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मानव संग्रहालय में देवी काली का काष्ठ निर्मित गंभिरा मुखौटा ‘‘चामुंडाकाली” है मई-माह का प्रादर्श

08 May 2019

भोपाल 7  मई 2019 - इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय के अंतरंग भवन वीथि संकुल में “माह के प्रादर्श” श्रृंखला के अंतर्गत माह मई 2019 के प्रादर्श के रूप में पश्चिम बंगाल के दिनाजपुर, जलपाईगुड़ी एवं कोच बिहार जिलों में निवासरत पोलिया और देशी समुदाय का देवी काली का काष्ठ निर्मित गंभिरा मुखौटा‘‘चामुंडाकाली का उदघाटन प्रो. के.के. बासा, (पूर्व निदेशक एवं टैगोरे फेलो, मानव संग्रहालय) द्वारा किया गया। इस अवसर पर प्रो. सरित कुमार चौधुरी (निदेशक, इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय  एवं अनेक गणमान नागरिक उपस्थित थे। इस प्रादर्श का संकलन एवं संयोजन डॉ. सोम कीरो (सहायक क्यूरेटर) द्वारा किया गया है।

प्रदर्शनी में प्रदर्शित गंभीरा नाम से प्रचलित लकड़ी से बना तथा मस्तक पर एक बड़ा मुकुट धारण किये यह मुखौटा देवी काली के रूप को दर्शाता है जिसे असुर वध नाटक में उपयोग किया जाता है। इसका मुख भूरे रंग का होता है जिसे पीले बिन्दुओं की मदद से अलंकृत किया जाता है। इसका मुख खुला है तथा मस्तक पर तीसरा नेत्र उनकी भाव - भंगिमाओं का द्योतक है। मुखौटे का पिछला भाग नर्तक द्वारा पहने जाने हेतु खोखला रखा जाता है। गंभीरा भगवान् शिव की आराधना से जुड़ा मुख्य अनुष्ठानिक नृत्य है। इस नृत्य का आयोजन बंगाली मास-चैत्र (मध्य अप्रैल) के अंतिम दिन से असाढ़ कहे जाने वाले अम्बुबाची (मध्य जून) के बीच कभी भी किया जा सकता है।

एक प्रचलित मान्यता के अनुसार इस अनुष्ठानिक नृत्य की प्रस्तुति के माध्यम से वे अच्छा स्वास्थ्य एवं सम्पन्नता प्राप्त करते है। बुरी आत्माओं की बाध्यताओं को रोकने के लिए नृत्य के दौरान कुछ विशेष/ निश्चित अनुष्ठानिक प्रतिबंधों का ध्यान रखना होता है। मेहाना (बिगुल), ढाले (ढोल) एवं गोंग (थाप संगीत यंत्र) को गंभीरा नृत्य में बजाया जाता है।– Window To News