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अमेरिका-ईरान तनाव के कारण हो रही भारतीय विदेश नीति की परीक्षा

27 Sep 2019
अमेरिका और ईरान के विवाद ने बढ़ाया भारत का ‘तनाव’
 
SEP 27 (WTN) – जैसा कि आप जानते हैं कि आज़ादी के बाद से कई सालों तक भारत की विदेश नीति कथित रूप से गुटनिपरेक्ष यानी कि तटस्थता की रही थी। शीत युद्ध के दौरान भारत ने पूंजीवादी USA और तत्कालीन साम्यवादी USSR से बराबर की दूरी बनाकर रखी थी। हालांकि, कहा जाता है कि नेहरू की विदेश नीति के कारण इस दौरान भारत का झुकाव USSR की तरफ़ था। लेकिन समय के साथ USSR का विखण्डन हुआ और अमेरिका दुनिया में सबसे शक्तिशाली देश बनकर उभरा। आज के दौर में भारत जैसे विकासशील देश के लिए अमेरिका जैसे विकसित देश के साथ कूटनीतिक और आर्थिक सम्बन्ध बनाए रखना काफ़ी ज़रूरी है।

USSR के विखण्डन के बाद अमेरिका पूरी दुनिया में एक शक्तिशाली देश बनकर उभरा और एक तरह से कहा जाए तो पूरी दुनिया एकध्रुवीय हो गई। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था का विनिमय अमेरिकी डॉलर में ही होता है। अमेरिका की सामरिक बादशाहत और पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर उसकी पकड़ होने के बाद अमेरिका ने उन देशों पर आर्थिक प्रतिबन्ध लगाना शुरू कर दिये जिनसे उसके मतभेद रहे हैं।

अपने मतभेदों के कारण अमेरिका समय-समय पर कई देशों पर आर्थिक प्रतिबन्ध लगाता रहता है और अमेरिका के द्वारा लगाए गये इन प्रतिबन्धों को दुनिया के अन्य देशों को मज़बूरी में मानना ही पड़ता है, क्योंकि पूरी दुनिया का व्यापार अमेरिका डॉलर पर निर्भर है।
 
जैसा कि आप जानते हैं कि कई सालों से जारी अमेरिका और ईरान के बीच तनातनी के कारण अमेरिका ने ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबन्ध लगाए हुए हैं। ईरान पर लगे अमेरिका के कड़े आर्थिक प्रतिबन्धों का नुकसान भारत जैसे उन देशों को भुगतना पड़ रहा है, जो कि कच्चे तेल की आपूर्ति के लिए ईरान जैसे तेल निर्यातक देशों पर निर्भर हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ईरान पर लगे अमेरिकी प्रतिबन्धों के कारण भारत, ईरान से कच्चे तेल का आयात अब नहीं कर पा रहा है।
 
अभी हाल ही में दुनिया की सबसे बड़ी तेल कम्पनी अरामको के दो संयंत्रों पर सऊदी अरब में हमले के बाद से भारत समेत पूरी दुनिया में कच्चे तेल की सप्लाई बुरी तरह से प्रभावित हुई है, और कच्चे तेल के दाम में वृद्धि से पेट्रोल-डीज़ल महंगा हो गया है। दरअसल, सऊदी अरब से किसी भी कारण से तेल आपूर्ति प्रभावित होने पर भारत को इतना परेशान नहीं होना पड़ता यदि भारत, ईरान से तेल आयात करता रहता।

इन्हीं सब घटनाक्रमों के बीच संयुक्‍त राष्‍ट्र महासभा के 74वें अधिवेशन में हिस्‍सा लेने के लिए अमेरिका पहुंचे भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने न्‍यूयॉर्क में ईरान के राष्‍ट्रपति हसन रूहानी से मुलाकात की। मोदी की रूहानी से मुलाक़ात उस समय हो रही है, जबकि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव चरम पर है और दोनों ही देश युद्ध की कगार पर खड़े हैं।

