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मौलाना के बहाने पाकिस्तानी सेना की इमरान ख़ान के ख़िलाफ़ बड़ी साजिश!

02 Nov 2019
क्या पाकिस्तान में होने जा रहा है इमरान ख़ान सरकार का तख्ता पलट?
 
NOV 02 (WTN) – आज़ादी के बाद से ही पाकिस्तान में राजनीतिक उठापटक चलती रही है। पाकिस्तान में लोकतंत्र बस दुनिया को दिखाने मात्र के लिए है, नहीं तो पाकिस्तान की चुनी हुई सरकारों पर वहां की सेना का पूरा नियंत्रण रहा है। चुनी हुई सरकारों का तख्ता पलट पाकिस्तान में कोई नई बात नहीं है। ऐसे में पाकिस्तन में जो भी सरकारें बनती हैं, उनके प्रधानमंत्री सेना के दबाव में ही अपना काम करते रहे हैं।
 
जहां तक पाकिस्तान के वर्तमान प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की बात है तो यह सभी जानते हैं कि इमरान ख़ान पाकिस्तानी सेना की कठपुतली मात्र हैं। लेकिन जब से इमरान ख़ान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने हैं, पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति दिनों-दिन बिगड़ती ही जा रही है। बढ़ते क़र्ज़, घटते निर्यात, बढ़ती महंगाई, ऐतिहासिक रूप से न्यूनतम स्तर पहुंचे विदेशी मुद्रा भण्डार और भारत के साथ विवाद के कारण पाकिस्तान की आर्थिक हालत बदतर हो चुकी है, जिसके कारण पाकिस्तान में लोगों का जीना दूभर होता जा रहा है।

ऐसे में इमरान ख़ान की सरकार से परेशान होकर उन्हें सत्ता से उखाड़ फेंकने के लिए धार्मिक गुटों के साथ-साथ पाकिस्तान में विपक्षी दल भी एकजुट होते जा रहे हैं। पाकिस्तान की विपक्षी पार्टियों ने जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल (जेयूआई-एफ) के मौलाना फ़जलुर रहमान के साथ मिलकर इमरान ख़ान सरकार विरोधी अभियान को तेज़ कर दिया है। इतना ही नहीं, विरोधियों ने इमरान ख़ान को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा देने के लिए 48 घण्टे का अल्टीमेटम तक दे दिया है।

दरअसल, इन दिनों 66 साल के मौलाना फ़जलुर रहमान, इमरान ख़ान के लिए सिरदर्द साबित हो रहे हैं। मौलाना फ़जलुर रहमान पाकिस्तान की सबसे बड़ी धार्मिक पार्टी और सुन्नी कट्टरपंथी संगठन जमीअत उलेमा-ए-इस्लाम (जेयूआई-एफ) के प्रमुख हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि फ़जलुर रहमान के पिता खैबर पख़्तूनख़्वा प्रांत के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। यानी कि साफ़ ज़ाहिर है कि पाकिस्तान की राजनीति में फज़लुर रहमान कोई नया नाम नहीं है।
 
मौलाना फ़जलुर रहमान पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में नेता प्रतिपक्ष भी रह चुके हैं। इतना ही नहीं, वे पाकिस्तानी संसद में विदेश नीति पर स्टैण्डिंग कमेटी के प्रमुख और कश्मीर कमेटी के मुखिया भी रह चुके हैं। वैसे तो मौलाना फ़जलुर तालिबान समर्थक माने जाते हैं, लेकिन पिछले काफ़ी समय से वे उदारवादी होने का दावा करते आएं हैं।
 
मौलाना फ़जलुर रहमान पाकिस्तान की राजनीति में काफ़ी एक्टिव रहे हैं। पिछले साल पाकिस्तान में हुए आम चुनावों में मौलाना फ़जलूर ने इमरान ख़ान को सत्ता में आने से रोकने के लिए साझा पहल भी की थी। इतना ही नहीं, पिछले साल पाकिस्तान में हुए राष्ट्रपति चुनाव में वे विपक्ष की ओर से साझा प्रत्याशी भी थे। मौलाना की राजनीतिक और धार्मिक ताक़त का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि सरकार में नहीं रहते के बावजूद भी नवाज़ शरीफ सरकार ने मौलाना को केन्द्रीय मंत्री का दर्जा दे रखा था।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि मौलाना फ़जलुर पाकिस्तान में देश की सबसे बड़ी धार्मिक पार्टी चलाते हैं। एक समय था जब मौलाना तालिबान के ख़िलाफ़ अमेरिकी अभियान को इस्लाम विरोधी बताकर जेहाद का ऐलान किया करते थे। मौलाना इतने कट्टरपंथी हैं कि वे महिला विरोधी भी हैं। बेनजीर भुट्टो जब साल 1988 में पहली बार पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बनी थीं तो मौलाना फ़जलुर ने बेनजीर भुट्टो के प्रधानमंत्री बनने का इस तर्क पर विरोध किया था कि पाकिस्तान की प्रधानमंत्री कोई महिला नहीं बन सकती है। हालांकि, बाद में बेनजीर भुट्टो से मुलाक़ात के बाद मौलाना ने अपना विरोध वापस ले लिया था।

