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जानिए कि एक दूसरे के ख़िलाफ़ क्यों खड़े हो रहे हैं मुस्लिम देश?

16 May 2019
शिया-सुन्नी संघर्ष और क्षेत्रीय शक्ति बनने की होड़ में ईरान-सऊदी अरब के बीच बढ़ा ‘तनाव’

MAY 16 (WTN) – ईरान और अमेरिका की बीच जारी तनाव के बारे में तो आप जानते ही होंगे। अमेरिका ने ईरान पर जो नये प्रतिबंध लगाएं है, उसके बाद से पूरी दुनिया में इस बात का डर है कि कहीं दोनों देशों के बीच युद्ध ना छिड़ जाए। अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद जहां एक तरफ़ ईरान ने एक बार फ़िर से अपने परमाणु कार्यक्रम को जारी रखने की धमकी दी है, तो वहीं दूसरी तरफ़ अमेरिका, ईरान को सबक सिखाने के लिए और भी कड़ी आर्थिक कार्रवाई करने के मूड में है।

लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के कारण कई मुस्लिम देश भी एक दूसरे के ख़िलाफ़ होते जा रहे हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सऊदी अरब, यूएई और बहरीन जैसे मुस्लिम देश ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिका का साथ दे रहे हैं, जिसके बाद मध्य पूर्व में तनाव के हालात हैं। जहां एक तरफ़ अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के कुछ जानकार इसे शिया-सुन्नी संघर्ष के रूप में देख रहे हैं, तो कुछ जानकार इसे क्षेत्रीय वर्चस्व की लड़ाई के रूप में देख रहे हैं।

बात करें बड़े मुस्लिम देश सऊदी अरब की, तो वो ईरान के विरूद्ध अमेरिका की आक्रामक कार्रवाई के पक्ष में है। ऐसा इसलिए, क्योंकि सऊदी अरब मध्य-पूर्व में अपने दबदबे के लिए ईरान को एक बड़े ख़तरे की तरह देखता है। ईरान के तेल आयात पर अमेरिका के प्रतिबंध के बाद, सऊदी अरब अब अमेरिका के साथ मिलकर यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहा है कि तेल की वैश्विक आपूर्ति किसी भी तरह से प्रभावित ना हो पाए।

दरअसल, साल 2003 में इराक के तानाशाह सद्दाम हुसैन के सत्ता से बाहर होने के बाद से ही सऊदी अरब और ईरान के बीच क्षेत्रीय वर्चस्व की लड़ाई देखी जा रही है। सऊदी अरब को इस बात की चिंता है कि शिया बाहुल्य ईरान उसके साम्राज्य के शिया समुदाय के बीच अशांति फ़ैलाने की कोशिश कर रहा है। वहीं रियाद का मानना है कि तेहरान का यमन में हूती विद्रोहियों को समर्थन देना उसकी इसी रणनीति का एक हिस्सा है।

जैसा कि हमने आपको पहले बताया कि ईरान के मुद्दे पर मुस्लिम देशों के बीच संघर्ष को कुछ लोग मुस्लिमों के दो समुदायों शिया और सुन्नी के बीच संघर्ष के रूप में देख रहे हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पूरी दुनिया की मुस्लिम आबादी में 85 प्रतिशत सुन्नी हैं। सुन्नी बाहुल्य देशों में सऊदी अरब, मिस्त्र, यमन, पाकिस्तान, इंडोनेशिया, तुर्की, अल्जीरिया और मोरक्को जैसे देश आते हैं। वहीं ईरान और इराक में शिया समुदाय की आबादी ज़्यादा है। यमन, बहरीन, सीरिया, लेबनान और अजरबैजान जैसे देशों में शिया सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय के तौर पर हैं।

जानकारों का मानना है कि मध्य-पूर्व एशिया में संघर्ष की जड़ केवल सुन्नी और शिया संघर्ष ही नहीं है बल्कि आधुनिक राष्ट्रवाद है। धीरे-धीरे शिया और सुन्नी के बीच का संघर्ष ईरान और सऊदी अरब के बीच क्षेत्रीय वर्चस्व के लिए प्रॉक्सी वॉर में बदल चुका है। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के जानकारों के मुताबिक़, ईरान और सऊदी अरब के राष्ट्रवादी नेता धर्म की आड़ में अपने राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। इसी कारण ईरान को नीचा दिखाने के लिए सऊदी अरब खुलकर अमेरिका का साथ दे रहा है।

कुछ जानकारों का मत है कि शिया और सुन्नी संघर्ष से ज़्यादा ईरान और सऊदी अरब के बीच राष्ट्रवादी दुश्मनी ज़्यादा दिखाई देती है। वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ईरान और सऊदी अरब के बीच क्षेत्रीय संघर्ष हमेशा से नहीं रहा है, लेकिन पिछले कुछ सालों में दोनों ही देशों के बीच यह संघर्ष काफ़ी बढ़ा है। इसके आधार पर कुछ जानकारों का कहना है कि मुस्लिमों के शिया और सुन्नी समुदाय कोई धार्मिक युद्ध नहीं लड़ रहे हैं बल्कि यह दो देशों के बीच का संघर्ष है।

अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के जानकारों के मुताबिक़, शिया और सुन्नी संघर्ष 632 ईस्वी से ही शुरू हो गया था। शिया-सुन्नी संघर्ष तभी से जारी है, और इसी संघर्ष के कारण ईरान और सऊदी अरब एक दूसरे के ख़िलाफ़ हैं। तभी 1500 साल पुराने धार्मिक संघर्ष के लिए अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा को ज़िम्मेदार ठहराना कहीं से भी तर्क संगत नहीं है। खैर ईरान और सऊदी अऱब के बीच जारी संघर्ष के जो भी कारण हों, लेकिन इतना तो तय है कि इन समय दोनों ही देश मध्य-पूर्व की क्षेत्रीय शक्ति बनने की कोशिश कर रहे हैं।