हालांकि, भारत के प्रधानमंत्री मोदी और ईरान के राष्ट्रपति रूहानी के बीच यह मुलाक़ात एक सामान्य मुलाक़ात ही कही जा रही है, क्योंकि इस दौरान दोनों के बीच आपसी और क्षेत्रीय हितों के मुद्दों पर ही चर्चा हुई। ईरान पर अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंध के बाद भारत को ईरान से तेल आपूर्ति बंद हो गई है, जिसके बाद इन दोनों ही देशों के नेताओं के बीच मुलाक़ात पर सभी की नज़रें थीं। इन दोनों ही नेताओं की यह मुलाक़ात प्रतिक्षित थी, क्योंकि दोनों ही नेता शेड्यूलिंग मुद्दों पर जून में किर्गिस्तान के बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन के मौके पर बैठक नहीं कर सके थे।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश है। भारत अपनी तेल ज़रूरतों का 80 प्रतिशत आयात के ज़रिये ही पूरा करता है। हाल तक इराक और सऊदी अरब के बाद ईरान, भारत का तीसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता देश था।

ईरान के कथित परमाणु कार्यक्रम से नाराज़ अमेरिकी ने ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबन्ध लगा दिये थे, अमेरिका ने भारत और सात अन्य देशों को ईरान से तेल ख़रीदने की छह महीने की लम्बी छूट दी थी जो कि इसी साल दो मई को समाप्त हो गई। स्वाभाविक है कि ईरान से तेल आयात बंद होने से भारत को काफ़ी झटका लगा है। अमेरिकी प्रतिबन्धों के बीच ईरान ने भारत से भारतीय करेंसी में ही तेल निर्यात करने की बात भी कही थी, लेकिन अमेरिका के साथ कूटनीतिक और आर्थिक सम्बन्धों की मज़बूरी के कारण भारत, ईरान की इस मांग को मन्जूर नहीं कर सकता है।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारत और ईरान के बीच कूटनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक सम्बन्ध काफ़ी पुराने हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने मई 2016 में ईरान के साथ एक रणनीतिक सम्बन्ध बनाने और पश्चिम एशिया के साथ भारत के सम्बन्धों का विस्तार करने के उद्देश्य से तेहरान का दौरा किया था। प्रधानमंत्री मोदी की इस यात्रा के दौरान भारत और ईरान ने लगभग एक दर्जन समझौतों पर हस्ताक्षर किए थे। सामरिक और आर्थिक नीति के तहत भारत ने ईरान के साथ चाबहार बंदरगाह के विकास पर एक समझौता भी किया था।
 
वहीं पिछले साल फरवरी के महीने में ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने भारत का दौरा किया था। रूहानी पिछले एक दशक में भारत आने वाले पहले ईरानी राष्ट्रपति थे। उनकी यात्रा के दौरान भी दोनों ही देशों के बीच कई समझौतों पर हस्ताक्षर हुए थे। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि क्षेत्रीय सन्तुलन के लिए भारत को ईरान का सहयोग काफ़ी ज़रूरी है, क्योंकि ईरान के साथ मिलकर ही भारत, पाकिस्तान पर अंकुश लगा सकता है।
 
जैसा कि आप जानते हैं कि अमेरिका और ईरान दोनों ही युद्ध की कगार पर खड़े हैं। ऐसे में भारत के सामने काफ़ी बड़ी चुनौती है कि वो दोनों ही देशों के साथ अपने सम्बन्ध बनाए रखे, क्योंकि भारत को इन दोनों ही देशों की ज़रूरत है। एकतरफ़ जहां भारत को अपने कूटनीतिक और आर्थिक हितों के लिए अमेरिका का साथ सहयोग ज़रूरी है, वहीं दूसरी तरफ़ क्षेत्रीय सामरिक सन्तुलन बनाए रखने के भारत को ईरान का साथ चाहिए, क्योंकि इसके ज़रिये भारत, पाकिस्तान पर दबाव बना सकता है।

भारत आज इस स्थिति में है कि अमेरिका और ईरान इन दोनों में से किसी को भी वो नाराज़ नहीं करना चाहेगा। कहा जा सकता है कि अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव ने भारत की तेल अर्थव्यवस्था का काफ़ी प्रभावित किया है। लेकिन अब देखना होगा कि प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच, इन दोनों ही देशों से बराबर के सम्बन्ध रख पाने में कामयाब हो पाते हैं कि नहीं?