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वैश्विक आर्थिक मंदी से धीमी पड़ी देश की विकास की रफ़्तार

03 Sep 2019
अहम उद्योगों की वृद्धि दर में भारी गिरावट से चरमराई देश की अर्थव्यवस्था

SEP 03 (WTN) – वैश्विक आर्थिक मंदी का असर भारत में भी दिखना शुरू हो गया है, जिसके कारण अहम उद्योगों की वृद्धि दर में भारी गिरावट दर्ज की गई है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि देश के आठ बुनियादी उद्योगों की वृद्धि दर जुलाई में घटकर सिर्फ़ 2.1 प्रतिशत रह गई है। सरकार से मिले आंकड़ों के मुताबिक़, कोयला, कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस और रिफाइनरी उत्पादों की वृद्धि दर जुलाई में नेगेटिव रही है। वहीं अप्रैल-जुलाई की समयावधि में आठों अहम उद्योग की वृद्धि दर सिर्फ़ 3 प्रतिशत ही रही है, जो कि पिछले साल की समान अवधि में 5.9 प्रतिशत की दर से आगे बढ़ी थी।

वैश्विक आर्थिक मंदी के कारण इस्पात क्षेत्र की वृद्धि दर घटकर 6.6 प्रतिशत रह गई है, जो कि जुलाई 2018 में 6.9 प्रतिशत थी। वहीं सीमेंट क्षेत्र की वृद्धि दर 11.2 प्रतिशत से घटकर 7.9 प्रतिशत रह गई है। बात करें बिजली क्षेत्र की तो यहां पर वृद्धि दर जुलाई में 4.2 प्रतिशत ही रही, जबकि पिछले साल जुलाई में यह 6.7 प्रतिशत थी। राहत की ख़बर उर्वरक उत्पादन में मिली है। इस साल जुलाई में उर्वरक उत्पादन की वृद्धि दर 8.2 प्रतिशत रही, जबकि पिछले साल इसी महीने में उर्वरक उत्पादन की वृद्धि दर 6.7 प्रतिशत थी।

बात करें बुनियादी उद्योगों की, तो चालू वित्त वर्ष में अप्रैल-जुलाई की चार महीने की अवधि के दौरान बुनियादी उद्योगों की वृद्धि दर घटकर आधी यानी कि 3 प्रतिशत रह गई है। बात करें पिछले वित्त वर्ष की, तो पिछले वित्त वर्ष के पहले चार महीनों में बुनियादी उद्योगों की वृद्धि दर 5.9 प्रतिशत थी। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस साल अप्रैल से लगातार बुनियादी उद्योगों की वृद्धि दर नीचे आ रही है। इस वित्त वर्ष के अप्रैल में बुनियादी उद्योगों की वृद्धि दर 5.2 प्रतिशत रही थी, जो मई में घटकर 4.3 प्रतिशत हो गई।

वहीं जून तिमाही के आर्थिक विकास दर के आंकड़ों से भी जाहिर होता है कि वैश्विक आर्थिक मंदी से देश की विकास दर को झटका लगा है। अप्रैल-जून तिमाही में विकास दर घटकर 5 प्रतिशत रह गई है, जबकि बीते वित्त वर्ष की चौथी तिमाही में आर्थिक विकास दर 5.8 प्रतिशत थी। आर्थिक विकास दर में गिरावट के बाद भारत, दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था नहीं रह गया है। इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही में देश की वृद्धि दर चीन से भी नीचे रही है। अप्रैल-जून तिमाही में चीन की आर्थिक वृद्धि दर 6.2 प्रतिशत रही है, जो उसके 27 साल के इतिहास में सबसे कम है।

मंदी पर सरकार से लगातार सवालों के बीच, आर्थिक विकास दर के आंकड़े सामने आने के बाद मुख्य आर्थिक सलाहकार कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यन का कहना है कि जब पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था में सुस्ती है तो ऐसे में भारत की आर्थिक विकास दर का 5 प्रतिशत रहना राहत की बात है। सुब्रमण्यन के मुताबिक़, वैश्विक और घरेलू कारणों से जीडीपी वृद्धि दर कम हुई है, लेकिन सरकार अर्थव्यवस्था को दुरस्त करने के लिए कई उपाय कर रही है।
 
इधर, वैश्विक आर्थिक मंदी का असर विनिर्माण क्षेत्र में भी देखने को मिल रहा है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि देश के विनिर्माण क्षेत्र की गतिविधियां अगस्त महीने में गिरकर 15 महीने के सबसे निचले स्तर पर आ गई हैं। जानकारों के मुताबिक़ इसका कारण बिक्री, उत्पादन और रोज़गार में धीमी वृद्धि है।

आईएचएस मार्किट का इण्डिया मैन्यूफैक्चरिंग पर्चेजिंग मैनेजर्स सूचकांक (PMI) जुलाई में 52.5 से गिरकर अगस्त में 51.4 पर आ गया, जो कि मई 2018 के बाद का सबसे निचला स्तर है। यह लगातार 25वां महीना है जब विनिर्माण क्षेत्रा का पीएमआई 50 से अधिक रहा है। आप की जानकारी के लिए बता दें कि सूचकांक का 50 से अधिक रहना विनिर्माण क्षेत्र में विस्तार दर्शाता है, जबकि 50 से नीचे का सूचकांक कमज़ोरी का संकेत है।

साफ़ ज़ाहिर है कि वैश्विक आर्थिक मंदी ने देश की अर्थव्यस्था की गति की धीमा कर दिया है। एक समय जहां भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था था, वहीं आज भारत की अर्थव्यवस्था की विकास दर 5 प्रतिशत पर आ गई है। यह सही है कि वैश्विक आर्थिक मंदी का असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है, जिसके कारण उत्पादन, बिक्री और रोज़गार पर नकारात्मक असर दिख रहा है। ऐसे में मोदी सरकार को चाहिए कि वो अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए ज़रूरी सुधारात्मक क़दम उठाए, जिससे वैश्विक आर्थिक मंदी का सामना भारत की अर्थव्यवस्था कर सके।