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बैंकों के बढ़ते एनपीए से डगमगाई देश की अर्थव्यवस्था

31 Oct 2019
बैंकिंग सेक्टर में सुधार से ही हासिल हो सकता है 5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था का लक्ष्य
 
OCT 31 (WTN) – स्वाभाविक है कि आप अपना पैसा बैंकों में ही जमा करके रखते होंगे। ऐसा इसलिए, क्योंकि आप चोरी और अन्य डर के कारण अपना पैसा घर पर ना रखकर बैंकों के पास रखते हैं। बैंक में पैसा रखने के बाद आप सोचते हैं कि आपका पैसा वहां पर सुरक्षित है। लेकिन पीएमसी बैंक का मामला सामने आने के बाद से लोगों के मन में यह सवाल बार-बार आ रहा है कि उनका पैसा बैंकों में सुरक्षित है कि नहीं? दरअसल, पीएमसी बैंक में हुए घोटाले के बाद लोगों के मन में देश के बैंकिंग सिस्टम के प्रति डर समाया हुआ है।
 
बैंकिंग क्षेत्र के जानकारों के मुताबिक़, बैंकिंग सेक्टर इस समय मुश्किल के दौर से गुजर रहा है। धीरे-धीरे बैंकों का एनपीए बढ़ता ही जा रहा है और इससे देश की अर्थव्यवस्था पर विपरित असर पड़ता जा रहा है। ऐसा नहीं है कि बैंकों में धांधली कोई नई बात है, लेकिन पीएमसी बैंक घोटाले के बाद देश में एक बार फ़िर से बैंकिंग सेक्टर की कमज़ोरी पर लोगों का ध्यान जा रहा है। बैंकों का धीरे-धीरे बढ़ रहा एनपीए कमज़ोर बैंकिंग सेक्टर की सबसे बड़ी निशानी है।
 
यदि आप नहीं जानते हैं कि आख़िर बैंकों का NPA होता क्या है? तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि NPA का मतलब होता है Non Performing Asset, यानी कि डूबा हुआ क़र्ज़। तमाम कोशिशों के बाद भी बैंकों का एनपीए बढ़ रहा है यानी कि उनके द्वारा दिया गया क़र्ज़ डूबता ही जा रहा है। आंकड़ों के अनुसार, साल 2014 में बैंकों का एनपीए 2.39 लाख करोड़ रुपये था, जो साल 2015 में 3.23 लाख करोड़ रुपये हो गया। वहीं साल 2016 में बैंकों का एनपीए 5.66 लाख करोड़ रुपये था तो साल 2017 में यह बढ़कर 7.28 लाख करोड़ रुपये हो गया है। वहीं पिछले साल यानी कि 2018 में बैंकों का एनपीए 10.36 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।

स्वाभाविक है कि बढ़ते एनपीए से बैंकों की अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लग रहा है और बढ़ते एनपीए के कारण बैंक डूब रहे हैं और बैंकों के डूबने से उसके ग्राहकों का पैसा फंस रहा है। बैकों की इसी हालत के कारण दिनों दिन बैंकिंग सेक्टर पर लोगों का विश्वास कम होता जा रहा है। वित्तीय मामलों के जानकारों का मानना है कि बैंकों के एनपीए बढ़ने का एक बड़ा कारण आर्थिक मंदी भी है। किसी ना किसी कारण से पिछले 3 सालों में बैंकों के एनपीए में तेज़ी से व़ृद्धि हुई है। वहीं यदि किस बैंक को PCA (Prompt Corrective Action) कैटेगरी में डाल दिया जाता है तो वह बैंक ज़्यादा उधार नहीं दे पाएगा। चूंकि आरबीआई की बारीक़ नज़र बैकों पर है, इसलिए अब बैंक जो भी लोन देंगे वो काफ़ी ध्यान से देंगे।

