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जानिए इन संकेतों से क्या सच में देश में आ गई है आर्थिक मंदी?

31 Aug 2019
अर्थव्यवस्था ख़ुद दे देती है आर्थिक मंदी के संकेत!
 
AUG 31 (WTN) – भारत समेत पूरी दुनिया में आर्थिक मंदी की चर्चाएं ज़ोरों पर हैं। अर्थव्यवस्था के जानकारों के अनुसार, अमेरिका और चीन के बीच जारी ट्रेड वार वैश्विक आर्थिक मंदी के प्रमुख कारणों में से एक है। पुरुषों के अडंरगामेण्ट इंडेक्स से लेकर लिपस्टिक इंडेक्स यह सूचित कर रहे हैं कि भारत समेत पूरी दुनिया में मंदी ने दस्तक दे दी है। लेकिन आप सोच रहे होंगे कि आख़िर आर्थिक मंदी के संकेत क्या होते हैं? कैसे ज्ञात होता है कि आर्थिक मंदी चल रही है? आपकी इन सभी जिज्ञासाओं को हम शान्त करने की आज कोशिश करते हैं।

सबसे पहले आपकी जानकारी के लिए बता दें कि यह पहली बार नहीं हो रहा है कि पूरी दुनिया आर्थिक मंदी का सामना करना रही है, इससे पहले साल 2007-2009 में भी पूरी दुनिया ने आर्थिक मंदी का सामना किया था। साल 2007-2009 की आर्थिक मंदी, साल 1930 की मंदी के बाद का सबसे बड़ा आर्थिक संकट था।
 
यदि किसी देश की अर्थव्यवस्था की विकास दर हर तिमाही में लगातार घट रही है, तो इसे आर्थिक मंदी का एक बड़ा संकेत माना जाता है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि किसी देश की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर को विकास दर कहा जाता है। किसी देश की विकास दर से मतलब उस देश की अर्थव्यवस्था या सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) बढ़ने की रफ़्तार से है। यदि विकास दर या फ़िर कहें जीडीपी घटेगी, तो स्वाभाविक है कि यह इस संकेत है कि उस देश में एक निर्धारित अवधि में बने सभी उत्पादों और सेवाओं का मूल्य कम हो रहा है।

जब भी आर्थिक मंदी आती है, तो लोग कम ख़पत करने लगते हैं। यानी कि लोग बेहद ज़रूरी सामान और सेवाओं पर ही पैसा ख़र्च करते हैं। मंदी के दौरान घरों और गाड़ियों की बिक्री पर सबसे ज़्यादा नकारात्मक असर पड़ता है। मंदी के कारण आमदनी सीमित होने के कारण लोग सिर्फ़ ज़रूरी वस्तुओं और सेवाओं पर ही ख़र्च करते हैं, ऐसे में घरों और गाड़ियों की बिक्री में काफ़ी कमी देखी जाती है।

साफ़ है कि आमदनी कम होने पर व्यक्ति गाड़ियों पर पैसा ख़र्च नहीं करेगा। जब उसके पास अतिरिक्त पैसा होगा, तभी वो ज़रूरतों को पूरा करने के बाद गाड़ी ख़रीदने के लिए पैसा ख़र्च करेगा। भारत में काफ़ी लम्बे समय से ऑटो सेक्टर में मंदी देखी जा रही है, जो साफ़ तौर पर आर्थिक मंदी का संकेत है।

जैसा कि हमने आपको बताया कि मंदी के समय लोग सिर्फ़ ज़रूरत के सामान पर ही पैसा ख़र्च करते हैं। ऐसे में औद्योगिक उत्पादन पर काफ़ी प्रभाव पड़ता है। मंदी के कारण मांग कम होने से उत्पादन कम होने लगता है, जिसके कारण मिल्स और फैक्टियां बंद होने लगती हैं। औद्योगिक उत्पादन कम होने से उससे जुड़े कारोबार और सेवाएं भी प्रभावित होती हैं।

