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​अपनी ‘इस’ ताक़त के दम पर अमेरिका से लोहा लेता है ईरान!

10 Jul 2019
जानिए आख़िर क्यों अमेरिका से नहीं डरता है ईरान?
 
JULY 10 (WTN) - जैसा कि आप जानते हैं कि इन दिनों ईरान और अमेरिका के बीच चले रहे तनाव के कारण पूरी दुनिया चिंता में है। यह पहली बार नहीं है जब ईरान और अमेरिका एक दूसरे के आमने-सामने आए हों। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इन दोनों ही देशों के बीच सालों से तनातनी चल रही है। जैसा कि आप जानते हैं कि अमेरिका को दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य ताक़त माना जाता है, तो ऐसे में सवाल उठता है कि आख़िर ईरान जैसे छोटे से देश के पास इतनी हिम्मत कहां से आ जाती है कि वो अमेरिकी जैसी विश्वशक्ति से युद्ध के लिए भी तैयार रहता है। यहां तक कि कई बार युद्ध के हालात होने पर भी ईरान किसी भी तरह के समझौते के लिए कभी राज़ी नहीं दिखता है।

वैसे ईरान उतना शक्तिशाली देश नहीं है कि वो सीधे तौर पर अमेरिका से पंगा से सके। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि शिया बहुल आबादी वाला ईरान खुद चारों तरफ़ से घिरा हुआ है। ईरान के एक तरफ़ उसका कट्टर दुश्मन इज़राइल है तो वही एक तरफ़ सुन्नी बहुल आबादी वाला सऊदी अरब है।

युद्ध की स्थिति में यह दोनों ही देश ईरान को सबक सिखाने के लिए अमेरिका के साथ खड़े हो सकते हैं। वहीं ईरान और अमेरिका के बीच हथियारों की भी कोई तुलना नहीं है। अमेरिका के पास जहां दुनिया के सबसे अत्याधुनिक हथियार हैं तो वहीं ईरान के पास खुद के हथियार ही ज़्यादा हैं, क्योंकि प्रतिबंध के कारण ईरान के पास बाहरी तकनीक वाले हथियार कम ही हैं।

दरअसल, ईरान के पास अमेरिका से लड़ने के लिए है सबसे बड़ा हथियार है वहां के लोगों की इच्छा शक्ति और ईरान की युद्ध रणनीति। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ईरान की कुल जनसंख्या 8 करोड़ से ज़्यादा है। वहीं ईरान की सैन्य क्षमता 5 लाख 34 हज़ार है। इतनी बड़ी सैन्य क्षमता के साथ ईरान की अंदरूनी ताक़त इतनी है कि वो अमेरिका से लम्बा युद्ध लड़ सकता है। दुनिया के 136 देशों की सेना की लिस्ट में ईरान की सेना 13वें नम्बर पर आती है। हालांकि, हथियारों के मामलों में ईरान अभी भी अमेरिका से काफ़ी पीछे है।
 
कहा जाता है कि युद्ध रणनीतियों से जीते जाते हैं। ईरान की सबसे बड़ी ताक़त उसकी फॉरवर्ड डिफेंस नीति है। इस डिफेंस का नेतृत्व ईरान का कुद्स बल करता है, जबकि उसके साथ उसके क्षेत्रीय सहयोगी भी मदद करते हैं। फॉरवर्ड डिफेंस नीति के तहत ईरान अपने दुश्मनों को उसकी ज़मीन के बाहर ही रोकने और कमज़ोर करने का काम करता है। जैसा कि हमने आपको बताया कि इज़रायल और सऊदी अरब, ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिका के सहयोगी हैं। तो उसी तरह से अमेरिका के ख़िलाफ़ ईरान के सहयोगियों में सीरिया, लेबनान के हिज़बुल्ला जैसे शिया समूह, यमन के हौती विद्रोही और फिलिस्तीन के इस्लामी जिहादी शामिल हैं।

जानकारी के मुताबिक़, ईरान के पास कम, मध्यम और अच्छी रेंज तक हमला करने वाली बैलेस्टिक मिसाइलें भी हैं, जिनके ज़रिए ईरान, इज़राइल, खाड़ी के अरब देश और मध्य-पूर्व में अमेरिकी सेना के ठिकानों समेत यूरोप के कुछ हिस्सों तक हमला कर सकता है। वहीं ईरान की परमाणु क्षमता के बारे में पूरी दुनिया को संदेह है कि ईरान परमाणु क्षमता विकसित कर रहा है, या कर चुका है। अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति के जानकारों के मुताबिक़, अमेरिका से युद्ध की स्थिति में ईरान अपने फॉरवर्ड डिफेंस के साथ-साथ बैलेस्टिक मिसाइलों की नीति को शामिल कर सकता है।

लेकिन ईरान के पास सबसे बड़ा रणनीतिक हथियार है उसके पास तेल का विशाल भण्डार और आसपास के तेल के भण्डारों पर नियंत्रण। कहा जाता है कि यदि अमेरिका से युद्ध होता है तो इन परिस्थितियों में ईरान तेल सप्लाई रोककर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को पटरी से उतार सकता है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि दुनिया में तेल के कुल प्रवाह का पांचवा हिस्सा फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच होरमुज़ के रास्ते से होकर जाता है। आशंका है कि युद्ध के हालात में ईरान इसी रास्ते को चोक कर सकता है, जिससे पूरी दुनिया को तेल की आपूर्ति बाधित हो सकती है।

यानी कि साफ़ है कि अपनी सैन्य क्षमता के साथ-साथ ईरान के पास पूरी दुनिया की तेल आपूर्ति रोकने की जो क्षमता है, उसी के कारण ईरान, अमेरिका से लोहा लेता रहता है। अमेरिका की सैन्य क्षमता के आगे ईरान की सैन्य क्षमता काफ़ी कमज़ोर है, लेकिन जिस भौगोलिक स्थिति में ईरान स्थित है, उसी का फ़ायदा ईरान उठाता है और अमेरिका को आंखे दिखाता रहता है।