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मुस्लिम देशों का नेता बनने की 'असफ़ल' कोशिश में लगा पाकिस्तान

16 Oct 2019
घर सम्भल नहीं रहा पर इमरान ख़ान बनना चाह रहे दुनियाभर के मुस्लिमों के लीडर!
 

OCT 16 (WTN) – भारत का पड़ोसी देश पाकिस्तान जो काम ना करे वो कम है! पाकिस्तान सालों से भारत में आतंकी गतिविधियों को अंजाम देता आया है। इतना ही नहीं, पाकिस्तान, भारत के आंतरिक मामले कश्मीर में भी दख़लंदाज़ी देता आया है। अमेरिका और चीन जैसे देशों के 'दम' पर आज पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था कैसे तो भी चल रही है, वरना पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था कब कि दिवालिया हो चुकी होती। भारत से कई मामलों में पीछे पाकिस्तान, भारत से 'बराबरी' करने की नाकाम कोशिश करता रहता है।

कहा जाता है कि भारत से 'साझा दुश्मनी' के कारण चीन ने पाकिस्तान को परमाणु हथियार मुहैया कराए हैं। और इन्हीं परमाणु हथियारों के दम पर पाकिस्तान पूरे मुस्लिम देशों का नेता बनने की कोशिश में लगा रहता है। ऐसा इसलिए, क्योंकि पाकिस्तान मुस्लिम देशों में यह बार-बार जताता रहता है कि वो 'एकमात्र' मुस्लिम देश है, जिसके पास परमाणु हथियार हैं। वैसे तो सालों से पाकिस्तान कोशिश करता रहा है कि वो एकमात्र मुस्लिम परमाणु हथियार सम्पन्न देश होने के दम पर मुस्लिम देशों का 'सर्वेसर्वा' बने, लेकिन पाकिस्तान की इन कोशिशों को हमेशा ही 'झटका' लगा है।
 
वैसे इन दिनों पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान पिछले कुछ दिनों से सऊदी अरब और ईरान के बीच 'सुलह' कराने की कोशिश में जुटे हुए हैं। दरअसल, अभी हाल ही इमरान ख़ान ईरान दौरे पर गये थे। जहां पर ईरान के राष्ट्रपति हसन रुहानी के साथ साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में इमरान ख़ान ने कहा, “पहले भी पाकिस्तान ने सऊदी अरब और ईरान के बीच वार्ता कराने में मदद की थी और एक बार फ़िर पाकिस्तान दोनों देशों के मतभेद सुलझाने का इच्छुक है।” इतना ही नहीं, इमरान ख़ान ने आगे कहा, “मुस्लिम देशों के सामने आंतरिक और बाहरी तमाम चुनौतियां हैं। मुस्लिम देशों के बीच एकता और एकजुटता का संदेश देना बेहद ज़रूरी है।”

इतना ही नहीं, इमरान ख़ान ईरान और सऊदी अरब के बीच मध्यस्थता के अलावा मुस्लिम दुनिया का 'नेतृत्व' करने की कोशिश करते भी नज़र आ रहे हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पिछले महीने न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच से पाकिस्तान ने मलेशिया और तुर्की के साथ मिलकर इस्लामिक मुद्दों को उठाया था। इन तीनों ही देशों के नेताओं ने 'इस्लामोफोबिया' से लड़ने के लिए एक अंग्रेजी भाषा का चैनल खोलने की भी बात कही थी।
 
लेकिन यदि आप सोच रहे हैं कि इमरान ख़ान पाकिस्तान को मुस्लिम देशों का नेता बनाने में सफ़ल हो सकेंगे, तो शायद आप ग़लत सोच रहे हैं। दरअसल, पाकिस्तान की मुस्लिम देशों के बीच नेता बनने की महत्वाकांक्षा को सऊदी अरब और तुर्की जैसे मुस्लिम देश कभी पूरा नहीं होने देंगे।
 
जैसा कि आप जानते हैं कि जब न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच से पाकिस्तान ने मलेशिया और तुर्की के साथ मिलकर इस्लामिक मुद्दों को उठाया था तो सऊदी प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के इमरान खान से 'नाराज़' होने की ख़बरें भी आई थीं। कहा यह भी जा रहा था कि इमरान ख़ान सउदी अरब के जिस प्लेन से सफ़र कर रहे थे, उस प्लेन को सऊदी प्रिंस ने कनाड़ा से वापस बुला लिया था।
 
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इण्डोनेशिया के बाद पाकिस्तान दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मुस्लिम जनसंख्या वाला देश है। पाकिस्तान में सुन्नी आबादी बहुतायत में है और पाकिस्तान सैन्य शक्ति के मामले में दुनिया के अन्य मुस्लिम देशों पर 'भारी' पड़ता है। वहीं जैसा कि हमने आपको बताया कि पाकिस्तान एकमात्र ऐसा मुस्लिम देश है, जो कि परमाणु शक्ति सम्पन्न है।
 
