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जानिए आख़िर क्यों कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान को बयानों से ख़ुश कर रहा अमेरिका?

21 Aug 2019
कश्मीर पर बयानों के बहाने अफगानिस्तान में अपने ‘हित’ साध रहा अमेरिका!

AUG 21 (WTN) – 'पूंजीवादी मानसिकता' वाला देश अमेरिका हमेशा से ही अपने हितों को सर्वोपरि रखता है। अपने हितों को पूरा करने के लिए अमेरिका हर वो क़दम उठाता है और उठा रहा है, जो उसे 'सही' लगता है। अमेरिका के हितों को पूरा करने के लिए ऐसा ही कुछ इन दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प कर रहे हैं। कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने से पहले और उसके बाद तक क़रीब 30 दिनों में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने कश्मीर पर जो बयान दिये हैं, उससे साफ़ जाहिर होता है कि अमेरिकी की नीति कश्मीर मामले में 'एकसमान' नहीं है और वो पाकिस्तान को 'ख़ुश' करने की कोशिश में है।

पिछले कुछ दिनों में कश्मीर मुद्दे पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के अलग-अलग मत सुनने और पढ़ने को मिल रहे हैं। आख़िर क्या कारण है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प कश्मीर मुद्दे पर ख़ुद को तटस्थ दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन वे पाकिस्तान को 'नाराज़' भी नहीं करना चाहता है। आइये आपको इस बारे में विस्तार से बताते हैं।

जैसा कि आप जानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र की कश्मीर पर 'राष्ट्रवादी नीति' के बाद से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान, अमेरिका से इस मामले में 'हस्तेक्षप' करने की गुज़ारिश कर रहे हैं। लेकिन अमेरिका जानता है कि भारत को कश्मीर मुद्दे पर किसी तीसरे देश या वैश्विक मंच का हस्तक्षेप कतई मंज़ूर नहीं है। कुछ दिनों पहले अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का नाम लेकर झूठ बोल चुके हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के अमेरिकी दौरे के समय ट्रम्प ने यह 'दावा' किया था कि भारतीय प्रधानमंत्री मोदी ने उनसे कश्मीर पर मध्यस्थता के लिए कहा था।

ट्रम्प के इस बयान के बाद भारत की तरफ़ से 'कड़ी प्रतिक्रिया' ज़ाहिर की गई थी, और ट्रम्प के दावे को पूरी तरह से 'ख़ारिज' कर दिया था। लेकिन एक बार फ़िर से डोनाल्ड ट्रम्प ने कश्मीर मुद्दे पर मध्यस्थता की पेशकश करके सवाल खड़ा कर दिया है कि आख़िर अमेरिका की मंशा क्या है? मंगलवार को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने कश्मीर के हालात को 'विस्फोटक' करार देते हुए कहा कि ये बहुत ही 'जटिल जगह' है। ट्रम्प ने कश्मीर को धर्म के लिहाज़ से देखते हुए कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव की एक 'अहम वजह' धर्म भी है।
 
कश्मीर मुद्दे पर ट्रम्प ने कहा, “कश्मीर एक बेहद ही जटिल जगह है। यहां हिंदू और मुस्लिम दोनों हैं और मुझे नहीं लगता है कि दोनों अच्छी तरह से साथ रह पाए हैं। मैं कश्मीर मामले में मध्यस्थता करने की पूरी 'कोशिश' करूंगा। दोनों देशों के साथ हमारे अच्छे रिश्ते हैं, लेकिन दोनों देश इस वक़्त आपस में दोस्त नहीं हैं। हालात 'जटिल' हैं और इसमें धर्म की अहम भूमिका है।”

जैसा कि आप जानते हैं कि जम्मू और कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद से ही पाकिस्तान हर वैश्विक मंच से कश्मीर मुद्दे को उठाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन मोदी सरकार की 'सफ़ल कूटनीति' के कारण पाकिस्तान अपने मंसूबों में सफ़ल नहीं हो पा रहा है, क्योंकि चीन को छोड़कर उसे दुनिया के किसी भी ताक़तवर देश का साथ नहीं मिल रहा है। वैसे अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति के जानकारों के मुताबिक़, चीन भी पाकिस्तान में अपने हितों की रक्षा की लिए ही पाकिस्तान का इस मुद्दे पर साथ दे रहा है।

