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जानिए उत्तराखण्ड के कालापानी क्षेत्र पर नेपाल के दावे की सच्चाई

08 Nov 2019
आधारहीन है उत्तराखण्ड के कालापानी क्षेत्र पर जताई गई नेपाल की आपत्ति

NOV 08 (WTN) – भारत और नेपाल दो ऐसे देश हैं जिनके बीच ऐतिहासिक ही नहीं बल्कि पौराणिक काल से आपसी सम्बन्ध रहे हैं। भौगोलिक रूप से नेपाल की स्थिति भारत के लिए हमेशा से ही फ़ायेदमंद रही है, क्योंकि नेपाल, भारत और चीन जैसी दो महाशक्तियों के बीच एक बफर स्टेट के रूप में काम करता है। वैसे तो प्राचीन काल से ही भारत और नेपाल के बीच आपसी सम्बन्ध काफ़ी क़रीबी रहे हैं। लेकिन नेपाल में कम्युनिस्ट पार्टी  के सत्ता में आने के बाद से नेपाल की सरकार का रूख भारत विरोधी होता जा रहा है। जानकारों के मुताबिक़, चीन की धीरे-धीरे कठपुतली बनता जा रहा नेपाल, चीन के इशारे पर ही भारत विरोधी नीतियों पर काम करता जा रहा है। ऐसा इसलिए, क्योंकि चीन, नेपाल में कई बड़ी परियोजनाएं चालू करने वाला है।
 
वैसे नेपाल समय-समय पर कहता आया है कि भारत के साथ उसके निकट सम्बन्ध रहे हैं। लेकिन धीरे-धीरे चीन के क़रीबी होने और भारत विरोधी नीतियों के चलते ही अब नेपाल ने भारत सरकार की कई गतिविधियों का विरोध करना शुरू कर दिया है। इसी कड़ी में भारत सरकार द्वारा जारी किए गए देश के नए राजनीतिक मानचित्र पर नेपाल ने विरोध दर्ज कराया है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि जम्मू-कश्मीर राज्य के पुनर्गठन के बाद भारत सरकार ने नया राजनीतिक मानचित्र जारी किया है, जिस पर नेपाल को आपत्ति है।

दरअसल, भारत सरकार ने अपने नये राजनीतिक मानचित्र में उत्तराखण्ड राज्य के पिथौरागढ़ ज़िले में स्थित कालापानी को भारतीय क्षेत्र में शामिल बताया है और इसी पर नेपाल ने आपत्ति जताई है। इस बारे में नेपाल के विदेश मंत्रालय का कहना है, “नेपाल सरकार की तरफ़ से यह पूरी तरह से स्पष्ट है कि कालापानी क्षेत्र नेपाल का अभिन्न हिस्सा है। हम नेपाल की अंतरराष्ट्रीय सीमा की सुरक्षा करने को लेकर पूरी तरह से प्रतिबद्ध हैं और इसके लिए हम मित्र देशों के साथ कूटनीतिक वार्ता का रास्ता अपनाएंगे।” आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारत और नेपाल के बीच सीमा विवाद को लेकर चर्चा का दौर जारी है।

धीरे-धीरे चीन के क़र्ज़ जाल में फंसते जा रहे नेपाल के विदेश मंत्रालय का कालापानी मामले में कहना है, “नेपाल और भारत के विदेश मंत्रियों के स्तर की साझा समिति ने दोनों देशों के विदेश सचिव को अनसुलझे सीमा विवाद का समाधान निकालने की ज़िम्मेदारी दी है। दोनों देशों के बीच सीमा विवाद द्विपक्षीय बातचीत और सहमति से सुलझाए जाने चाहिए और किसी भी तरह की एकतरफ़ा कार्रवाई नेपाल की सरकार को स्वीकार्य नहीं है।”