मौलाना की राजनीतिक और धार्मिक हैसियत पाकिस्तान में इतनी है कि वे परवेज़ मुशर्रफ तक के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलन्द कर चुके हैं। साल 2001 में अमेरिका में हुए हमले के बाद जब पाकिस्तान को मजबूरन तालिबान के ख़िलाफ़ अमेरिकी ऑपरेशन में साथ देना पड़ा था तो उस समय मौलाना फ़जलुर ने परवेज़ मुशर्रफ के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया था। इतना ही नहीं, मौलाना ने अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश के ख़िलाफ़ जेहाद का ऐलान तक कर दिया था और पाकिस्तान के कई शहरों में तालिबान के पक्ष में रैलियां की थीं। मौलाना की अमेरिका विरोधी नीतियों के कारण ही परवेज़ मुशर्रफ ने तब मौलाना को नज़रबंद भी करवा दिया था।
 
मौलाना फ़जलुर के बारे में आपको एक जानकारी और दें कि अमेरिकी केबल्स लीक से हुए खुलासों से यह बात निकलकर सामने आई थी कि साल 2007 में जब परवेज़ मुशर्रफ की सत्ता कमज़ोर हो रही थी, तब मौलाना ने परवेज़ मुशर्रफ को सत्ता से उखाड़ फेंकना का प्लान बनाया था। अपने इस प्लान के तहत मौलाना ने अमेरिकी राजदूत से पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनने के लिए अमेरिकी समर्थन मांगा था। जानकारी के मुताबिक़, मौलाना ने अमेरिकी राजदूत से कहा था कि वे तालिबान का समर्थन छोड़कर पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं। यानी कि साफ़ ज़ाहिर है कि मौलाना ने अमेरिका के समर्थन से सत्ता पर कब्ज़े का सीक्रेट प्लान बनाया था।
 
जैसा कि हमने आपको बताया कि पाकिस्तान की जनता मानती है कि इमरान ख़ान सेना की मदद से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने हैं। इस बारे में मौलाना का फ़जलुर का कहना है कि साल 2018 में हुए चुनाव में धांधली हुई थी। साफ़ ज़ाहिर है कि पिछले साल हुए चुनाव के समय से ही मौलाना फ़जलुर ने इमरान ख़ान के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल रखा है। मौलाना ने पहले साझा विपक्षी सरकार बनाने की कोशिश की, फ़िर मौलाना ने राष्ट्रपति चुनाव में विपक्षी पार्टियों के दम पर राष्ट्रपति बनने की कोशिश की और अब इमरान ख़ान सरकार के ख़िलाफ़ आज़ादी मार्च निकाल रहे हैं।
 
मौलाना का कहना है कि पाकिस्तान की बदहाल आर्थिक स्थिति के लिए इमरान ख़ान ही ज़िम्मेदार हैं और इसके लिए इमरान ख़ान को इस्तीफ़ा दे देना चाहिए। वहीं उनकी मांग है कि पाकिस्तान में नये सिरे से निष्पक्ष चुनाव होना चाहिए और नई सरकार का गठन होना चाहिए। मौलाना के विरोध के समर्थन में पाकिस्तान की दो प्रमुख विपक्षी पार्टियां, नवाज़ शरीफ की पीएमएल-एन और बिलावल भुट्टो की पीपीपी समर्थन कर रही हैं। वहीं कुछ अन्य पार्टियां भी मौलाना के समर्थन में खड़ी नज़र आती हैं।

अब देखना होगा कि मौलाना अपने विरोध प्रदर्शन के दम पर इमरान ख़ान को सत्ता से उखाड़ फेंकने में सफ़ल हो पाते हैं कि नहीं। लेकिन पाकिस्तान की राजनीति के जानकारों का मानना है कि हो सकता है कि मौलाना के विरोध प्रदर्शन के पीछे पाकिस्तान की सेना का ही हाथ हो। ऐसा इसलिए, क्योंकि भारत से कश्मीर मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मात खाने और देश की आर्थिक स्थिति बदतर होने के बाद पाकिस्तान की सेना इमरान ख़ान सरकार का तख्ता पलटने का ऐसा बहाना ढूंढ रही है, जिससे उस पर कोई आरोप ना लगे।
 
वैसे पाकिस्तान की सेना इतनी शक्तिशाली है कि वो रातों-रात इमरान ख़ान सरकार का तख्ता पलट सकती है, लेकिन यदि वो ऐसा करती है तो पूरी दुनिया में पाकिस्तान अकेला पड़ जाएगा और बदहाली में चल रही पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को विदेशी सहायता मिलना बंद हो जाएगी। ऐसे में मौलाना के बहाने पाकिस्तान में अशांति फैलाकर और सब व्यस्थित करने की बात कहकर पाकिस्तान की सेना देश की सत्ता फ़िर से अपने हाथों में लेने के फ़िराक़ में लगती है।