आर्थिक मंदी के कारण ना केवल रोज़गार वाले बेरोज़गार होते हैं बल्कि इससे रोज़गार के अवसर भी कम होते हैं। वस्तुओं की डिमाण्ड कम होने से औद्योगिक उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जिसके कारण मिल्स और फैक्ट्रियां में या तो उत्पादन कम होने लगता है या वे बंद होने लगती हैं। इस परिस्थिति में या तो कर्मचारियों की छंटनी होती है, या फ़िर कर्मचारियों की नौकरी चली जाती है। औद्योगिक उत्पादन पर नकारात्मक असर पड़ने से उससे जुड़े कारोबार और सेवा क्षेत्र में भी बेरोज़गारी के हालत बने रहते हैं।

मंदी के समय देखा गया है कि बचत और निवेश में भी कमी आती है। स्वाभाविक है कि मंदी के कारण जब आमदनी कम होगी तो व्यक्ति अपनी ज़रूरतों को पहले पूरा करेगा, उसके बाद ही वो बचत या निवेश के बारे में कोई फ़ैसला लेगा। बचत और निवेश में होने वाली कमी से स्पष्ट संकेत मिलता है कि मंदी का दौर जारी है।
 
वहीं मंदी के समय क़र्ज़ की मांग भी कम होने लगती है। ज़ाहिर है कि मंदी के समय जब लोगों के पास कम पैसा आएगा, तो ज़रूरत के काम करने के बाद उनकी बचत भी कम ही होगी। ऐसे में बैंक या निवेश के अन्य साधनों में लोगों द्वारा कम पैसा निवेश किया जाता है। जब लोग बैंकों या वित्तीय संस्थानों में निवेश नहीं करेंगे, तो उनके पास क़र्ज़ देने के लिए पैसा घट जाएगा। किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को मज़बूती देने के लिए क़र्ज़ की मांग और आपूर्ति होना ज़रूरी है। इसलिए क़र्ज़ की मांग और आपूर्ति में गिरावट को मंदी का एक बड़ा संकेत माना जाता है।

शेयर मार्केट में गिरावट भी आर्थिक मंदी के बड़े संकतों में से एक है। जैसा कि आप जानते हैं कि शेयर मार्केट में उन्हीं कम्पनियों के शेयर बढ़ते हैं, जिनकी कमाई और मुनाफा बढ़ रहा होता है। यदि कम्पनियों की कमाई के अनुमान लगातार कम हो रहे हैं और वे उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पा रही हैं, ऐसे में शेयर मार्केट में उनके शेयर के दाम गिरेंगे। कम्पनियों के शेयर के दाम गिरने से शेयर मार्केट में गिरावट आएगी, जिसे आर्थिक मंदी के रूप में ही देखा जाता है।

यदि शेयर मार्केट में निवेश कम हो रहा है तो उसे भी मंदी का संकेत माना जाता है। ऐसा इसलिए, क्योंकि मंदी के समय लोगों के पास अतिरिक्त पैसा नहीं रहता है, जिसे वे शेयर मार्केट में निवेश कर सकें। निवेश कम होने से शेयर मार्केट में शेयर्स के दाम गिर जाते हैं। यानी कि शेयर मार्केट में कम निवेश आर्थिक मंदी का स्पष्ट संकेत देता है।

ऑटो सेक्टर में सेल्स की गिरावट से लेकर शेयर मार्केट में कम निवेश होना, ये वे संकेत हैं जो साफ़ बता रहे हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में आ गई है। मंदी की आशंका के चलते मोदी सरकार अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए ज़रूर उपाय करते नज़र आ रही है। अब देखना होगा कि वैश्विक आर्थिक मंदी कितना नकारात्मक असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर छोड़कर जाती है, और मोदी सरकार इससे निपटने में सक्षम साबित हो पाती है कि नहीं?