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारत सरकार ने दो नए केन्द्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के गठन के बाद भारत का नया राजनीतिक मानचित्र जारी किया था, जिसमें उत्तराखण्ड राज्य के पिथौरागढ़ ज़िले में स्थित कालापानी को भारतीय भूभाग में दर्शाया गया है। लेकिन नेपाल इस पर आपत्ति दर्ज कर रहा है, क्योंकि नेपाल अपने राजनीतिक मानचित्र में कालापानी को धारचूला ज़िले के एक हिस्से के तौर पर दिखाता है। कालापानी मामले पर नेपाल के विदेश मंत्रालय की ओर से तो प्रतिक्रिया आई है, लेकिन भारत सरकार की तरफ़ से इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारत के नये राजनीतिक मानचित्र पर नेपाल से पहले पाकिस्तान विरोध जता चुका है। भारत के नये मानचित्र पर पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा, “गिलगिट-बाल्टिस्तान और उसके कब्ज़े के कश्मीर के अन्य हिस्सों को भारतीय अधिकार क्षेत्र में दिखाने वाले जम्मू-कश्मीर के नए राजनीतिक मानचित्र को पाकिस्तान पूरी तरह से ख़ारिज करता है।”
 
दरअसल, अनुच्छेद 370 मामले पर दुनिया के हर मंच पर मोदी सरकार की सफ़ल कूटनीति से शिकस्त खा चुका पाकिस्तान, भारत के नये मानचित्र पर आपत्ति दर्ज कर एक बार फ़िर से पूरी दुनिया का ध्यान ख़ुद की तरफ़ आकर्षित करना चाहता है। भारत के नये राजनीतिक मानचित्र पर पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय का कहना है, “भारत द्वारा 2 नवम्बर को जारी किया गया मानचित्र ग़लत, क़ानूनी रूप से अवैध और अमान्य है और यह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद प्रस्तावों का पूरी तरह से उल्लंघन है। पाकिस्तान इन राजनीतिक मानचित्रों को ख़ारिज करता है, जो संयुक्त राष्ट्र के मानचित्र से मेल नहीं खाते हैं।”

वहीं कालापानी के विवाद पर इस इलाक़े के लोगों का कुछ और ही कहना है। जिस क्षेत्र पर नेपाल दावा कर रहा है, उसका नेपाल से कोई भी लेना-देना नहीं है। स्थानीय लोगों के मुताबिक़, भारतीय सीमा से लगा नेपाल का अन्तिम गांव छांगरू भी कालापानी से 17 किलोमीटर की दूरी पर बसा है। छांगरू के साथ ही चीन सीमा की ओर स्थित तिंकर गांव में रं समुदाय के ही लोग निवास करते हैं।

इस मामले में सबसे ज़्यादा ख़ास बात यह है कि नेपाल में राजशाही के समय में नेपाल के तत्कालीन राजा ने कालापानी क्षेत्र की ज़मीन गर्ब्याल और गुंज्याल परिवारों के नाम पर कर दी थी और कहा जाता है कि इनके दस्तावेज़ आज भी गुंजी में मौजूद हैं। गुंजी से आगे कालापानी और लिपूलेख तक का भूभाग निर्जन है। कालापानी से लीपूलेख की दूरी लगभग 15 किमी है जहां पर कि विशाल दर्रे और पहाड़ियां स्थित हैं। जबकि यहां से धारचूला की ओर गर्ब्यांग के पास काली नदी में सीतापुल स्थित है और इसी पुल से भारत और नेपाल के बीच आवागमन होता है। ख़ास बात यह है कि नेपाल के अधिकारियों को भी अपनी भारत और चीन से लगी सीमा देखने के लिए भी भारत के इसी सीतापुल से नेपाल में प्रवेश करना पड़ता है।

यानी कि कालापानी और उसके पास स्थित क्षेत्र के लोगों की बातों से साफ़ ज़ाहिर होता है कि कालापानी को भारतीय मानचित्र में दिखाए जाने पर नेपाल द्वारा जो आपत्ति दर्ज कराई जा रही है वो आधारहीन है। दस्तावेज़ों के आधार पर दावा किया जा रहा है कि नेपाल के राजा ने ख़ुद कालापानी क्षेत्र की ज़मीन गर्ब्याल और गुंज्याल परिवारों के नाम पर कर दी थी। अब देखना होगा कि भारत के राजनीतिक मानचित्र में कालापानी दिखाए जाने पर नेपाल सरकार की आपत्ति के बाद भारत सरकार की तरफ़ क्या कुछ अधिकृत बयान सामने आता है और इस नेपाल की तरफ़ से उत्पन्न इस विवाद का ख़ात्मा कब तक होता है?