अब आर्थिक मंदी जारी है और कई तरह के कारणों से लोग लोन भी कम ले रहे हैं। वहीं बैंक भी अब लोन देने में डर रहे हैं कि कहीं उनका दिया हुआ लोन एनपीए ना हो जाए। लेकिन चूंकि बैंकों को लोन देने का दबाव भी है और उन्हें लोन सोच समझकर भी देना है कि कहीं वो एनपीएन ना हो जाए, ऐसे में बैंकों के सामने स्पष्टता नहीं है कि आख़िरकार वे करें तो क्या करें।

अब एनपीए की चिन्ता के कारण बैंकों ने क़र्ज़ देने की शर्तों में सख्ती बरतना शुरू कर दी है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस साल जनवरी से लेकर सितम्बर के महीने तक बैंकों से मिलने वाले क़र्ज़ में भारी गिरावट दर्ज की गई है और बैंकों से मिलने वाला क़र्ज़ 17 प्रतिशत से घटकर 8.8 प्रतिशत हो गया है। जब बैंकों ने क़र्ज़ देने में सख्ती की और क़र्ज़ देना कम कर दिया तो इससे कारोबार में कम पैसा लगने लगा। जब कारोबर में कम पैसा लगेगा तो स्वाभाविक है कि इससे कारोबार प्रभावित होंगे और कारोबार प्रभावित होने से रोज़गार कम होंगे। जब रोज़गार कम होंगे और लोगों के पास नौकरी नहीं होगी वे सीमित ख़र्च करेंगे और सीमित ख़र्च का सीधा असर मांग पर पड़ता है।
 
साफ़ ज़ाहिर है कि बैंकों के एनपीए का सीधा असर देश की अर्थव्यस्था पर पड़ रहा है। यदि यही हालत रही तो साल 2025 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का सपना बस सपना ही रह जाएगा। वहीं यदि भारत की तुलना अन्य विकासशील देशों से की जाए तो पता चलता है कि अन्य विकासशील देशों की तुलना में भारत में एनपीए का प्रतिशत बहुत ज़्यादा है। भारत में जहां बैंकों का एनपीए 10 प्रतिशत है वहीं ब्राजील में यह 3.6 प्रतिशत, इण्डोनेशिया में 2.6 प्रतिशत दक्षिण अफ्रीका में 2.8 प्रतिशत और मलेशिया में 1.5 प्रतिशत है।

ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार एनपीए की विकट समस्या से निपटने के लिए कोई ठोस उपाय नहीं कर रही है। इस समस्या से निपटने के लिए सरकार ने कई क़दम उठाए हैं, जिनमें से एक बड़ा क़दम था बैंकों का विलय। वैसे सरकार का दावा है कि मार्च 2019 में पहली बार एनपीए में गिरावट आई है और यह मार्च 2018 के 10.36 लाख करोड़ रुपये से घटकर 9.49 लाख करोड़ रुपये हो गया है। बैंकों के विलय के अलावा मोदी सरकार ने एनपीए की समस्या से निपटने के लिए कुछ अन्य उपाय भी किये हैं, जैसे बैंक के एनपीए को पारदर्शी तरीक़े से पहचानना, एनपीए की रिकवरी करने के लिए सख़्त क़दम उठाना, बैंकों में पैसा डालना और पब्लिक सेक्टर बैंक में आर्थिक सुधार।
 
वहीं मोदी सरकार नया इन्सॉल्वेंसी एण्ड बैंकरप्सी कोड भी लेकर आई है, जिसके तहत जो व्यक्ति या संस्था बैंक का पैसा लेकर फरार हो जाते हैं उनकी सम्पत्ति से पैसे वसूलने की कार्रवाई जल्द से जल्द हो सके। अब देखना होगा कि मोदी सरकार द्वारा बैंकों के एनपीए को कम करने के लिए उठाए गये क़दमों से कैसा और कितना जल्दी परिणाम मिलता है। साफ़ ज़ाहिर है कि यदि बैंकिग सेक्टर में जल्द से जल्द सुधार नहीं किये गये तो इसके और भी दुष्परिणाम आने वाले समय में देखने को मिल सकते हैं।