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रेटिंग एजेंसियों की रेटिंग से चिन्ता में मोदी सरकार

08 Nov 2019
जीडीपी ग्रोथ रेट के अनुमान में लगातार कमी से मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों पर उठे सवाल  

NOV 08 (WTN) – वैश्विक आर्थिक मंदी के कारण भारत समेत दुनिया के कई देशों की अर्थव्यवस्थाएं प्रभावित हुई हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, दुनिया की 90 प्रतिशत अर्थव्यवस्थाओं पर आर्थिक मंदी का कम या ज़्यादा असर हुआ है। भारतीय अर्थव्यवस्था पर आर्थिक मंदी के असर की चर्चा करें तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही विकास दर में जारी गिरावट इस बात का संकेत है कि भारतीय अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में है।
 
कई वैश्विक और भारतीय वित्त संस्थानों समेत रिज़र्व बैंक ऑफ़ इण्डिया ने चालू वित्त वर्ष के लिए जीडीपी ग्रोथ रेट के अनुमान को कम कर दिया है। वहीं अर्थशास्त्रियों का मत है कि आर्थिक मंदी, जीएसटी कलेक्शन में कमी और कॉरपोरेट टैक्स में कमी के कारण चालू वित्त वर्ष में भारत सरकार का राजकोषीय घाटा अनुमान से ज़्यादा रह सकता है। यानी कि साफ़ है कि आर्थिक मंदी के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था को तगड़ा झटका लगा है और इसके जो दुष्परिणाम दिख रहे हैं वो आने वाले कुछ और समय तक जारी रहेंगे।

इस सबके बीच, भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक और नकारात्मक ख़बर आई है। दरअसल, नकारात्मक ख़बर यह है कि रेटिंग एजेंसी मूडीज इनवेस्टर्स सर्विस ने भारत की रेटिंग घटा दी है। मूडीज ने भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में अपने नज़रिए को 'स्टेबल' (स्थि‍र) से घटाकर 'नेगेटिव' कर दिया है। भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में टिप्पणी करते हुए मूडीज का कहना है, “पहले की तुलना में भारतीय अर्थव्यवस्था में जोखिम बढ़ गया है, इसलिए उसने रेटिंग घटाई गई है।”
 
आपकी जानकारी के लिए बता दें रेटिंग एजेंसी मूडीज का किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के बारे में नज़रिया काफ़ी मायने रखता है। मूडीज के आउटलुक से अंदाज़ा लगता है कि सम्बन्धित देश की सरकार और उस देश की नीतियां आर्थिक कमज़ोरी का मुक़ाबले करने में कितनी प्रभावी हैं। यानी कि मूडीज द्वारा भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए जारी किये गये निगेटिव आउटलुक से स्पष्ट होता है कि मूडीज के दृष्टिकोण में मोदी सरकार की नीतियां आर्थिक मंदी से निपटने में अभी तक असफ़ल साबित रही हैं और भारत में निवेश करना फ़िलहाल जोखिम’ का काम है।

इससे पहले मूडीज ने अक्टूबर महीने में अपनी एक रिपोर्ट में चालू वित्त वर्ष 2019-20 के लिए भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट के अनुमान को घटाकर 5.8 प्रतिशत कर दिया था। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इससे पहले मूडीज ने चालू वित्त वर्ष के लिए जीडीपी ग्रोथ रेट 6.2 प्रतिशत होने का अनुमान जारी किया था। मूडीज ही नहीं बल्कि इससे पहले कई रेटिंग एजेंसियां चालू वित्त वर्ष के लिए जीडीपी ग्रोथ रेट के अनुमान को कम कर चुकी हैं। मालूम हो कि चालू वित्त वर्ष के लिए अप्रैल से जून की तिमाही में भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट सिर्फ़ 5 प्रतिशत ही रही है, जो कि साल 2013 के बाद से सबसे कम है।
 
