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​मोदी सरकार के ‘इस’ फ़ैसले से ‘खुश’ हो सकते हैं स्कूली बच्चों के माता-पिता!

01 Jun 2019
नई शिक्षा नीति हो सकती है लागू, शिक्षा के ‘भगवाकरण’ का विपक्ष लगा सकता है आरोप!
 
JUNE 01 (WTN) – लोकसभा चुनाव में प्रचण्ड जीत के बाद मोदी सरकार के सामने अपने दूसरे कार्यकाल में कई चुनौतियां हैं। बेरोजगारी, कृषि, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर प्रधानमंत्री मोदी को अपने दूसरे कार्यकाल में काफ़ी ध्यान देने की ज़रूरत है, क्योंकि अपने पहले कार्यकाल में प्रधानमंत्री मोदी को इन मुद्दों पर काफ़ी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था। चर्चा करें शिक्षा की तो मोदी सरकार जल्द ही नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू कर सकती है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लिए गठित की गई विशेषज्ञ समिति की कुछ सिफारिशें देश की आम जनता को काफ़ी राहत दे सकती है और इसका पूरा श्रेय मोदी सरकार को मिल सकता है।
 
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय को नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लिए गठित विशेषज्ञ समिति ने अपनी सिफारिशों को ड्राफ्ट सौंप दिया है। मौजूदा शिक्षा नीति साल 1986 में तैयार हुई थी और 1992 में इसमें संशोधन किया गया था। 2014 के लोकसभा चुनाव के पहले भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में नई शिक्षा नीति की घोषणा की थी, जिसके बाद नई शिक्षा नीति के लिए सुझाव देने के लिए एक समिति का गठन किया गया था। मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री और हरिद्वार से लोकसभा के सांसद डॉ रमेश पोखरियाल निशंक को मानव संसाधन विकास मंत्री बनाया गया है। नई शिक्षा नीति के लिए गठित कमेटी ने सिफारिशों का ड्राफ्ट नये मानव संसाधन विकास मंत्री को सौंप दिया है।
 
दरअसल, नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लिए गठित कमेटी ने सिफारिश की है निजी स्कूलों को अपनी फीस तय करने के लिए आज़ादी दी जाए, लेकिन निजी स्कूल फीस में मनमाने तरीक़े से वृद्धि नहीं कर सकते हैं। यानी कि साफ़ जाहिर है कि नई शिक्षा नीति लागू होती है तो निजी स्कूलों को फीस तय करने की आज़ादी होगी, लेकिन वे इसमें मनमाने तरीक़े से वृद्धि नहीं कर पाएंगे। देखा गया है कि एक तरफ़ तो निजी स्कूलों की फीस काफ़ी ज़्यादा होती है, वहीं समय-समय पर निजी स्कूल फीस में मनमाने तरीक़े से इज़ाफा कर देते हैं। निजी स्कूलों की ज़्यादा फ़ीस के कारण बच्चों के पालकों पर आर्थिक रूप से काफ़ी बोझ पड़ता है।
 
नई शिक्षा नीति की सिफारिशों पर आम जनता का कहना है कि निजी स्कूलों द्वारा फीस वृद्धि में जो मनमानी की जाती है उस पर लगाम लगाना ज़रूरी है, और यदि मोदी सरकार ऐसा कोई क़ानून बना रही है तो यह आम भारतीयों के लिए काफ़ी राहत भरी ख़बर है। यह बात सही है कि भारतीय माता-पिता को अपने बच्चों की पढ़ाई पर काफ़ी पैसा ख़र्च करना पड़ता है। एक रिसर्च के मुताबिक़ भारत में एक औसत दो बच्चों के परिवार में मासिक कमाई का काफ़ी पैसा स्कूल की फीस और स्कूल सम्बन्धित अन्य गतिविधियों में खर्च हो जाता है।
 
वहीं कमेटी ने एक अन्य सिफारिश की है जिसका विरोध विपक्ष कर सकता है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लिए गठित विशेषज्ञ समिति ने स्कूलों के सिलेबस में भारतीय शिक्षा प्रणाली को शामिल करने की सिफारिशें की है। पॉलिसी के ड्राफ्ट में कहा गया है कि ज्ञान में भारतीय योगदान और ऐतिहासिक संदर्भ को जहां भी प्रासंगिक होगा, मौजूदा स्कूली सिलेबस और टेक्स्ट-बुक्स में शामिल किया जाएगा। डॉफ्ट में कहा गया है कि गणित, एस्ट्रोनॉमी, फिलॉसफी, मनोविज्ञान, योग, आर्किटेक्चर, औषधि के साथ ही शासन, शासन विधि और समाज में भारत के योगदान को शामिल किया जाए।
 
कहा जा रहा है कि कमेटी के इस सुझाव का विरोध विपक्ष इस आधार पर कर सकता है कि नई शिक्षा नीति के बहाने मोदी सरकार शिक्षा का भगवाकरण करने की कोशिश कर रही है। दरअसल, शुरू से ही विपक्षी पार्टियां अपनी इस बात का विरोध करती आई हैं कि स्कूली सिलेबस में प्राचीन भारतीय संस्कृति और भारत के विभिन्न क्षेत्रों में उस योगदान को ना पढ़ाया जाए जो कि हिन्दू संस्कृति से सम्बन्ध है। ऐसा इसलिए, क्योंकि विपक्षी पार्टियों को लगता है कि प्राचीन भारतीय संस्कृति के योगदान को बच्चों को पढ़ाये जाने से शिक्षा का भगवाकरण होगा। लेकिन देश की विपक्षी पार्टियों को शायद इतना नहीं पता कि भारतीय प्राचीन शिक्षा का विज्ञान से लेकर स्वास्थ्य तक के हर क्षेत्र में कितना बड़ा योगदान है।
 
अब देखना होगा कि नई शिक्षा नीति की कितनी सिफारिशों को मोदी सरकार मानती हैं और उन पर अमल करती है। यदि निजी स्कूलों की बेतहाशा फीस वृद्धि पर लगाम लगाने में मोदी सरकार सफल रहती है तो देश की आम जनता को इससे काफ़ी राहत मिलेगी। लेकिन वहीं यदि ज्ञान में भारतीय योगदान को स्कूली सिलेबस में शामिल किया गया तो हो सकता है कि विपक्षी पार्टियां इसका भगवाकरण के नाम पर जमकर विरोध करें।