दरअसल, पाकिस्तान जब बना था तब पाकिस्तानियों में 'भ्रम' था कि पाकिस्तान एक ऐसा देश बने जहां इस्लामिक विचारधारा और जीवनशैली के अभ्यास के जरिए दुनिया के लिए एक मिसाल पेश की जा सके। पाकिस्तान की मूल विचारधारा का अभिन्न हिस्सा मुस्लिम भाईचारा है, और इसीलिए पाकिस्तान ने पहले से ही अपने लिए मुस्लिम दुनिया की एकता का लक्ष्य तय कर लिया है। लेकिन यह सब बता पाकिस्तान की मजाक लगती है, क्योंकि सुन्नी बाहुल्य पाकिस्तान में शिया मुस्लिमों के साथ 'दोअम दर्जे' का व्यवहार किया जाता है।
 
यानी कि कहा जा सकता है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान इसी 'पूर्व निर्धारित लक्ष्य' को पूरा करने में जुटे हुए हैं। पाकिस्तान हमेशा से ही सीरिया, फिलिस्तीन, म्यान्मार और कश्मीर मुद्दों को लेकर ख़ुद को मुस्लिम दुनिया की आवाज़ बताने की कोशिश करता रहा है। यहां तक कि पाकिस्तान ने आज तक इजरायल को मान्यता नहीं दी है।
 
लेकिन पाकिस्तान जो मुस्लिम देशों का नेता बनने की सोच रहा है, वो इतना आसान नहीं है। दरअसल, सुन्नी बहुल अमीर देश सऊदी अरब और तुर्की के रहते हुए पाकिस्तान का मुस्लिम दुनिया की आवाज़ बनना आसान नहीं है। दरअसल, इस सबके पीछे बहुत बड़ी 'कूटनीति' है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सऊदी अरब और तुर्की दोनों ही देश अमेरिका के सहयोगी हैं, लेकिन कई बार सऊदी अरब और तुर्की एक-दूसरे से टकरा चुके हैं।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि साल 1818 में सऊदी अरब के राजा का सिर तुर्की की राजधानी इस्ताम्बुल में बीच चौराहे पर कलम कर दिया गया था। यह तो था पुराना मामला, लेकिन अभी हाल ही में सऊदी अरब के पत्रकार जमाल खशोगी की इस्ताम्बुल में हुई हत्या के बाद एक बार फिर से दोनों देशों के बीच 'टकराहट' बढ़ गई है।
 
आपकी जानकारी के लिए बत दें कि वॉशिंगटन पोस्ट के सम्वाददाता रहे जमाल खशोगी कभी सऊदी अरब के शाही परिवार के काफ़ी 'क़रीबी' थे। लेकिन बाद में वे 'अति रूढ़िवादी' सरकार के मुखर आलोचक बन गए। इस्ताम्बुल के सऊदी वाणिज्य दूतावास के भीतर खशोगी की हत्या के बाद से सऊदी अरब और तुर्की के बीच 'तनाव' बढ़ गया है।

अभी हाल में जब सऊदी अरब के प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने 'कबूल' किया था कि खशोगी की हत्या उनकी 'निगरानी' में हुई है, इसके बाद तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्गोगन ने खशोगी की हत्या के दोषी सऊदी नेतृत्व को 'सज़ा' देने का फ़ैसला कर लिया। खाशोगी की हत्या के बाद तुर्की ने दावा किया था कि वह इकलौता देश है जो मुस्लिम दुनिया का नेतृत्व कर सकता है।
 
लेकिन पाकिस्तान और तुर्की के दावों से कहीं आगे सऊदी अरब मुस्लिम दुनिया के नेतृत्व को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता है, क्योंकि इस्लाम के दो पवित्र स्थल मक्का और मदीना सऊदी अरब में ही स्थित हैं और हर साल करीब 2 करोड़ मुसलमान यहां हज यात्रा करने जाते हैं। देखा जाए तो सऊदी प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने जब से सत्ता सम्भाली है, तभी से उनमें मध्य-पूर्व की अगुवाई करने की 'महत्वाकांक्षा' साफ़ नज़र आती है।
 
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सऊदी प्रिंस ने सुन्नी देशों यूएई और मिस्र के साथ गठबन्धन कर यमन में ईरान के सहयोगियों के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ रखा है। वहीं सऊदी प्रिंस कतर में सत्ता पलट करने की असफ़ल कोशिश भी कर चुके हैं। इतना ही नहीं, सऊदी प्रिंस ने लेबनान की राजनीति में भी 'दखल' देने का प्रयास किया है।
 
लेकिन दूसरी तरफ़, सऊदी अरब के उत्थान को रोकने की पूरी कोशिश तुर्की कर रहा है। जहां सऊदी अरब ने कतर में सत्ता पलटने की कोशिश की तो वहीं तुर्की राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोगन ने कतर की सुरक्षा के लिए सेना भेजी थी। इतना ही नहीं, तुर्की ने सोमालिया से सऊदी के सहयोगियों को खदेड़ दिया है। 
 
तो साफ़ ज़ाहिर है कि सऊदी अरब और तुर्की जैसे मुस्लिम देशों के रहते हुए इमरान ख़ान के लिए मुस्लिम दुनिया का नेता बनना मुश्किल है। राजनीतिक रूप से अस्थिरता और आर्थिक तंगहाली के कारण भी पाकिस्तान का मुस्लिम देशों को नेता बनने का सपना फ़िलहाल पूरा होता नहीं दिख रहा है।