दरअसल, भारत जैसे तेज़ी से विकास कर रहे देशों की अर्थव्यवस्था पर आर्थिक मंदी ने गहरा असर डाला है। आर्थिक मंदी के कारण बाज़ार में मांग कम हुई है, जिसके कारण उत्पादन और बिक्री पर बहुत असर पड़ा है। आर्थिक मंदी के कारण मांग में कमी, बिक्री में गिरावट और उत्पादन प्रभावित होने जैसे कारकों की समीक्षा के लिए भारत का ऑटोमोबाइल सेक्टर सबसे बढ़िया उदाहरण है, जो कि पिछले 15 महीनों से मंदी की मार से प्रभावित है।

आर्थिक मंदी का भारतीय अर्थव्यवस्था पर ऐसा प्रभाव पड़ा है कि कमजोर मांग और सरकारी ख़र्च घटने के कारण अर्थव्यवस्था की रफ़्तार बढ़ ही नहीं पा रही है। आर्थिक मंदी का असर दिखने से पहले भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में शामिल थी और जीडीपी ग्रोथ रेट 8 प्रतिशत के आसपास हुआ करती थी।
 
मूडीज के अलावा अन्य रेटिंग एजेसियों ने भी भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट के अनुमान को पहले से कम कर दिया है। रेटिंग एजेंसी फिच ने पिछले महीने ही चालू वित्त वर्ष 2019-20 के लिए जीडीपी ग्रोथ रेट के अनुमान को 6.6 प्रतिशत से कम करके 5.5 प्रतिशत कर दिया था। वहीं सितम्बर महीने में रेटिंग एजेंसी क्रिसिल ने दावा किया था कि भारत में आर्थिक मंदी अंदेशे से कही ज़्यादा व्यापक और ग़हरी है। तब क्रिसिल ने भी जीडीपी ग्रोथ रेट के अनुमान को घटा दिया था। क्रिसिल के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2019-20 में भारत की जीडीपी ग्रोथ 6.3 प्रतिशत रह सकती है।

यानि का साफ़ ज़ाहिर है कि आर्थिक मंदी ने भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास की रफ़्तार की धीमा कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जहां साल 2025 तक 5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था का लक्ष्य हासिल करने के लिए नीतियां बना रहे हैं और उन पर अमल कर रहे हैं, तो वहीं आर्थिक मंदी मोदी सरकार की नीतियों की सफ़लता में सबसे बड़ा रोड़ा साबित हो रही है। ऐसा नहीं है कि आर्थिक मंदी का शिकार सिर्फ़ भारतीय अर्थव्यवस्था ही हुई है, चीन जैसी दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को भी आर्थिक मंदी ने झटका दिया है।
 
जैसा कि हमने आपको बताया कि मूडीज ने अपने आउटलुक में भारतीय अर्थव्यवस्था को 'स्टेबल' से घटाकर 'नेगेटिव' किया है। तो मूडीज के इस आउटलुक से भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर पड़ना स्वाभाविक है। ऐसा इसलिए, क्योंकि मूडीज और इस तरह की अन्य रेटिंग एजेसियों के आधार पर ही भारत में विदेशी कम्पनियां निवेश करती हैं, वहीं रेटिंग के आधार पर ही वैश्विक वित्त संस्थानों से क़र्ज़ मिलता सुलभ होता है। भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में निगेटिव टिप्पणी करने से भारत में होने वाले विदेशी निवेश पर गहरा असर पड़ेगा और इससे विदेशी मुद्रा समेत रोज़गार उत्पन्न होने में कठिनाई होगी।

अब देखना होगा कि आर्थिक मंदी से जूझ रही भारतीय अर्थव्यवस्था को मोदी सरकार की कौन सी नीतियां सहारा दे पाती हैं? वैसे कहा जा रहा है कि अमेरिका-चीन ट्रेड वॉर इस साल के आख़िरी तक ख़त्म हो सकता है, ऐसे में अगले साल के शुरूआती महीनों के बाद आर्थिक मंदी से पूरी दुनिया को निज़ात मिल सकती है। अब आर्थिक मंदी से निज़ात मिलने के बाद देखना होगा कि भारतीय अर्थव्यवस्था में तेज़ी के लिए जो उपाय मोदी सरकार कर रही है, वो कितने सफ़ल साबित हो पाते हैं?