बात करे अमेरिकी की तो कश्मीर मुद्दे पर अमेरिका 'आधिकारिक' तौर पर किसी भी वैश्विक मंच में पाकिस्तान के साथ नहीं खड़ा है, लेकिन अमेरिका के अपने कुछ हित हैं और इन हितों की पूर्ति के लिए समय-समय पर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प, पाकिस्तान को खुश करने के 'अनौपचारिक' तौर पर ऐसे बयान देते रहते हैं, जिससे पाकिस्तान को लगे कि अमेरिकी कश्मीर मामले में मध्यस्थता का 'इच्छुक' है।
 
हालांकि, कुछ समय पहले अमेरिका साफ़ कर चुका है कि कश्मीर मुद्दे पर उसका वहीं रूख़ है, जोकि पहले था। यानी कि कश्मीर मुद्दे को भारत और पाकिस्तान दोनों देशों को मिलकर सुलझाना चाहिए। लेकिन कश्मीर मुद्दे पर मध्यस्थता के बयान देकर ट्रम्प बार-बार पाकिस्तान को इसलिए खुश कर रहे है, क्योंकि अमेरिका को अफगानिस्तान में अपने हितों की पूर्ति करना है। दरअसल, अमेरिका सालों से अफगानिस्तान में मौजूद अमेरिकी सेना की 'वापसी' चाहता है, और यह तभी सम्भव है जब अफगानिस्तान में तालिबान के साथ शान्ति समझौता हो सके।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि तालिबान के साथ चल रही शान्तिवार्ता को सफ़ल करने के लिए अमेरिका, पाकिस्तान की मदद चाहता है। ऐसा इसलिए, क्योंकि अफगानिस्तान को 'अस्थिर' करने के लिए पाकिस्तान सालों से तालिबान को पैसा और हथियार मुहैया कराता रहा है। अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति के जानकारों के मुताबिक़, अमेरिका का मानना है कि भारत-पाक के बीच कश्मीर विवाद के कारण ही अफगानिस्तान में तालिबान के साथ शान्ति समझौता नहीं हो पा रहा है। दरअसल, पाकिस्तान की सेना का यह विचार है कि अफगानिस्तान में भारत के प्रभाव को रोकने के लिए वहां पर अस्थिरता होता काफ़ी ज़रूरी है, इसलिए पाकिस्तान तालिबान को समर्थन दे रहा है।

कहा जा रहा है कि यदि भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव ख़त्म हो गया, तो अफगानिस्तान में गृहयुद्ध समाप्त हो सकता है। यदि ऐसा होता है तो तालिबान और अन्य आतंकवादी समूहों को मिलने वाली पाकिस्तानी मदद को रोका जा सकता है। इधर, कश्मीर मुद्दे पर भारत चाहता है कि पहले पाकिस्तान आतंकवाद को ख़त्म करे और फ़िर बातचीत करे, लेकिन पाकिस्तान एक तो आतंकवाद बंद नहीं कर रहा है और कश्मीर मुद्दे पर किसी तीसरे देश की मध्यस्थता चाहता है। ऐसे में कश्मीर मुद्दे पर भारत और पाकिस्तान के बीच 'तनाव' जारी है।

अमेरिका जानता है कि अफगानिस्तान में उसकी सेना की वापसी के लिए पाकिस्तान की मदद बहुत ज़रुरी है। ऐसे में अमेरिका किसी भी क़ीमत पर पाकिस्तान को नाराज़ नहीं करना चाहता है, इसलिए अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प समय-समय पर कश्मीर मुद्दे पर 'मध्यस्थता' की बात करते रहते हैं ताकि पाकिस्तान को खुश किया जा सके। लेकिन जैसा कि हमने आपको पहले बताया कि कश्मीर मुद्दे पर भारत का रूख़ साफ़ है कि उसे इस मामले में किसी तीसरे देश की मध्यस्थता कतई मंज़ूर नहीं है, ऐसे में देखना होगा कि कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान को ख़ुश करने के लिए अमेरिका और क्या कर सकता है? लेकिन इतना तय है कि पाकिस्तान को ख़ुश करने की कोशिश में अमेरिका, भारत को नाराज़ करने की 'भूल' कभी नहीं करेगा।