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​धीरे-धीरे सीपीईसी से ‘नाउम्मीद’ होता पाकिस्तान!

27 May 2019
सीपीईसी से आर्थिक सुधार का पाकिस्तान का सपना हुआ ‘धूमिल’!
 
MAY 27 (WTN) – बर्बाद होती अर्थव्यवस्था की कगार पर पहुंच चुके पाकिस्तान के लिए अब सीपीईसी यानी कि चीन-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर एक सफेद हाथी साबित हो रहा है। हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि चीन द्वारा इसमें अरबों डॉलर खर्च करने के बाद भी पाकिस्तान की हालत जस की तस रहने वाली है और पाकिस्तान की खराब आर्थिक हालत में सुधार नहीं होने वाला है।

जब साल 2015 में सीपीईसी की घोषणा हुई थी तो पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ ने इसे पाकिस्तान के लिए एक गेमचेंजर बताया था। तब पाकिस्तान को आशा थी कि चीन के सहयोग की इस परियोजना से पाकिस्तान के बुरे दिन गुजर जाएंगे और पाकिस्तान में समृद्दि आएगी। लेकिन इस परियोजना को शुरू हुए चार साल हो गये हैं, लेकिन जो आशाएं पाकिस्तान ने इस परियोजना से बांध रखी थीं वे पूरी होती नज़र नहीं आ रही हैं।

जानकारी के मुताबिक़, पाकिस्तान पर भारी-भरकम कर्ज़, घरेलू राजस्व की कमी, भुगतान संकट, डॉलर के मुक़ाबले गिरते रुपये और अलगाववादियों के कारण पाकिस्तान में सीपीईसी से बंधी आशाएं धीरे-धीरे धूमिल होती जा रही हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सीपीईसी परियोजना 2015 से 2030 यानी कि 15 साल के बनाई गई थी। इस परियोजना में मूलभूत ढांचा और बिजली से जुड़ी कई छोटी-बड़ी योजनाएं शामिल हैं। सीपीईसी की 22 परियोजनाओं पर साल 2018 तक 18 अरब डॉलर खर्च हो चुके हैं। सीपीईसी की इन 22 परियोजनाओं में से 10 परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं।

इन 10 परियोजनाओं में सात बिजली की और 3 सड़क निर्माण से जुड़ी योजनाएं हैं। वैसे तो इन पूरी हो चुकी इन सात बिजली परियोजना से पाकिस्तान की बिजली उत्पादन की क्षमता में क़रीब 4000 मेगावाट की वृद्धि हुई है। पर इस सबका कोई भी फ़ायदा पाकिस्तान को मिलता नहीं दिख रहा है। ऐसा इसलिए, क्योंकि पाकिस्तान की ट्रांसमिशन लाइन्स की क्षमता 3000 मेगावाट कम है। जानकारी के मुताबिक़, चीनी परियोजनाओं से पैदा हुई बिजली बहुत महंगी भी है। बिजली महंगी होने के मुख्य कारणों में चीन का भारी भरकम कर्ज़, ट्रांसमिशन और बिजली चोरी है। वहीं इन परियोजनाओं में काम कर रहे चीनी नागरिकों की सुरक्षा में पाकिस्तान को काफ़ी खर्चा करना पड़ रहा है, जिसके कारण भी इन परियोजनाओं से बनने वाली बिजली काफ़ी महंगी है।

बिजली परियोजनाओं से अलग बात करें महत्वपूर्ण ग्वादर बंदरगाह की, तो सीपीईसी परियोजना के तहत ग्वादर बंदरगाह का काफ़ी महत्व है। नवम्बर 2016 में इस बंदरगाह का उदघाटन  किया गया था, लेकिन जानकारी के मुताबिक़ अभी तक इससे भी बहुत ज़्यादा राजस्व हासिल नहीं हो सका है। ग्वादर बंदरगाह से हो रहे नुकसान की कई वजहें हैं। पहला वजह यह है कि इस क्षेत्र में कई दूसरे बंदरगाह हैं, दूसरी वजह है कि ग्वादर बंदरगाह पर अभी औद्योगिक ढांचे की कमी है जिसके कारण यहां पर व्यापार कम हो रहा है। वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दें कि चीन और पाकिस्तान के बीच सीपीईसी में हुए समझौते के मुताबिक़, ग्वादर बंदरगाह से हासिल होने वाले कुल राजस्व का 91 प्रतिशत आने वाले 40 सालों तक चीन को दिया जाएगा।

पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ी परेशानी का कारण ग्वादर बंदरगाह से चीन के तियानजिन तक तेल और गैस के परिवहन के लिए बनाई गई 7000 किलोमीटर लम्बी पाइपलाइन है। जानकारों के अनुसार इतनी लम्बी पाइपलाइन आर्थिक दृष्टिकोण से काफ़ी अव्यावहारिक है। 7000 किलोमीटर लम्बी इस पाइपलाइन से प्रति बैरल तेल ढुलाई की क़ीमत 10 डॉलर होगी जो कि बहुत ज़्यादा कही जा रही है।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि यह पाइप लाइन बलूचिस्तान और चुनौतीपूर्ण भौगोलिक क्षेत्र से होकर गुजरेगी। जैसा कि आप जानते हैं कि पाकिस्तान सरकार की नज़रअंदाज़ी और पाकिस्तान की सेना के अत्याचारों के ख़िलाफ़ बलुचिस्तान में अलगाववादी आंदोलन चलते रहते हैं। ऐसे में इस इलाके में इतनी लम्बी पाइपलाइन की सुरक्षा अपने आप में काफ़ी ज़िम्मेदारी का काम है।

इस पाइपलाइन के लिए भौगोलिक चुनौती की बात करें तो इस पाइपलाइन से तेल और गैस को ग्वादर के समुद्री स्तर से खुंजेरब पास पर क़रीब 15,400 फीट की ऊंचाई से होकर ले जाना होगा। साफ़ जाहिर है कि इस तरह की पाइपलाइन बनाने के निर्माण में काफ़ी चुनौतियां हैं, और एक बार पाइपलाइन बनने के बाद इसके रखरखाव पर भी काफ़ी रक़म ख़र्च होगी। जाहिर है कि इस पाइपलाइन से लागत ज़्यादा आने के कारण इससे कम ही राजस्व की प्राप्ति होगी।

जोश जोश में तो पाकिस्तान ने चीन की सीपीईसी परियोजना के लिए हामी भर दी थी, लेकिन वास्तव में पाकिस्तान के लिए यह परियोजना सिरदर्द पैदा करने वाली है। लगता नहीं है कि इन परियोजना से मिलने वाले राजस्व से पाकिस्तान, चीन का कर्ज़ चुका पाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक पाकिस्तान अपनी अर्थव्यस्था को स्थिर नहीं कर लेता है और विदेश निवेश को आकर्षित करने में सफल नहीं होता है, तब तक सीपीईसी से पाकिस्तान की आर्थिक हालत सुधर जाएगी ऐसा सोचना बेमानी है।