित्रकारी को कहा जाता है। यह चित्रकारी, जिसे ईकोन भी कहते हैं, बहुत हद तक उत्तरी सह्याद्री श्रेणी में रहने वाले लोगों के वेरली चित्रकला के समान ही दिखती है। सवंरा चित्रकला सवंरा जनजातियों के लिए धार्मिक महत्त्व भी रखती है। सवंरा जनजाति रामायण में भगवान राम की भक्त शबरी को स्वयं से जोड़ती है।



सवंरा उड़ीसा की एक जनजाति है। पारंपरिक रूप से खेती पर आश्रित यह जनजाति वैसे तो पूरे राज्य में फैली हुई है , लेकिन मुख्य रूप से कोरापुट , रायगाडा , गजपति और गंजम जिलों में केंद्रित है और सांस्कृतिक रूप से अत्यंत विकसित है। सवंरा लोग अपनी दीवारों पर अद्भुत चित्रकारी करते हैं। इस चित्रकला के अंतर्गत प्रत्येक चित्र में एक आयताकार फ्रेम बनाया जाता है जिसके अन्दर विभिन्न देवताओं के प्रतीक-चिन्ह होते हैं अपनी विशेषताओं की वजह से ही इस कला ने आधुनिक कला शास्त्र में भी अपनी जगह बना ली है। इसे सवंरा पेंटिंग के नाम से जाना जाता है। सवंरा जनजाति के लोग अपनी दीवारों पर इस किस्म की जो चित्रकारी करते हैं , उसमें जीवित और निजीर्व दोनों किस्म की वस्तुएं होती हैं। उनमें छत्र , खेती का सामान , पत्ते , फूल ,आदमी , जानवर , पशु-पक्षी , पेड़-पौधे और पहाड़ होते हैं। लेकिन यह रेखांकन ज्यामितीय होता है , जरूरी नहीं कि वह हू-ब-हू किसी का चित्र प्रस्तुत करे। जैसे जरूरी नहीं कि जानवर का चित्र सचमुच किसी जानवर से मिलता-जुलता भी हो। लेकिन इस पूरी पेंटिंग मेंगति , चित्रात्मकता , उसे सुंदर बनाने की कोशिश और प्रकृति से चित्रकार का तादात्म्य नजर आता है।



पारंपरिक रूप से इसमें सिर्फ लाल , सफेद और कभी-कभी काले रंगों का प्रयोग किया जाता है। यह चित्रांकन गांव का पुजारी करता है। सवंरा समुदाय में यह मान्यता है कि सिर्फ वही आत्माओं से तादात्म्य स्थापित कर सकता है। आत्माएं उसे जैसे-जैसे बताती जाती हैं , पुजारी वैसा ही रेखांकन दीवार पर करता जाता है। इसलिए ये चित्र प्रतीकात्मक हो सकते हैं। इन प्रतीकों के रूप में पुरखों की आत्माएं उस घर में प्रवेश करती हैं और उन दीवारों पर बिराजती उस परिवार की देखभाल करती हैं।

यह विश्वास कि उन चित्रों या प्रतीकों के रूप में पुरखों की आत्माएं आकर साथ रहती हैं और परिवार की सुख-समृद्धि सुनिश्चित करती हैं - परिवार में किसी की भी मृत्यु होने पर सवंरा लोग उसके दैनिक इस्तेमाल की चीजें फेकते नहीं , उसे घर में ही कहीं किसी कोने में या आले में रख देते है। मान्यता यह है कि उसकी आत्मा तो रहेगी ही , उसे इनकी जरूरत होगी। चूँकि वे आत्माएं परिवार के ही लोगों की होती हैं , इसलिए वे हमेशा शुभाकांक्षी और कल्याणमयी होती हैं। वे सलाह देती हैं , आशीर्वाद देती हैं और डाँटती भी हैं। वे मार्ग दर्शन करती हैं। फसलों की रक्षा करती हैं, संतान देती हैं। आत्माओं के साथ रहने और उन्हें अपने दैनिक जीवन का साथी बनाने की यह सवंरा परंपरा विलक्षण है।

इस कार्यक्रम हेतु पंजीयन फार्म रू. 10/- भुगतान कर संग्रहालय के प्रवेश द्वार क्र. 01 पर प्रातः 10.30 बजे से दोप. 1.30 बजे प्राप्त किये जा सकते है। कार्यक्रम का पंजीयन शुल्क रू. 250/- (प्रति व्यक्ति) है। इस कार्यक्रम में स्थान सीमित है, और प्रशिक्षार्थियों का चयन पहले ओ, पहले पाओं के आधार पर किया जाएगा। इस कार्यक्रम के बारे में अधिक जानकारी हेतु सुबह 11 बजे से सायं 5 बजे तक दूरभाष क्र. 0755-2526555, 9425080466 में संपर्क कर सकते है।- Window To news